रोमिंग जर्नलिस्ट

सोमवार, 26 मार्च 2012

अजब की आंखों में दिखी भरत मिलाप की गजब चमक



रोमिंग जर्नलिस्ट की रिपोर्ट 26
पहली जनवरी की सुबह जब नींद खुली तो भगवान भास्कर के तेज से सर्द हवाएं थोड़ा गर्म हो चली थी। फ्रेश होने के बाद मीटिंग के आफिस पहुंचा तो संपादक जी आ चुके थे। एक दूसरे को हैप्पी न्यू ईयर कहने का दौर दस-पंद्रह मिनट तक चलता रहा। मीटिंग का कोरम पूरा होने के बाद सबसे पहला काम पिता जो को फोन लगाने का किया, क्योंकि पहली जनवरी को पिता जी का जन्मदिन होता है। नौकरी से पहले बस्ती में जब घर पर सभी लोग रहते थे तो पिता जी के जन्मदिन को गर्मागर्म जलेबी और दही खाकर मनाया जाता था। जुबान आज भी वह जायका नहीं भूली। पिता जी को प्रणाम करके आर्शीवाद लेने के बाद जब उन्हें इस जायके की याद दिलाई तो उन्होंने बड़े प्यार से समझाते हुए कहा कि नौकरी के चक्कर में तुम घर से इतनी दूर चले गए हो, वहां पर घर जैसा जायका कहां मिलेगा। मेरी बात मानो तो अभी भी घर आ जाओ, मैने उनको आश्वस्त करते हुए कहा कि जल्दी ही आएंगे। पिता जी से बात करने के बाद बनारस में फोन मिलाया तो छोटी बेटी ने फोन उठाते ही उलाहना भरे स्वर में कहा पापा मुझे अपने सहेलियों को न्यू ईयर कार्ड देना है कौन खरीदवाएगा। घर में मेरी छोटी बेटी को मेरी इस पत्रकारिता की नौकरी से होने वाली दूरी की सबसे ज्यादा शिकायत रहती है। उसको  समझाते हुए कहा कि तुम्हारे लिए ग्रीटिंग कार्ड यहां से ले आऊंगा। साल के पहले ही दिन अपनो से इतनी दूरी होने के कारण मन बहुत उदास हो गया था। आफिस से पैदल ही तवी नदी का पुल पार करते हुए रघुनाथ बाजार पहुंच गया। दिल में भगवान राम का दर्शन करने की इच्छा जागृत हुई। रघुनाथ मंदिर के सामने जम्मू में मित्र बन गए नवीन की ड्राई फ्रूट की दुकान पर पहुंचा। बेल्ट और मोबाइल रखकर दर्शन के लिए लाइन में लग गया। गेट पर तैनात सीआरपीएफ के जवान अजब सिंह यादव से एक बार फिर मुलाकात हुई। हैप्पी न्यू ईयर बोलने के बाद उसकी आंखों में जो अपनत्व की चमक दिखी, उसे देखकर लगा राम-भरत का जब चित्रकूट में मिलाप हुआ होगा तो शायद उनकी आंखों में यही चमक रही होगी। अजब सिंह बोले दर्शन करके वापस आइए फिर आपसे बात करते हैें। भगवान का स्मरण करते हुए मंदिर के अंदर पहुंचा सामने रामदरबार सजा था, आंख बंदकर शीश झुकाकर मन में कहा कि आप तो भगवान है, सर्वज्ञ है। मेरी व्यथा से भलीभांति परिचित है। इसलिए मेरे लिए जो उचित समझे वही कीजिएगा,जरूर