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शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

नेहरू के चलते पैदा हुआ ‘शेखिस्तान’ का शूल


नेहरू के चलते पैदा हुआ ‘शेखिस्तान’ का शूल
रात के दो बजे थे। बिस्तर पर कंबल लपेटकर नींद की गोद में जाने के लिए करवटे बदल रहा था।  मोबाइल पर अचानक उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की शहनाई की कर्णप्रिय धुन का रिंग टोन बजने लगा। अंधेरे में मोबाइल को बिस्तर को टटोलने लगा। हाथ में मोबाइल आया तो स्क्रीन पर नजर पड़ते ही तीन साल पहले के गोरखपुर के पुराने पत्रकार मित्र का नंबर दिखा। निशाचर प्रजाति में गिने जाने वाले पत्रकारों को अक्सर यार-दोस्तों से प्रेम जागने का यही सही समय होता है। मैने फोन उठाते हुए कहा कि अबे इतने अरसे बाद याद आयी। दिनेश तुम तो दिल में बसते हो, दिल से दिल की बात होती रहती है। तुम्हारी खबरें पढ़ता रहता हूं। मैने कहा यह बताने के लिए फोन किए हो, नहीं यार अपने घर का एक बच्चा आपके पास पहुंचा है नाम है पुष्कर पाण्डेय। वह बहुत परेशान है, उसको तुम्हारे सहारे की जरूरत है। मैने कहा कि यहां किसी को किसी के सहारे की नहीं सिर्फ माता रानी के आर्शीवाद की जरूरत है। वैसे पुष्कर बगल में खर्राटे भर रहा है, कहिए तो जगा दें। पांच मिनट तक बातचीत के बाद फोन रखकर माता रानी का नाम लेकर सो गया। सबेरे नींद खुली तो फ्रेश होने के बाद पुष्कर की रजाई खींचकर उठा दिया। खुद आफिस जाते हुए कहा आप भी फ्रेश होकर आइए, आज आपको सैर कराएंगे। मीटिंग के बाद आज पुष्कर के साथ जम्मू घूमने का प्लान बना लिया था। पुष्कर पाण्डेय के आते ही उनको लेकर सबसे पहले तवी नदी का दर्शन कराने चला गया। रास्ते में जम्मू-कश्मीर के बारे में जो जानकारी बटोरी थी उसका सस्वर पाठ करने लगा। पुष्कर जी धरती पर स्वर्ग अगर कहीं है तो वह कश्मीर में ही है। इसको यह उपमा दी तो गई है उसके प्राकृतिक सौंदर्य से अभिभूत होकर, लेकिन इतिहास, संस्कृति और सभ्यता की दृष्टि से भी यह कुछ कम समृद्ध नहीं है। शंकराचार्य मंदिर और हजरतबल की पवित्रता, नागिन झील व डल झील का झिलमिलाता सौंदर्य, मुगल उद्यानों का शाही अंदाज, हिमशिखरों का धवल सौंदर्य और सुकून देती आबोहवा, ये सब ऐसा सघन आमंत्रण देते हैं, जिससे इनकार कर पाना किसी के लिए संभव नहीं है। भाई साहब किसी दिन कश्मीर भी चलिए, वहां भी घूमने चला जाए। चला जाएगा घबड़ाओ नहीं। माता रानी ने अपने पास आर्शीवाद देने के लिए बुलाया है। तवी नदी के किनारे पहुंचकर एक पत्थर पर बैठकर हम दोनो बहते पानी में पैर डालकर आनंद लेने लगे। जम्मू-कश्मीर का वर्णन सुनकर पुष्कर की दिलचस्पी बढ़ती जा रही थी। बोले भाई साहब यह भले ही धरती का स्वर्ग है लेकिन अपना घर स्वर्ग से सुंदर है।  यह तो है ही लेकिन हम लोग जिस पेशे में आए हैं, वह अपने शौक और रोमांच से आए है। इसके फायदा और नुकसान किसी और को नहीं हमको ही मिलेगा। आधा घंटे से ज्यादा वक्त तवी के किनारे बिताने के बाद रघुनाथ मंदिर की तरफ पैदल चल दिए। रघुनाथ मंदिर का दर्शन करने के बाद पुष्कर ने सवाल पूछा कि कश्मीर के इन हालातों के लिए जिम्मेदार कौन है? मैने कहा कि इसके लिए जिम्मेदार एक मात्र व्यक्ति है, वह है जवाहर लाल नेहरू। यह जवाब सुनकर पुष्कर चौंकते हुए कहे यह आप कैसे कह सकते हैं। मैने उन्हें फिर जम्मू-कश्मीर का पहली बार राज्यपाल बने जगमोहन के एक लेख का हवाला देते हुए कहा कि उनसे ज्यादा इस रियासत को किसी शख्स ने नजदीक से नहीं देखा है। 