रोमिंग जर्नलिस्ट

गुरुवार, 28 फ़रवरी 2013

जीवन का नाम है........


रोमिंग जर्नलिस्ट की रिपोर्ट 27
गाड़ी बुला रही है, सीटी बजा रही है चलना ही जिंदगी है चलती ही जा रही है.. जम्मू से नईदिल्ली जाने के लिए निकली पूजा एक्सप्रेस के कोच में अचानक यह गाना गूंजने लगा। अपनी जिंदगी की भी कहानी इस गाने से काफी मिलती-जुलती होने के कारण देखा तो साइड बर्थ पर सो रहे बीएसएफ के जवान के मोबाइल में यह गाना बज रहा था। नीद से जागने के बाद वह जवान फोन पर बात करने में व्यस्त हो गया। मेरा दिमाग सोच के समंदर में गोते लगाने लगा कि इतनी शार्ट नोटिस पर अमर उजाला के समूह संपादक शशिशेखर ने आखिर क्यों बुलाया है? इस सोच से बाहर निकलले पर टे्रेन की खिडक़ी से बाहर के दृश्य देखने लगा। भगवान भास्कर अस्ताचल की ओर जा रहे थे, टे्रेन पटरियों पर दौड़ रही थी और मेरे दिमाग की पटरी पर भी मेमोरी एक्सप्रेस पटरियां बदल रही थी। ट्रेन की गति धीमी होने लगी और चक्कीबैंक स्टेशन पर ठहर गयी। काशी से कश्मीर आते समय जब यह स्टेशन पड़ा था तो नाम थोड़ा अजीब सा लगा था,पर वापसी की यात्रा में चक्कीबैंक के नाम के साथ अपनत्व का भाव जाग गया। चक्की बैंक स्टेशन पर सेना के जवानों की अच्छी-खासी संख्या हर ट्रेन पर चढ़ती-उतरती है। भारत-पाकिस्तान सीमा पर तैनात जवानों को चक्कीबैंक से मोर्चें पर ले जाने के लिए सेना का विशेष इंतजाम रहता है। ट्रेन ठहरने के साथ बैग-बक्सा के साथ कई जवान ट्रेन में चढ़े, मेरे सामने वाली सीट पर दिल्ली का एक सिंधी परिवार माता रानी के दर्शन करके वापस लौट रहा था तो बगल वाली सीट पर एक जवान अपने सामान के साथ आया। अपना सामान वह बर्थ के नीचे डालकर आराम से बैठ गया। ट्रेन सीटी देकर चल दी, साइड बर्थ पर लेटा नए फौजी साथी को देखकर जय माता दी ..बोलकर फिर पैर पसारकर लेटने की मुद्रा में आ गया। खिडक़ी के बाहर अब अंधेरा पैर पसार चुका था, लोअर बर्थ होने के कारण मैं खिडक़ी के किनारे बैठा था, फौजी साथी से बोला भाई साहब जब आपको सोना होगा बर्थ उठा लीजिएगा..मुझे कोई प्राब्लम नहीं होगी। सर अपनो से क्या प्राब्लम? सेना के जवानों में अपनत्व की भावना जम्मू-कश्मीर में जिस कदर देखने को मिली थी उसका पहले से ही कायल था। सहयात्री की ओर मुखातिब हुआ तो जवान के नेमप्लेट पर निगाह पड़ी.. अशफाक लिखा देखकर बोला भाई आपने सही कहा अपनो से क्या प्राब्लम। परिचय हुआ अपना विजिटिंग कार्ड निकालकर दिया.. पढ़ते हुए अशफाक ने कहा भाई साहब आप जम्मू में पत्रकार हैं। जवाब में हां की मुद्रा में सिर हिलाया, बोला अगर आप बुरा न माने तो पूछ सकता हूं कहां के रहने वाले हैं। काशी से कश्मीर तक की कहानी संक्षेप में सुनायी। अशफाक बोले भाई साहब आपसे मिलकर अच्छा नहीं बहुत अच्छा लगा। हम सोचते थे जवान ही सीमा पर मुस्तैद है, लेकिन आपसे मिलकर ऐसा लगा कि आप लोगों की मुस्तैदी में कोई कोर-कसर नहीं है। इसके बाद सवालों का दौर सा चल पड़ा? कितने दिन से हैं? कहां-कहां गये? ऐसे कई सवालों को लेकर बातचीत के बीच में घड़ी की सुई पर नजर डाली तो रात के नौ बजने को थे। नए साल का पहला दिन लोग नयी खुशियों के साथ नए जोश, नई ऊर्जा के साथ कुछ अच्छा खाते-पीते हुए मनाते हैं ताकि साल की शुरुआत बेहतर हो लेकिन अपने लिए पहली