कीजिएगा प्रभु। प्रार्थना करने के बाद मंदिर से बाहर निकला तो अजब सिंह यादव राह ही देख रहे थेे। देखते ही बोले गुरु जी नववर्ष पर मेरी तरफ से एक चाय स्वीकार लीजिए। उनके आग्रह भरे स्वर को सुनकर उनके साथ चाय की दुकान की तरफ बढ़ गया। अजब सिंह बोले मिश्रा जी आपने करवाचौथ पर जो खबर लिखी थी.. आसमां में निकलेगा चांद, आवाज में दिखेगी अक्स, उसको मेरी घरवाली ने भी पढ़ा था। करवाचौथ के अगले दिन उसका फोन आया। वह ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं है, सिर्फ दस्तखत बना लेती है, अखबार पढ़ लेती है। एकाध बार मेरे साथ पिक्चर देखने गयी है। उस खबर को पढक़र इतना खुश हुई कि पूछिए मत। मैने हंसते हुए कहा चलिए आप लोगों के दिल की बात मैं आपके घरवालों तक पहुंचा सका, इससे बड़ी खुशी मेरे लिए और कुछ नहीं हो सकती। अजब सिंह का दिल अभी कुछ कहने को बेताब था, चाय की चुस्कियों के संग मैने कहा भाई आपकी खुशी मेरी खुशी है। वह बोले मिश्रा जी दस साल शादी को हो गए हैं, पहली बार मेरी घरवाली ने उस खबर को पढक़र बोला आई लव यू। बीबी का इतना प्यार पहली बार देखा, उसने अगल-बगल में सबको उस खबर पढ़ाया। अजब सिंह भाव-विह्वïल हो गए थे, बोले मिश्रा जी आपके लिए मैं कुछ नहीं कर सकता लेकिन आपका यह भाई अगर किसी भी दिन थोड़ा सा भी आपके काम आ गया तो अपने को धन्य  समझेगा। अजब की बातों को सुनकर मैं भी अपने को रोक नहीं सका, बोला भाई आप मेरे लिए क्या भारत मां की रक्षा के लिए जिस तरह सतत जुटे हैं, उसके लिए मैं आपके किसी काम आया, तो यह मेरा अहोभाज्य है। इसके लिए आप अमर उजाला को धन्यवाद दीजिए जिसने आपके  दिल की बात को देश के कोने-कोने तक पहुंचायी। चाय खत्म हो चली थी, अजब सिंह से विदा लेकर सूरी ड्राई फ्रूट पर पहुंचा तो नवीन को देखते ही जय माता की कहकर अभिवादन किया। बेल्ट और मोबाइल थमाते हुए नवीन बोले आपके फोन पर कई काल आए हैं,चेक कर लीजिएगा। जींस में बेल्ट लगाने के बाद मोबाइल पर निगाह डाली तो चौंक गया। अमर उजाला के तत्कालीन समूह संपादक शशि शेखर और जम्मू के संपादक प्रमोद भारद्वाज के पांच मिस्ड काल थे। दिमाग में तरह-तरह के अच्छे-बुरे ख्याल आने लगे और सोच में पड़ गया कि अचानक ऐसा क्या हो  गया  कि जो शशि शेखर जी को दो बार फोन करने की जरूरत पड़ी। दिमाग में यही उधेड़बुन चल रही था कि प्रमोद भारद्वाज का फिर से फोन आ गया.. मैने कहा प्रणाम सर.. वह बोले कहां हो तुम, न मेरा फोन उठा रहे हो व न बिग बास का? उनको अपने रघुनाथ मंदिर में दर्शन-पूजन करने के बारे में बताया तो वह शांत स्वर में बोले बास(शशि शेखर) का फोन आया था, उन्होंने वह कल तुमको नोएडा में बुलाया हैं। मैने तुम्हारा पूजा एक्सप्रेस मैं रिर्जवेशन करा दिया है, तुम आज रात को नोएडा से निकल जाओ, तुम्हारे पास यहां सामान क्या है? केवल एक एयर बैग सर..