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शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

वंश-मेव-जयते


 वंश-मेव-जयते
आजादी के  इतने वर्षों बाद भी हम भ्रांति में ही हैं कि  हम धुर चाटुकार हैं या देश के एक  खास घराने के  गुलाम। देश के  पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की राजनीति•-पारिवारिक  विरासत को  पहले उनकी पुत्री इंदिरा गांधी ने आगे बढ़ाया फिर इंदिरा के पुत्र राजीव गांधी ने और अब सोनिया गांधी तथा राहुल गांधी उसी पारिवारिक  परम्परा को आगे बढ़ाने में जुटे हैं। क्या नेहरू, इंदिरा, राजीव की शख्सियत देश के अन्य सभी महापुरुषों और यहां तक  कि महात्मा गांधी से भी बड़ी हो गई थी कि नेहरू खानदान के कर्णधारों के  सामने देश के  सभी महापुरुष या नेता बौने नजर आने लगे? अन्य नेताओं महापुरुषों का कद बौना करने की नीयत से ही वंश-मेव-जयते देश में चल रही अरबों रुपए  की केन्द्रीय व राज्य सरकार की  तमाम योजनाएं, पुरस्कर , सडक़ें, संस्थान, स्टेडियम सब कुछ  नेहरू और नेहरू खानदान के  नुमाइंदों के  नाम पर चल रहे हैं। इन योजनाओं में से 90 जवाहर लाल नेहरू, 138 इंदिरा गांधी व 197 राजीव गांधी के  नाम हैं। केवल एक  संस्थान इंदिरा गांधी की मां कमला नेहरू के  नाम पर है। डॉ. राजेंद्र प्रसाद, लाल बहादुर शास्त्री , नेताजी सुभाषचंद्र बोस, सरदार वल्लभ भाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे महापुरुष देश के लोगों के  दिलों पर भले ही अब भी राज क रते हों, लेकिन  राज चलाने वालों के दिल पर इससे कोई फर्क  नहीं पड़ता, वे केवल दिमाग से चलते हैं वह भी शातिराना बुद्धि से। आज तक  इन महापुरुषों के  नाम पर किसी भी प्रकार की कोई  विशेष सरकरी योजना न तो केंद्र  सरकार की ओर से चलाई गई और न किसी भी राज्य सरकार की  तरफ से। शहीदे आजम भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खां, सुखदेव, राजगुरु, खुदीराम बोस, लाला लाजपत राय, वीर सावरकर, बाल गंगाधर तिलक, गोपाल कष्ण गोखले जैसे आजादी के  अनगिनत दीवानों का  तो इतिहास से नाम ही खत्म करने की  साजिश रची जा रही है। उनके नाम पर टूटे-फूटे स्मारक व दुर्गति को  पहुंचती मूर्तियां हैं। यही क्या कम हैं? हैरत और मजे दोनों  की बात यह है क़ि जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी व राजीव गांधी के  नाम पर अफगानिस्तान, मासको , मारीशस यहां तक क़ि पाकिस्तान  जैसे देश में भी संस्थाएं या पुरस्रकार  वगैरह चल रहे हैं लेकिन  नेहरू के  गृह राज्य जम्मू-कश्मीर में केवल एक  टनल और दो पार्को के  नाम नेहरू पर हैं लेकिन  एक भी जनहित योजना से नेहरू का नाम संलग्न करने से परहेज रखा गया है।

2 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

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विवेक ने कहा…

मिश्रा जी, आपके इस साहसिक कार्य की सराहना जितनी भी की जाए कम है......... मैं आपके इस साहसिक कार्य को अधिक से अधिक लोगों तक पहुचाऊंगा......

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