26 अप्रैल 1984 को जम्मू और कश्मीर में राज्यपाल के रूप में जगमोहन जब यहां पहुंचे, तो उनको सीधे राजभवन ले जाया गया। यहां उनको वह कॉम्प्लेक्स दिखाया गया, जहां से डल झील, शंकराचार्य पहाड़ी व हरि पर्वत का भव्य नजारा दिखता था। उनकी नजर एक खूबसूरत बरामदे की ओर गयी तो बताया गया जवाहरलाल नेहरू जब भी श्रीनगर आते थे, यहीं बैठकर सूर्यास्त का खूबसूरत नजारा देखते थे। बाद में वह भी इस बरामदे से सूर्यास्त के जादुई सौंदर्य का अनुभव महसूस किए होंगे। लेकिर नेहरू के बारे में उनका कहना था कि उनके पास नैसर्गिक सौंदर्य के प्रति एक बेहद संवेदनशील दृष्टि थी। उन्होंने लिखा कि नेहरू इस नजारे को किस तरह निहारते होंगे, इसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। बकौल जगमोहन कश्मीर घाटी से नेहरू के निजी और काव्यात्मक लगाव ने मुझे रोमांचित किया, वहीं कश्मीर समस्या के संबंध में उनके द्वारा लगातार की गई गलतियों से कभी-कभी मुझे निराशा भी हुई। यह एक त्रासदी या विडंबना ही है कि नेहरू जैसे महान नेता ने, जिनकी अंतर्दृष्टि व इतिहास बोध अद्भुत था, महत्वपूर्ण अवसरों पर ऐसी दुखद गलतियां कीं। पहली गलती तब हुई, जब नेहरू ने माउंटबेटन द्वारा 27 अक्टूबर 1947 को जम्मू और कश्मीर के महाराजा को लिखे गए उस पत्र की विषयवस्तु पर आपत्ति नहीं ली, जिसमें उन्होंने उनके राज्य के भारत में विलय पर सहमति जताई थी। यह पत्र भारत में विलय होने वाली अन्य रियासतों के शासकों को भेजे गए पत्रों के अनुरूप ही होना चाहिए था। लेकिन माउंटबेटन ने इसमें अनावश्यक रूप से यह भी जोड़ दिया: ‘यह हमारी सरकार की इच्छा है कि जैसे ही जम्मू और कश्मीर में कानून-व्यवस्था की स्थिति बहाल हो और उसकी धरती आक्रांताओं से मुक्त हो जाए, वैसे ही विलय की समस्या का समाधान उसके लोगों की इच्छा के मुताबिक हो।’ यह भूल तब और गंभीर हो गई, जब 28 अक्टूबर को राष्टï्र के नाम संबोधन में नेहरू ने ‘संयुक्त राष्टï्र के तत्वावधान में हुए जनमत संग्रह’ शब्दों का इस्तेमाल किया। 1 जनवरी, 1948 को इस मसले को संयुक्त राष्टï्र में ले जाना एक और भूल थी। संयुक्त राष्टï्र चार्टर के चैप्टर 7 के स्थान पर चैप्टर 6 के तहत शिकायत दर्ज करने से यह भूल और भी गंभीर हो गई। जहां चार्टर का चैप्टर 7 पराधिकार के अधिनियमों से संबंधित है, वहीं चैप्टर 6 (अनुच्छेद 34 और 35) सुरक्षा परिषद को केवल इतना ही अधिकार देता है कि वह ‘विवाद के शांतिपूर्ण समाधान के लिए उपयुक्त प्रक्रियाओं और प्रणालियों की अनुशंसा करे।’ इसके आधार पर ही सुरक्षा परिषद ने यह निर्णय दिया कि ‘इस समस्या पर समग्र रूप से विचार किया जाए और युद्धविराम की स्थिति को विवाद के अंतिम समाधान की संभावनाओं से अलग नहीं माना जा सकता।’ 1 जनवरी 1949 को, जब भारतीय सेनाएं छापामारों और पाकिस्तानी सैन्य टुकडिय़ों को निकाल बाहर करने की स्थिति में थीं, तब ‘सीजफायर’ के लिए सहमत होना भी एक और बड़ी भूल थी। लेकिन सबसे गंभीर भूल जो उन्होंने की, वह यह थी कि वे शेख अब्दुल्ला की छिपी हुई महत्वाकांक्षाओं को समझ नहीं पाए। वे समझ नहीं समझ पाए कि अब्दुल्ला अपने और अपनी मंडली के लिए एक स्वतंत्र ‘शेखिस्तान’ के निर्माण के लिए लालायित हैं। फ्रैंक मॉरेस ने वर्ष 1951 में ही अपनी किताब विटनेस टु एन एरा में लिख दिया था कि ‘सत्ता का मोह अब्दुल्ला के सिर चढक़र बोल रहा है.. वे बेहद अहंकारी व्यक्ति हैं.. वे नईदिल्ली के प्रति अवमाननापूर्ण रुख रखते हैं.. लगता है कि उनका दिमाग कश्मीर घाटी की आजादी के बारे में सोच रहा था और वे स्वयं कश्मीर के शहंशाह बनना चाहते थे।’