रोमिंग जर्नलिस्ट

गुरुवार, 18 अक्तूबर 2012


नकली निविदाओं से निगला ७००० करोड़

दिनेश चंद्र मिश्र
लखनऊ। प्रदेश की पूर्ववर्ती बहुजन समाज पार्टी की सरकार में हुए एनआरएचएम,लैकफेड सहित कई घोटालों की जांच अभी अंजाम पर नहीं पहुंची है कि हजारों करोड़ रूपए का एक और बड़े घोटाले का सनसनीखेज खुलासा हुआ है। यह घोटाला उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम से जुड़ा है। प्रदेश की पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल में ७००० करोड़ रूपए से ज्यादा के निर्माण कार्य नकली निविदाओं से बीस कंपनियों ने निगल लिया। नकली निविदिाओं से हजारों करोड़ रुपए के काम को हथियाने के साथ आधा-अधूरा छोडक़र पूरा पेमेंट करने के हुए संगीन खेल में राजकीय निर्माण निगम के अधिकारियों के साथ पूववर्ती सरकार के एक विभागीय कैबिनेट मंत्री का नाम सामने आया है। प्रदेश की पूर्ववर्ती सरकार के तमाम घोटालों की जांच सीबीआई के साथ अन्य जांच एजेंसियों से हो रही है,वही करोड़ों रुपए के इस खेल के जिम्मेदारों पर कार्रवाई तो दूर जांच भी किसी एजेंसी को नहीं सौंपी गयी है।
राजकीय निर्माण निगम द्वारा पूर्ववर्ती सरकार में विभागीय मंत्री के दबाब में पहले से चली आ रही कार्यप्रणाली को कारपोरेट सेक्टर की कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिए बैक टू बैक आधार पर अपनो को काम बांटने का खेल हुआ। इसके पहले राजकीय निर्माण निगम के जिम्मे जो काम आता था, उसके इंजीनियर और आर्कीटेक्टों की फौज डिजाइन बनाकर लागत का मूल्य तय करने के बाद दस प्रतिशत ज्यादा रखकर ठेकेदारों से अपनी देखरेख में काम करवाती थी। डीसीयू पैटर्न कहे जाने वाले इस तरीके से जहां निर्माण कार्य होता था, उस इलाके के मजदूरों को बाजार से ज्यादा मूल्य पर काम मिलने के साथ स्थानीय लोगों को बड़ी संख्या में रोजगार मिलता है। इस सिस्टम को ताक पर रखकर प्रदेश की पूर्ववर्ती सरकार में बैक टू बैक सिस्टम के आधार पर कारपोरेट कंपनियों को काम सौंपने के लिए नकली निविदाओं को फाइलकापी के लिए ही छपने वाले अखबारों में प्रकाशित करवाने के बाद काम हथिया लिया गया। नियमत: जिस क्षेत्र में काम होना है वहां के साथ प्रदेश की राजधानी में छपने वाले प्रमुख चार समाचारपत्रों में कम से कम विज्ञापन छपने के बाद आने वाली टेंडर के आधार पर होता है। पूर्ववर्ती सरकार में इस नियम को ताक पर रखकर बैक टू बैक से प्रदेश ही नहीं देश के कई राजनेताओं से जुड़ी कंस्ट्रक्शन कंपनियों को ठेका दे दिया। सबसे चौंकाने वाली बात यह भी रही जो काम होना है, कार्यदायी संस्था राजकीय निर्माण निगम को बनाया गया लेकिन उस प्रोजेक्ट में कितनी लागत आएगी, इसका वेल्यूशन रानिनि से कराने की बजाए कारपोरेट कंस्ट्रक्शन कंपनियों के जेबी संस्थाओं से पचास से साठ प्रतिशत ज्यादा लागत का कराने के बाद ठेका रेवडिय़ों की तरह बांटा। नकली निविदाओं से एक..दो नहीं बल्कि सात करोड़ रुपये से ज्यादा का काम निगलने का हुआ है। रानिवि के ग्रेजुएट इंजीनियर्स एसोसिएशन ने उसी समय तत्कालीन प्रमुख सचिव को खत लिखकर आपत्ति जतायी लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। प्रदेश की वर्तमान सरकार द्वारा पूर्ववर्ती सरकार में हुए कथित भ्रष्टाचार की जांच की बात कही लेकिन रानिनि में हुए करोड़ों रुपए के खेल का पड़ताल न होता देखकर प्रदेश के लोकायुक्त एनके वर्मा के पास इस मामले की जांच के लिए शिकायत इसी महीने प्रतापगढ़ के रहने वाले एक सामाजिक कार्यकर्ता ने कर दी है, सुनवाई होनी बाकी है।

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