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रविवार, 24 जुलाई 2011

चमचागीरी की कांग्रेसी कला

चमचागीरी की कांग्रेसी कला
चार ‘च’ यानी चुगली, चापलूसी, चरण वंदन और चमचागीरी में आपको महारथ हासिल है तो राजनीति में आप चमक सकते हैं। आज की राजनीति का कड़वा सच यही है। चार ‘च’ का विषबेल भारतीय राजनीति में पसर गया है।
1947 में आजादी मिलने के बाद महात्मा गांधी ने ‘भारतीय राष्टï्रीय कांग्रेस पार्टी’ के विघटन की इच्छा की थी। उनके पास कांग्रेस के विघटन के तर्क थे और दूरदृष्टि भी थी। इसलिए कि कांग्रेस के पास आजादी की धरोहर थी। कांग्रेस का मुख्य लक्ष्य आजादी था। महात्मा गांधी ने यह महसूस किया था कि ‘कांग्रेस’ के पास आजादी के इस धरोहर के साथ खिलवाड़ और नैतिकता के साथ ही साथ जनविरोधी राजनीति का पर्याय बनाया जा सकता है। इसलिए कांग्रेस का विघटन जरूरी है। महात्मा गांधी के इस इच्छा का सम्मान न हुआ और जवाहर लाल नेहरू ने कांग्रेस को अपने परिवारिक सत्ता उत्थान का मोहरा बना दिया। आज कांग्रेस के अंदर घटने वाली घटनाएं यह कहने और बताने के लिए तत्पर हैं कि महात्ता गांधी की वह इच्छा कितनी सटीक और दूरदृष्टि से परिपूर्ण थी।   
चाटुकारिता और अनैतिकता कांग्रेस के खून में रची-बसी है और उसकी राजनीतिक धमनियों में यह सब अनवरत बहती रहती है। चाटुकारिता और अनैतिकता की लहर बहाने के जिम्मेदार जवाहर लाल नेहरू थे। कांग्रेस में उन्होंने आजादी की धरोहर से जुड़े हुए राजनीति की धाराएं रोकीं और इसकी जगह चाटुकार और अनैतिकता से भरी हुई राजनीतिक शख्सियतों को स्थापित कराया। नेहरू ने चन्द्रभानु गुप्त, विधानचंद्र राय, मोरारजी देशाई जैसे अनेकों आजादी की शख्सियतों को हासिये पर डाला। संसद और राज्य विधान सभाओं के साथ ही साथ सरकारों पर नेहरू की जाति ब्राम्हणों का आधिपत्य हुआ। परिवारवाद का वृक्षारोपण हुआ। इसका उदाहरण था नेहरू द्वारा अपनी पुत्री इंदिरा गांधी को अपना उत्तराधिकारी घोषित करना और कांग्रेस की अध्यक्ष पद पर बैठाना। उस समय इंदिरा गांधी की राजनीतिक कमाई इतनी भर थी कि वह जवाहर लाल नेहरू की पुत्री थी। कांग्रेस की अध्यक्ष के रूप में इंदिरा गांधी ने वरिष्ठ और नैतिकता वाले कांग्रेसियों को बाहर करने में कोई कंजूसी नहीं बरती। लाल बहादुर शास्त्री की असमय संदेहास्पद मृत्यु के बाद प्रधानमंत्री पद पर इंदिरा जा बैठीं। अपने मनपसंद उम्मीदवार को राष्ट्रपति  का उम्मीदवार नहीं बनाये जाने पर इंदिरा गांधी ने अपनी पार्टी के राष्ट्रपति  पद के उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी को परास्त कराया और निर्दलीय वीवी गिरी को राष्ट्रपति बनाया। लोकतंत्र में ऐसा उदाहरण और नहीं मिलेगा जिसमें प्रधानमंत्री ने खुद अपने दल द्वारा घोषित राष्ट्रपति के उम्मीदवार को पराजित कराने की राजनीतिक चाल चली हो। इंदिरा गांधी ने भारतीय राजनीति में चाटुकारिता और अनैतिकता से भरी शख्सियतों की नई धारा बहाई। देवकांत बरुआ की चाटुकारिता भारतीय राजनीति में हमेशा चर्चित रही है। देवकांत बरुआ ने इंदिरा गांधी की चमचागीरी में कहा था कि ‘इंदिरा इज ए इंडिया-इंडिया इज ए इंडिया।’ इंदिरा गांधी के मुंह से निकलने वाले हर शब्द को शिरोधार्य माना जाने लगा। इंदिरा गंाधी ने केवल राजनीति में ही मोहरे नहीं बैठाये बल्कि संवैधानिक संस्थाओं में भी चाटुकारों की श्रृंखला स्थापित की। इसका परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस पूरी तरह से चमचों के चंगुल में फंस गयी। विरोध प्रकट करने और असहमति जताने की लोकतांत्रिक धारा रुक गयी। इंदिरा गंाधी निरंकुश हो गयीं। 