उन्होंने उसको भी लेते जाना। अचानक इस आदेश को सुनकर दिल में कई तरह के सवा उठने लगे। मैने पूछा कोई खास बात है सर? प्रमोद जी बोले मुझे कोई जानकारी नहीं है, बास का जिनता आदेश था, उतना बता दिया, बाकी माता रानी का आर्शीवाद तुम्हारे साथ है। घड़ी की ओर नजर डाली तो दोपहर के एक बज गया था। रघुनाथ मंदिर से सीधे गांधीनगर स्थित मकान पर पहुंचा। तो अचानक दोपहर में आया  देखकर अनिमेष और योगेंद्र चौंक गए, बोले सर.. आप इस समय कैसे? उनको पूरी बात बताते हुए बैग पैक करने में लग गया। एक घंटे में अनिमेष के साथ अमर उजाला आफिस पहुंचा। बैग रखने के बाद रघुनाथ बाजार पहुंचकर कुछ जरूरी खरीदारी की, पुन:वापस पहुंचा। आफिस पहुंचा तो प्रमोद भारद्वाज जी आफिस में नहीं थे, उनसे फोन पर बात हुई तो उन्होंने अनुमति देते हुए कहा कि तुम चले जाओ फिर मुलाकात होगी। पर इतने दिनों में उनसे जो आत्मीयता और प्रगाढ़ता हो गयी थी, उस कारण उनसे बिना मिले चले जाना दिल को गवारा नहीं था।  मैने अनिमेष से पूछा संपादक जी का घर जानते हो, उसने जैसे हामी भरी हम दोनों तुरंत संपादक जी के घर पहुंचे। मैने उनके चरण स्पर्श कर आर्शीवाद लिया तो मिठाई खिलाने के बाद उन्होंने कहा कि इतने दिनों में तुम्हारे साथ काम करने में जो आनंद आया है, उसको मैं हमेशा मिस करता रहंूगा। जाओ बास से मिलो और संपर्क बनाए रखना। भगवान ने चाहा तो फिर मुलाकात होगी। उनकी आत्मीयता की मिठास से भरी बातों को सुनकर मेरी आंखें नम हो गयी। नमी को रोकते हुुए,उनके विदा ली। विक्रम चौक आने के बाद अनिमेष और बाकी साथियों से मिलकर विदा लेने के बाद जम्मू रेलवे स्टेशन के लिए आटो में सवार हुआ। स्टेशन पर पहुंचा तो ट्रेन लग चुकी थी, अपनी सीट पर बैठने के बाद मैं फिर सोचने लगा कि जम्मू से अचानक नोएडा के लिए आए बुलावे में, मेरे लिए क्या संदेश हो सकता है। और इस खबर को घर पर दूं या नहीं? ऐसे सैकड़ों सवाल के साथ पूजा एक्सप्रेस में नईदिल्ली के लिए यात्रा प्रारंभ की। ट्रेन की सीटी के साथ माता रानी को दिल से प्रणाम करने के साथ कहा मां अपना आर्शीवाद सदैव बनाए रखिएगा।
क्रमश: 