जनवरी को रघुनाथ मंदिर में दर्शन-पूजन के बाद अचानक नोएडा से आए बुलावो के कारण ऐसी हड़बड़ाहट रही कि लंच करना ही भूल गया और डिनर का भी कुछ अता-पता नहीं था। अशफाक से पूछा भाई पूजा एक्सप्रेस में पेंट्री कार नहीं लगता क्या? जवाब था भाई सरकार के लिए जम्मू जाने वाली ट्रेनों का मतलब होता है कंकड़-पत्थर के बीच रहकर रुखा-सूखा खाकर देश के लिए जान देने के लिए हरदम तैयार रहने वाले जवान, जिनकी जिंदगी में लंच और डिनर में खाए जाने वाले लजीज व्यंजनों की कोई जगह नहीं होती, इसलिए शायद ऐसा कोई इंतजाम नहीं है। लखनपुर बार्डर जब ट्रेन पहुंचेगी तो वहां कुछ खाने को मिल सकता है। ट्रेन दौड़ रही थी कि अचानक साइड में लेटे जवान के मोबाइल में फिर वही गाना बजा..गाड़ी बुला रही है.. सीटी बजा रही है चलना ही जंदगी चलती ही जा रही का गीत बजने लगा। गाजियाबाद के रहने वाले अशफाक इसे सुनकर बोले भाई साहब हम लोगों की जिंदगी का यही नंगा सच है। आज यहां कल वहां.. परसो कहां मालूम नहीं। सही कह रहे हैं, कहकर हुंकारी भरते हुए जम्हाई ली। कुछ देर बात बर्थ खोलने के साथ मैं भी लोअर बर्थ पर कंबल ओढक़र लेट गया। आंखों से नींद गायब थी, नोएडा में शशि शेखर ने क्यों बुलाया है? रह-रहकर यही प्रश्न बार-बार दिमाग में चक्कर लगा रहा था। अमर उजाला जम्मू-कश्मीर में छपी खबरों को लेकर कोई बात होगी या कुछ और? यही कयास लगा रहा था। इसी सब सोच के साथ घड़ी की सुई अपनी गति से भाग रही थी। ठंड के साथ-साथ पेट में कूद रहे चूहे भी नींद की राह में रोड़ा बने हुए थे। लखनपुर रेलवे स्टेशन पर टे्रन ठहरी तो कंबल छोडक़र डिब्बे के गेट के पास पहुंचा कि शायद खाने-पीने का कुछ इंतजाम बन जाये पर प्लेटफार्म पर खड़े खम्भों पर कुछ फ्यूज तो कुछ जल रहे बल्बों के साथ अपने हाथ भी निराशा ही आयी। बैग में रखी पानी की बोतल निकालकर आधा बोतल पानी पेट में डालने के बाद कंबल ओढक़र माता रानी को नाम लेकर लेट गया। जाने कब नींद आ गयी,सबेरे नींद खुली तो सात बजने वाले थे, अशफाक भाई जाग गये थे, पूछा भाई कहां तक आ गये बोले दिल्ली अब दूर नहीं है। दिल्ली दूर नहीं है सुनकर कंबल के भीतर अलसाये शरीर में न जाने कहां से चेतना आ गयी। जागने के बाद फ्रेश होकर सीट पर आने के साथ ही कंबल अपने एयरबैग में लपेटकर रख दिया। तब तक पहले पूजा एक्सप्रेस में अवैध वेंडर चाय-काफी बेचने के लिए आ गये थे। चाय की चुस्की के साथ फिर वही सवाल आखिर शशि शेखर ने क्यों बुलाया है? इसी सवाल के साथ ट्रेन ने निजामुद्ïदीन रेलवे स्टेशन पर आमद दर्ज की। जब तक शशि शेखर से मुलाकात नहीं होती तब तक यही सवाल दिमाग में जवाब तलाशने में लगा था और मैं नोएडा अमरउजाला आफिस जाने के लिए टैक्सी की तलाश में निकल पड़ा।
क्रमश..........

3 टिप्‍पणियां:

MANU PRAKASH TYAGI ने कहा…

सुंदर कहानी वैसे बार्डर पर जाकर फोजियो में देश भावना ज्यादा ही हो जाती है।

Dinesh chandra Mishra ने कहा…

jai hind

Unknown ने कहा…

दिनेशजी, आपकी कला और योग्यता को सलाम। आप वास्तव में पत्रकार हैं। आप जीवन्त पत्रकार हैं। आपकी पारदर्शिता की परख सबको शायद नहीं है। समय लगेगा। लोग आपको समझ जाएंगे। आप निरन्तर अग्रसर रहें। ढेर सारी दुआएँ।

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