रोमिंग जर्नलिस्ट

बुधवार, 13 जुलाई 2011

हम खिलाएंगे बिरयानी, खाएंगे बम

हम उस देश के वासी है, जिस देश में गंगा बहती है.. इस गीत को आप भूल जाइए, अब हम उस देश के वासी है, जहां खून की नदियां बहती हैं। आम आदमी के जान की कीमत कीड़े-मकोड़े से ज्यादा नहीं है। अगर आप आतंकवादी है तो सरकार आपको दामाद की तरह सेवाभाव करेगी। कोर्ट भले ही फांसी की सजा दे लेकिन वोट की लालच में अतिथि देवो भव: की संस्कृति दिखाई जाएगी। आतंकवादी अगर बिरयानी मांगेंगे तो उनको हैदराबाद की बिरयानी के साथ कबाब भी परोसा जाएगा। ऐसे हिंदुस्तान का भविष्य क्या है सर? प्लीज आप बताइए?
गुरुवार को सबेरे ई-मेल खोलने पर यह सवाल लखनऊ विषय में परास्नातक की पढ़ाई करने वाली फेसबुक की दोस्त नेहा ने पूछा। इस ई-मेल को पढऩे  के बाद बहुत देर तक सोचता रहा है नेहा का सवाल गलत तो नहीं है।
जिन्होंने देश का दिल दहलाया अभी भी वह सजा का इंतजार कर रहे हैं। देश के खिलाफ जंग छेडऩे वाले कसाब को हत्या, हत्या की साजिश, देश के खिलाफ जंग छेडऩा, हत्या में सहयोग देने और गैर कानूनी गतिविधि अधिनियम के तहत आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने के आरोप में फांसी की सजा सुनाई गई। लेकिन अभी तक फांसी नहीं दी गई है। कांग्रेस सरकार वोट की राजनीतिक में उसके सेवा-सत्कार में जुटी है। कानूनी दांव-पेंच के सहारे जनता को भ्रम के मायाजाल में घूमा रही है, वहीं कसाब जन्मदिन पर बिरयानी खाने के बाद रिटर्न गिफ्त के रूप में बम फोड़वा रहा है। 
यही हाल संसद पर हमले का दोषी अफजल गुरू का भी है। वह भी अभी फांसी का इंतजार कर रहा है। इसकी दया याचिका 2005 से लंबित है। आलम यह है कि जिस दिन अफजल की दया याचिका राष्टï्रपति सचिवालय पहुंची, उसे तत्काल गृह मंत्रालय भेज दिया गया। वहां से उसे दिल्ली सरकार को भेज दिया गया और डेढ़-दो सालों तक दिल्ली सरकार ने इस संबंध में एक बैठक तक नहीं की। बाद में जब यह बात सामने आई, तब आनन-फानन में दिल्ली सरकार ने फाइल आगे बढ़ाई। इसके नाम पर राजनीतिक रोटियां सेंकी जा रही हैं।
आतंकवादियों के प्रति सरकार के सम्मान का सिलसिला यहीं नहीं थम रहा है। सन्ï 1993 के मुम्बई सीरियल बम कांड में करीब 200 से अधिक निर्दोष लोगों की मौतों के जिम्मेदार और 700 से अधिक लोगो को घायल करने वालों को सजा नही हो पाई है। इस बम कांड के 13 साल बाद कोर्ट का फैसला आया, तो दोषियों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी जहां अब भी इस केस पर सिर्फ सुनवाई चल रही है। लश्कर ए तैय्यबा के आतंकी मुहम्मद आरिफ ने 2000 में दिल्ली के लालकिले में घुसकर सेना के तीन जवानों की हत्या और 11 को घायल करने वाले इस शख्स की फांसी की सजा पर अभी तक सुनवाई जारी है। सन्ï  2002 में अक्षरधाम मंदिर पर हमलावरों को फांसी देने का मामला भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। सन्ï 2005 में दीपावली के मौके पर दिल्ली के बाजारों में खुशियों के बदले मौत बांटने वालों की भी अभी सुनवाई चल रही है। सन्ï 2006 में मुम्बई लोकल ट्रेनों में विस्फोट करने आतंकियो को सजा मिलने में भी अभी देरी है।
मुंबई में हुआ सीरियल ब्लास्ट आतंकवादियों की तरफ से 26 / 11 में शामिल एकमात्र जीवित आतंकी अजमल कसाब को दिया गया बर्थडे गिफ्ट है ? वैसे तो कसाब के बर्थडे को लेकर काफी कन्फ्यूजन है लेकिन मुंबई एटीएस की पूछताछ की फाइल में कसाब की जन्म तिथि 13 जुलाई 1987 बताई गई है। टाइम्स ऑफ इंडिया में 25 फरवरी 2011 को छपी एक खबर के मुताबिक सेंसस अधिकारियों ने भी कसाब की जन्म तिथि 13 जुलाई 1987 नोट की थी। अब तो देश के जो हालात हो गए है, उसे देखकर लगता है महापुरुषों के नहीं आतंकवादियों के जन्मदिन अपनी जान की खैरिएत के लिए लोगों को याद रखने होंगे। पता नहीं कल कौन कसाब बिरयानी के बदले फिर कहीं बम चला दे।

7 टिप्‍पणियां:

Ajayendra Rajan ने कहा…

hum dhairyawan nahi kayaron ki list me shumar ho chuke hain...

dinesh ने कहा…

app sahi kah rahe hai bhai. sawala hai akhir kab tak hum bum khakar marte rahenge aur woh biryani khaynege

neesuu ने कहा…

Its terrible !is desh ka kuch nahi ho sakta.aam aadmi isi tarah marta rahega aur hamare neta bas babi badi baatein karte raheinge.

PRITI ने कहा…

jab vote dene ka samay aata hai to netaon ke lubhavne waadon me ham apne vivek ka istmaal karna bhool jate hain .jo kursi par baithe hain unhe ham ne hi wahan pahuchaya hai . chunaaw ke samay yadi ham apne vivek se kaam le to shayad ye samsya kuchh hal ho sake ...

uldhan ने कहा…

india me vote ke naam par thousands of larg dedbody milna bahut asaan hai. ye india ha bhae sab chalta hai

बेनामी ने कहा…

यह सच्चाई है. जब तक देश की जनता रास्ते पर नहीं उतरेगी और कांग्रेस को देश के बहार फेकेगी, तब तक यह चलता रहेगा.

मुकुट सक्सेना ने कहा…

हम स्वयं जिम्मेदार हैं, वास्तव में हम कायर हैं, मरे हुए लोग. अपनी-अपनी लाशें ढो रहे हैं.

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