गुरुवार, 22 मार्च 2012

यूपी के बेरोजगारी बम में बड़ा दम

दिनेश चंद्र मिश्र
लखनऊ। टीईटी उत्तीर्ण मोर्चा के बैनर तले मंगलवार को राजधानी की सडक़ों पर बेरोजगारी बम की शक्ल में युवा से लेकर अधेड़ हो गए हजारों लोग को हुजूम दिखा। इनके कंधों पर टंगे झोले में टीईटी उत्तीर्ण प्रमाणपत्र संग जाब की जंग में काम आने वाले जरूरी कागजात तो दिल में हक के लिए किसी से भी टकराने की ताकत की झलक आपको हाव-भाव देखकर हो जाएगा। लाठी-गोली और पानी की बौछार खाकर तरबतर होकर घर लौट रहे दर्जनों अभ्यर्थियों से चारबाग रेलवे स्टेशन पर इस खबरनवीस ने बात की। उनके दिल,दिमाग से जुडऩे की कोशिश में हुए सवाल-जवाब में बेरोजगारी बम से वास्ता पड़ा।
हुसैनचौराहे के पास से पुलिस ने लाठी से मारने का डर दिखाने पर भी दीवार की तरह खड़ा रहे सैकड़ों नौजवानों ने पानी की बौछार अपने सीने पर रोकते हुए यह बताया कि गोली खाने का भी दम है, क्योंकि बेरोजगारी बम में बड़ा दम है। पानी की बौछार को छाती पर रोकने के बाद पुलिस जब अचानक बर्बर तरीके से पीटने लगी तो आठ-दस लाठी खाने के बाद भी दर्द को चेहरे पर न लाने देने वालों में इलाहाबाद के सौरभ सिंह  उत्सर्ग एक्सप्रेस का इंतजार करते मिले। अपना परिचय देते हुए जब कहा कि तुम्हारे अंदर दम है तभी लाठी-डंडा खाने के बाद भी फिर लडऩे के मूड में बैठे हो। सौरभ का जवाब सुनकर कान खड़े हो गए, बोला यह हमारा नहीं यूपी के बेरोजगारी बम का दम है। डिग्री लेकर नौकरी के लिए दर-दर ठोकर खा रहे करोड़ों अभ्यर्थियों की भीड़ कभी सेवायोजन दफ्तर पर लैपटाप से लेकर बेराजगारीभत्ता पाने की आस में टूट पड़ती है तो कभी लाखों की शक्ल में टीईटी की डिग्री लेकर न्याय की जंग लड़ रहे है। न्याय के लिए टकराने की ताकत शरीर से नहीं दिल,दिमाग के साथ पेट से भी पैदा होता है। यही ताकत मेरे अंदर है..सौरभ की यह बात सुनकर दो बच्चों की मां सुषमा भी बोल पड़ी, हमारे अंदर भी यही ताकत है। यही ताकत पोलिंग बूथ पर उमड़ी तो कांग्रेस के सियासी युवराज की मेहनत मिट्ïटी में मिल गई तो मिट्टïी से पले-बढ़े अखिलेश यादव को प्रदेश का युवराज बना दिया। .. सौरभ को बंदे में है दम की तर्ज पर सलाम करने के बाद पीनी से भीगने के बाद चाय की चुस्की ले रहे सहारनपुर से आए विनोद बोले सरकार को टेट पास बेरोजगारों को टेट मैरिट के आधार पर नौकरी देनी चाहिए। उत्तर प्रदेश में टेट पास बेरोजगारों पर लाठियां चलाना सरासर अन्याय है। इस अन्याय को टेट पास बेरोजगार कभी बर्दाश्त नहीं करेंगे। टेट पास बेरोजगारों को आर्थिक और मानसिक बहुत नुकसान हुआ है। टेट में आवेदन प्रक्रिया से लेकर अब तक हजारों रुपये बर्बाद हो चुके हैं और अब वे न्याय की उम्मीद में यहां आए तो सरकार ने उन पर लाठियां बरसाकर टेट पास बेरोजगारों के दुखों में और इजाफ ा ही किया है। हमारी सरकार से गुजारिश है कि टेट पास बेरोजगारों के साथ न्याय करते हुए अविलम्ब उनके लिए नौकरी का रास्ता साफ  किया जाये। गाजियाबाद के दीपक का कहना है टेट स्टूडेंट के साथ अन्याय की हद हो गयी है। मासिक आर्थिक और शारीरिक शोषण किया जा रहा है। मेरठ के अविनाश सिंह का कहना है कुछ अफसरों की वजह से 270000 युवा निराश हो रहे है उन्हें अपना भविष्य अंधकार मय दिखाई दे रहा है। अगर सरकार ने इस मुद्ïे को गंभीरता से न लिया तो यह मंडल आयोग की तरह बड़ा आंदोलन हो जाएगा। हमारी मांग है सरकार जल्दी से जल्दी भर्ती करे। इटावा के बृजेश दीक्षित ने कहा हमारी प्रार्थना नेता जी से है, जिस तरह वह बेरोजगारों की जिंदगी बदलने के लिए लैपटाप,भत्ता आदि बांट रहे हैं, उसी तरह लाखों बेरोजगारों के साथ न्याय करें। गोरखपुर की कृष्णा का कहना है हमारे साथ धोखा हो रहा है। टेट से लेकर आवेदन तक औसतन एक लडक़े का 10000 रुपये का खर्चा हुआ है। माननीय अखिलेश जी से विनम्र निवेदन है कि अब देर न करें और जल्द से जल्द भर्ती प्रक्रिया आगे बढ़ाये, हमें आपसे बहुत आशाएं है।  गाजीपुर के चंदकमल ने कहा अगर सरकार ने भर्ती प्रक्रिया शुरू नहीं करायी तो टेट अभ्यर्थी आत्मदाह भी करने के लिए तैयार हैं।