1971 में बांग्लादेश में हुई जीत से इदिरा गांधी की निरंकुशता और बढ़ गयी। चारों तरफ गुणगान करने वालों की भीड़ लग गयी। ऐसी स्थिति बड़ी सी बड़ी राजनीतिक शख्सियत को भी सोचने-समझने की शक्ति समाप्त कर देती है। इंदिरा गाधी का आपातकाल इसी दृष्टिकोण का परिणाम था। आपातकाल ने हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर कैसा संकट खड़ा किया यह जगजाहिर है। चापलूसी की अपसंस्कृति कांग्रेस में किस कदर बढ़ी, इसे समझने के लिए इंदिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी की चप्पल उठाने वाले दो तत्कालीन मुख्यमंत्रियों के किस्से मशहूर हैं। लखनऊ में तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी और मुंबई में महाराष्टï्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री शंकर राव चव्हान ने संजय गांधी के चप्पल ढोये थे। शंकर राव चव्हान महाराष्टï्र के हाल ही मुख्यमंत्री रहे अशोक चव्हान के पिता थे। शंकर राव चव्हान तो अब जिंदा नहीं हैं पर नारायण दत्त तिवारी जिंदा हैं। सोनिया गंाधी की पीढ़ी में भी चाटुकारों और चमचों की भीड़ है, इसमें प्रधानमंत्री से लेकर कई ताकवर मंत्रियों और आला नेताओं के नाम शुमार हैं। राहुल के मुंबई दौरे में जिस तरह चाटुकारिता की स्खलित राजनीतिक पारिपाटी दिखी वह चरम है। महाराष्टï्र के गृह राज्य मंत्री रमेश ने राहुल गांधी का न केवल चप्पल उठाया बल्कि चप्पल उठाकर चलते भी देखे गये। इस चप्पलकारिता पर राहुल को भी कोई कोप नहीं हुआ बल्कि वे अपनी मुस्कान बिखरते हुए इसका आनंद लेते रहे। जबकि राहुल बार-बार यह कहते हैं कि कांग्रेस में चाटुकारिता नहीं चलेगी।  वाकई चापलूसी भारतीय राजनीति का ब्रह्मïास्त्र है। 2008 में अर्जुन सिंह ने बयान दिया कि राहुल को प्रधानमंत्री बनाने में हर्ज नहीं। इस पर अर्जुन सिंह के पीछे सारे लोग हाथ धोकर पड़ गए। कांग्रेस को बयान जारी करना पड़ा कि कांग्रेस नेतृत्व चापलूसी पसंद नहीं करता। अखबारों के मुखपृष्ठों पर इधर ये बयान छपा और उधर प्रणब मुखर्जी का दोगुनी चापलूसी वाला बयान भी छपा। एक साथ दोनों बयान! इसके बाद तो दिग्विजय सिंह ने चमचागीरी की इंतिहा ही कर दी। कांग्रेस ने चापलूसी को उच्च-कोटि की ललित कला बना दिया है। वह कला ही नहीं, विज्ञान भी बन गई है। कितनी चापलूसी कहां और कैसे करनी चाहिए, इस विधा के महारथी जितने कांग्रेस में पाए जाते हैं, किसी और पार्टी में नहीं। इसका नतीजा क्या होता है? यह संक्रामक रोग की तरह है। कांग्रेस की देखादेखी यह देश की अन्य पार्टियों में भी फैल गई है। भारतीय राजनीति के साठ साल में से लगभग 50 साल कांग्रेस का राज रहा है। कांग्रेसियों के आचरण ने शेष सभी दलों को प्रभावित किया है। चापलूसी राजनीतिक संस्कृति का अभिन्न अंग बन गई है। अनुयायी नेताओं की तरह कुर्ता, बंडी, टोपी पहनने लगते हैं, भाषण देते वक्त उनकी तरह हाथ-पांव फेंकने लगते हैं, उसी ठाठ-बाट से रहने लगते हैं। आज के नेता कोई गांधी की तरह नहीं हैं कि उनके सदगुणों को उनके अनुयायी अपने जीवन में उतारें। नेता वैसा आग्रह करते भी नहीं और अनुयायी वैसा करना जरूरी भी नहीं समझते। हमारी राजनीति ऊपर से चमकदार और अंदर से खोखली होती चली जा रही है।
किसी पार्टी के कार्यकर्ता में यह दम नहीं कि वह अपने नेता से पूछे कि इतना पैसा कहां से लाते हैं, इतनी संपत्ति कैसे जुटाई, रोज इतना खर्च कैसे करते हैं? व्यभिचार और मद्यपान करते डर नहीं लगता? पत्नी, बेटे-बेटी और भतीजे-भतीजी को हमारी छाती पर सवार क्यों कर रहे हैं? आप फलां को प्रदेशाध्यक्ष, फलां को महामंत्री, फलां को राज्यपाल, फलां को मुख्यमंत्री और फलां को मंत्री क्यों बना रहे हैं? नेता को सारे अधिकार समर्पित करके हमारे देश के पार्टी कार्यकर्ता अपनी बुद्घि को स्थायी तौर पर सुला देते हैं।
कांग्रेस में चापलूसी संस्कृति के नए सितारे बनकर दिग्विजय सिंह उभरे हैं। इनके बारे में क्या कहा जाए, चापलूसी में यह क्या-क्या कह सकते हैं, इसकी कल्पना करना मुश्किल है। दिग्विजय सिंह ने राजनीतिक कारीगरी अपने गुरु अर्जुन सिंह से सीखी है और अर्जुन सिंह अपने जमाने के जाने-माने राजनीतिक चाणक्य रहे हैं।

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