रोमिंग जर्नलिस्ट

शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

कश्मीर में पत्रकारिता का ‘बिकाऊ सच’



काशी में कोतवाल हो या कलाकार, किसी का भी पुतला फूंकनेे वाले लोगों की एक जमात है। इस जमात को औपचारिकता का बाना पहनाने के लिए किसी न किसी संगठन का नाम दे दिया जाता है। दुनिया में अगर कोई घटना होती है तो ऐसे संगठन पुतला फूंकनेे को तैयार रहते हंै, बस इंतजार होता है प्रेस फोटोग्राफरों के फोन आने का। पुतला फूंकने में माहिर संगठनों की चुस्ती-फुर्ती का दर्जनों बार चश्मदीद रहा हूं। कभी पुतला बनने के बाद दर्जनभर लोगों को बटोरकर जिंदाबाद-मुर्दाबाद करने के इंतजाम में देर होता तो मीडिया से जुड़े बंधु चाय-पान की खातिरदारी करने के साथ ..जल्दी करो बहुत काम है  का शोर मचाते रहते थे।  काशी से कश्मीर पहुंचने के बाद मीडिया के जिस पहलू से वाकिफ हुआ, वह काफी चौकाने वाला था। दो दिन की छुट्ïटी लेकर जम्मू से श्रीनगर पहुंचने के बाद वहां की खूबसूरती का कायल हो गया। चिनार के पेड़, बर्फीली वादियों के बीच जम्मू कश्मीर वूमेन कमीशन की सेक्रेटरी हाफीजा मुज्जफर की मेजबानी का लुत्फ उठा रहा था। डल झील को सिर्फ फोटो में ही देखता रहा हूं। चाहे जाड़ों में बर्फ जमने की या उस पर हाउसबोट में सैलानियों की। इसलिए पहली बार नजदीक से देखने के बाद आंखों में खूबसूरती का अद्भूत दरिया बहने लगा। दिल के अंदर इस मंजर के साथ आंखों की टानिक के लिए कश्मीर की खूबसूरत औरतों का प्राकृतिक सौन्दर्य देखकर अचानक सन्ï 1996 याद आ गया। सन्ï 96 में कश्मीर में सेना की तैनाती के साथ जवानों द्वारा वहां की महिलाओं के साथ बदसलूकी की कथित घटनाओं के पीछे का कारण भी समझ में आने लगा था। कश्मीरी औरतों की खूबसूरती को एकटक निहारते देखकर हाफीजा ने मेरा ध्यान बंटाने के लिए आंखों के सामने चुटकी बजाते हुए पूछा कहां खो गए हैं हुजूर? हाफीजा का यह अंदाज पसंद आया.. बोला कश्मीर की कली से लेकर खूबसूरत फूल तक देख रहा हूं। यह सुनकर वह बोली अब इस खूबसूरती पर दुनिया की बुरी नजर लग गयी है। कश्मीर की भोली-भाली लड़कियों को नौकरी के लालच में फंसाकर सेक्स के धंधे में धकेल देने का मामला, सीबीआई की जांच और मिस अनारा का एमएमएस कांड इन सब विषयों पर चर्चा प्रारंभ हुई तो बातचीत यहां तक पहुंच गयी कि दुनिया में कश्मीरी औरतों की मांग सबसे ज्यादा क्यों है? इस विषय पर चर्चा काफी देर तक चली। कश्मीर में डल झील पर घूमने के साथ चरमपंथी नेताओं से मिलने की इच्छी ही श्रीनगर खींचकर लायी थी। श्रीनगर में हिंदी अखबारों के कुछ पत्रकारों से मुलाकात करने के बाद यहां होने वाली छोटी-मोटी घटनाओं में सेना को बदनाम करने तथा मानवाधिकार उल्लंघन का बखेड़ा करने के पीछे की कहानी जानने की दिलचस्पी थी। अमर उजाला के श्रीनगर ब्यूरो के इंचार्ज रहे कानपुर के शैलेंद्र शुक्ला ने इस मसले पर गिलानी, यासीन मालिक जैसे नेताओं की फितरत और मीडिया में टेरर मैनेजमेंट के पीछे की जो असलियत उजागर की थी, वह हैरतअंगेज थी। पाकिस्तान से रूपये लेकर पूरे विश्व में कश्मीर मुद्ïदे पर ध्यान आकर्षित करने के लिए मीडिया मैनेजमेंट के खेल में अलगाववादी संगठनों के मुखिया का अहम रोल है। विभिन्न समाचारपत्र और टीवी चैनलों में काम करने वाले पत्रकारों को जिस तरह यूपी में पुलिस स्टेशन पर गलत काम करने वाले महीना रकम बांध लेते हैं, उसी तरह यहां के अधिकांश जर्नलिस्ट अलगाववादी संगठनों के इशारे पर पेड रिपोर्ट करते हैं। इनके एजेंट कई चैनलों और पत्रकारों को भारी धनराशि देकर कश्मीर में कट्ïटरपंथियों का पक्ष मजबूती से परोसने को मजबूर करते हैं, जो ऐसा नहीं करते हैं, उनको आंतकी संगठनों की और से जान से मारने की धमकी दी जाती है। अमर उजाला जम्मू संस्करण को ऐसी कई धमकियां मिल चुकी थी। दैनिक जागरण के एक खबरनवीस ने तो इस माहौल में रहकर उनके बीच काम करने के लिए अपने नाम के आगे एक नया शब्द भी जोड़ लिया। पाकिस्तान से भारत में आकर आतंक मचाने वाले आतंकियों की घुसपैठ को रोकने के लिए सेना जब तलाशी अभियान चलाती है तो उसका विरोध करने के लिए भाड़े पर युवकों के साथ भाड़े की मीडिया को बटोरकर उसकी ऐसी फुटेज बनवायी जाती है, जिससे लगे कि श्रीनगर में सेना आम लोगो को कितना प्रताडि़त कर रही है। सेना की छवि को धक्का पहुंचाने में कश्मीर की भाड़े पर काम करने वाली मीडिया का बहुत बड़ा रोल है। कश्मीर में सेना से जुड़ी घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने के साथ दुनियाभर के टीवी चैनलों और एजेंसियों को  फुटेज और फोटो बेचकर हजारों की कमाई करते हैं। कश्मीर में आईएसआई के इशारे पर काम करने वाली पत्रकारिता का ‘बिकाऊ सच’ जानकर दिल में बहुत कोफ्त हुआ। कश्मीर के साढ़े तीन लाख पंडितों को खदेड़ दिया गया, उनकी खोज-खबर लेने से दूर रहने वाली मीडिया के कारिंदों की काली करतूत देखने के बाद और भी गुस्सा आया। पैसे लेकर दुनिया में हिंदुस्तान की छवि बिगाडऩे वाली कश्मीर की मीडिया के हाल पर क्षोभ हुआ। अगले दिन गिलानी से मिलने की बात सोची। सेना और उसके प्राइवेट कारिंदों की तलाशी के बाद उनके दरबार-ए-खास में पहुंचा। उसके पहले ही विजीटिंग कार्ड भिजवाया। आधे घंटे इंतजार के बाद गिलानी साहब सफेद दाढ़ी को सहलाते हुए बाहर आए।  दरबार-ए-खास में मौजूद सब लोग आदाब..आदाब कहते हुए खड़े हो गए, मैं अपने जगह पर बैठा ही रहा। शाही कुर्सी पर बैठने के बाद गिलानी ने रौबदार आवाज में कहा कि सुना है कोई अखबार का नया नुमाइंदा आया है। मैने उतनी ही रौबदार आवाज में कहा मैं हूं जनाब, नाम है दिनेश चंद्र मिश्रा। अमर उजाला में हूं, काशी से कश्मीर आया हूं। आवाज अपनी भी बचपन ही तेज है, माता जी कहा करती थी लगता है गुल्लू(घर का नाम) तुम्हारे गले में दाई ने अंगुली की जगह बांस डाल दिया है। गिलानी की आवाज का प्रतिउत्तर उससे भी तेज आवाज में देने पर  बड़े गौर से देखने के बाद बोला एक और पंडित आ गया। पंडितों के प्रति उनका उपेक्षापूर्ण भाव देखकर कहा कि लगता है आपको पंडितों से बहुत नफरत है। जवाब में उन्होंने कहा जनाब नफरत आज से नहीं है, नेहरू के जमाने से है। नेहरू को लेकर गिलानी अपना विष वमन करते रहे। उनकी सुनने के बाद कुछ सवाल किया तो जवाब था इंडिया गर्वमेंट सोने की सडक़ भी बनवा दे तब भी कुछ नहीं हो सकता है। दुनिया कश्मीर में भारत सरकार के इशारे पर सेना क्या कर रही है, इसे देख रही है। गिलानी द्वारा मीडिया के कंधे पर बंदूक रखकर कश्मीर की गोली चलाना पसंद नहीं आया। मैने कहा मीडिया कैसे कौन सी खबर रिलीज करती है, इससे रियासत में आने के बाद बखूबी वाकिफ हो गया हूं। एक घंटे गिलानी के साथ बिताने के बाद खबर के नाम पर उसने जो जहर उगला वह छापने लायक नहीं था। कश्मीर में मीडिया का ‘बिकाऊ सच’ देखने के बाद माता रानी से प्रार्थना की कि ‘हिंदुस्तान की रोटी खाकर पाकिस्तान के लिए काम करने वाले कुत्तों को सद्ïबुद्घि दें। ’ इति!!
क्रमश .....

4 टिप्‍पणियां:

हितेन्द्र ने कहा…

इस सार्थक खबर के लिए धन्यवाद| खाना यहां का और गाना वहां का, यह तो इस देश के गद्दारों की पुरानी आदत है|

alka_astrologer ने कहा…

इस सार्थक खबर के लिए ध्न्यवाद , ऐसे लोगों का भारत सरकार दमन क्यों नहीं करती है येह भी एक तरह के आतंकवादी ही है

PRITI ने कहा…

सच कभी बिकाऊ नहीं होता पर जम्मू कश्मीर में झूठ को सच
का बाना पहना कर खूबसूरती के साथ प्रस्तुत किया गया जो
देश हित में घातक है .आपने उस झूठ का आवरण उतार कर
सच्चाई को सबके सामने लाने का साहसी प्रयास किया ,ये हर
एक के बस की बात नहीं होती की इतनी निर्भीकता और बेबाकी
के साथ अपने आप को साबित का सके . सदैव शुभकामनाएं !!

sarvesh upadhyay ने कहा…

सर क्या लगता है जब ऐसा क्या जाय तब क्या करना चाहिए | इसको पढ़ के चुप बैठना भी बेकार है | क्या करे ?

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