मदर इंडिया का जमीदार दाने-दाने को मोहताज

दिनेश चंद्र मिश्र
लखनऊ। सुपर-डुपर हिट फिल्म मदर इंडिया आपने देखी तो वह दृश्य याद ही होगा जब गांव का जमींदार सुनील दत्त को मारता है तो नरगिस दत्त रोते हुए कहती है..मेरे बेटे पर रहम करो, मत मारो। मदर इंडिया में जमींदार का रोल करने वाले कलाकार का नाम था संतोष कुमार खरे। मदर इंडिया में जमींदार तो मेरा नाम जोकर में राजकपूर के साथ सर्कस का सहयोगी कलाकार सहित सैकड़ों फिल्मों में यादगार रोल करने वाला यह शख्स आज दाने-दाने को मोहताज है। सत्तर बसंत देख चुके संतोष आज राजधानी के ह्दयस्थली हजरतगंज स्थित हनुमान मंदिर के इर्दगिर्द लोगों के हाथ फैलाकर जीवन गुजर-बसर कर रहे हैं। 
छह महीने पहले शराब के नशे में धुत एक कार चालक द्वारा हजरतगंज चौराहे पर कार चढ़ा देने से चलने-फिरने से लाचार संतोष वैशाखियों के सहारे ही चलते हैं। शनिवार को इस खबरवीस का कान उस वक्त खड़ा हो गया जब अंग्रेजी मेें इस शख्स ने एक कप चाय पिलाने की गुजारिश की। फटेहाल बुजुर्ग के अंग्रेजी में मिन्नत को सुनकर संतोष के साथ इस खबरनवीस ने एक कप चाय पीने के साथ जिंदगी के तार छेड़े तो जो कहानी निकलकर आयी, उसे सुनकर पीड़ा,करुणा के साथ फिल्मी दुनिया के रंगीन चकाचौंध के पीछे का काला सच दिखेगा। चाय की गुजारिश सुनकर चौधरी स्वीट से चाय के साथ आलू टिक्की लाकर देने के बाद उनसे दोस्ताना अंदाज में बात हुई तो दाने-दाने को मोहताज इस कलाकार की जो कहानी सामने आयी उसे सुनकर सूखी आंखों से भी पानी निकल आएगा। सन्ï 1942 में बांदा जिले के कटरा मोहल्ले में अधिवक्ता परिवार में पैदा हुए संतोष बीकाम करने के बाद मुंबई चले गए। नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कारपोरेशन में जूनियर आर्टिस्ट के रुप में भर्ती होने के बाद फिल्मों में छोटे-मोटे रोल उस समय दस रुपए प्रतिदिन के हिसाब से मिलने लगे। मदर इंडिया में सुनील दत्त के साथ जमींदार के चंद मिनट के रोल में एक छाप छोडऩे के बाद फिल्मी दुनिया में संतोष की गाड़ी चल निकली। दिलीप कुमार के साथ यहूदी की लडक़ी, मुगले-ए-आजम,राजकपूर के साथ मेरा नाम जोकर, बारिश,,कमाल अमरोह की पाकीजा सहित सैकड़ों फिल्मों में काम किए संतोष को गंूज उठी शहनाई फिल्म में एक बेहतरीन रोल मिला। मुंबई से पूना के रास्ते में सतरा जिले में शूटिंग के दौरान आयशा नामक की जूनियर आर्टिस्ट से प्यार भी हुआ। गंूज उठी शहनाई की शूटिंग के बाद जब फिल्म यूनिट मुंबई लौटने लगी तो आयशा को रोते हुए छोडक़र संतोष आए, आज भी उसकी याद में वह अक्सर अकेले रोते हैं। आयशा को अपना नहीं बना सके तो शादी न करने का वचन लेते हुए ब्रम्ह्चारी बन गए। प्यार के पुराने तार छेडऩे पर वह कहते प्यार की याद मत दिलाइए अकेले अक्सर रोता हूं, फिर रुलाएंगे क्या आप। आज आयशा पता नहीं किस हाल में हो, लेकिन उसकी याद में अक्सर वह रोते हैं। लखनऊ कैसे पहुंचे? मुंबई में जब भीषण बाढ़ आयी थी तो उस दौरान मुंबई के विले पार्ले में वचन फिल्म बनाने वाले एके गोयल के घर पर ही रहते थे। फिल्मों में काम मिलना कम हो गया था, उसके बाद मुंबई से बांदा के लिए निकल दिया, अब लखनऊ पहुंच गया हूं, तबसे यहीं बजरंगबली के भरोसे जिंदगी कट रही है। कोई कुछ खाने को दे देता है तो उसके सहारे ही गुजारा बसर हो रहा है। एनएफडीसी जूनियर आर्टिस्टों की मदद के लिए साढ़े चार हजार रुपए महीने में मदद मिलती थी, पिछले सात महीने से वह भी बंद है। वेलफेयर फंड से मिलने वाला पैसा बैंक एकाउंट में आ जाता था, एटीएम से निकाल लेता था। अब तो एकांउट में चार हजार रुपए बचे हैं, रात दारुलशफा के बी ब्लाक में पूर्व मंत्री पारसनाथ मौर्य के घर के बाहर सोता हूं। उनको एटीएम का पासवर्ड दे दिया हूं, कह दिया हूं जिस दिन मर जाऊं तो मेरी लाश जलवा दीजिएगा। घर में कोई नहीं है? मां-बाप है नहीं छोटा भाई जबलपुर रेलवे में एकाउंटेंट के पद पर है। आनंद खरे नाम है, वह जानता है मैं लखनऊ में दाने-दाने को मोहताज हूं, लेकिन कभी देखने नहीं आया। अब तो बजरंगबली ही बेड़ा पार करेंगे। दिमाग कम काम करता है, शरीर भी जवाब दे रहा है। लखनऊ के लोग दिलदार है, खाने-पीने को दे देते हैं, उससे ही गुजारा होता है।

इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.