लेकिन नेहरू ने इन बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। इसके बजाय उन्होंने भारतीय संविधान में धारा 370 को शामिल करने से लेकर राज्य के लिए अलग ध्वज अपनाने जैसी अब्दुल्ला की तमाम मांगों पर सहमति जताई। इन सबसे अब्दुल्ला की सत्ता की भूख और बढ़ी तथा उन्होंने आजादी के लिए ‘पूर्ण स्वायत्तता’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। अब्दुल्ला ने पश्चिमी ताकतों के वरिष्ठ प्रतिनिधियों से गुपचुप संपर्क किया, जो उनकी कपटपूर्ण राजनीति का नया आयाम था। तत्कालीन भारत में अमेरिकी राजदूत लॉय हैंडरसन की सितंबर 1950 की रिपोर्ट पढऩे के बाद किसी को इस पर संदेह नहीं होना चाहिए। हैंडरसन ने इसमें लिखा, ‘भविष्य के कश्मीर के बारे में चर्चा करते वक्त अब्दुल्ला का जोर इस बात पर था कि यह स्वतंत्र होना चाहिए।’ 3 मई, 1953 को एडलाई स्टीवेंसन ने श्रीनगर आकर शेख अब्दुल्ला से भेंट की। इसके तुरंत बाद द न्यूयॉर्क टाइम्स में घाटी का एक नक्शा प्रकाशित हुआ, जो उसकी स्वतंत्र स्थिति की ओर इशारा करता था। हालांकि नेहरू को इस बारे में आगाह किया गया था, फिर भी वे आंखें मूंदे रहे। लेकिन ठोस सच्चाइयों को ज्यादा दिन तक छुपाया नहीं जा सका। अगस्त 1953 के पहले हफ्ते में शेख अब्दुल्ला का एक भाषण खुफिया एजेंसियों के हाथ लग गया। इसमें उन्होंने अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में कश्मीर के भारत से बदलते रिश्ते पर सवाल उठाया था।
इसके बाद तो नेहरू भी अब्दुल्ला को मदद नहीं कर सकते थे। उन्हें पद से हटा दिया गया, हिरासत में लिया गया और बाद में उन पर मुकदमा भी चलाया गया। लेकिन जनवरी 1962 में नेहरू ने राज्य सरकार को कश्मीर षड्यंत्र के इस केस को वापस लेने के लिए राजी कर लिया। नेहरू अपने पीछे एक ऐसे कवि-राजनेता की विरासत छोड़ गए, जिनका आदर्शवाद घाटी की छल-प्रपंच की राजनीति के साथ मेल नहीं खाता था। आज भी मैं यह तय नहीं कर पाता कि घाटी में बहने वाले खून के लिए किसे दोष दिया जाए- अति महत्वाकांक्षा, अति विश्वास या जमीनी।
जम्मू-कश्मीर का गर्वनर बनने के बाद जगमोहन की कलम से निकली यह जानकारी पुष्कर को बताने के बाद घड़ी की तरफ देखा तो दो बजे थे। सोचा इनको कहीं और ले चले। जम्मू यूनिवर्सिटी नजदीक थी। रंग-बिरंगे छात्र-छात्राओं को देखकर पुष्कर का मूड थोड़ा चेंज हो जाएगा, यह सोचकर उन्हें लेकर उधर चल दिया। उस समय जम्मू के मोबाइल बाजार में जम्मू यूनिवर्सिटी का एक एमएमएस प्रकरण सुर्खियों में था। जम्मू यूनिवर्सिटी के भीतर बना एमएमएस देखकर खुजराहो के  प्रसिद्घ मंदिर के बिंदास संस्करण से वाकिफ हुआ जा सकता था। इस एमएमएस की खबर पढ़ चुके पुष्कर जब जम्मू यूनिवर्सिटी परिसर पहुंचे तो उनकी निगाह कुछ खोजती नजर आयी। खेल मैदान में लगे पेड़ के झुरमुट से लेकर कैंटीन तक में वह ऐसे नजारे देखे, जो शायद ही यूपी में कहीं दिखते हो। ऐसे कई दृश्यों को देखकर बोले भाई साहब यह तो बहुत बिंदास यूनिवर्सिटी है। मैने कहा यह कुछ नहीं है, इससे भी कई बिंदास जगह जम्मू-कश्मीर में है, फिर कभी चलेंगे।
क्रमश:

8 टिप्‍पणियां:

PRITI ने कहा…

very nice report ,congratulations !!"LAMHON NE KHATA KI THI .......SADIYON NE SAZA PAAIE ...." AUR YE SILSILA KAB TAK YUN HI CHALTA RAHEGA ? KAB TAK ISKI BHARPAI KARNI HOGI ?????

PRITI ने कहा…

नेहरू जैसे महान नेता ने, जिनकी अंतर्दृष्टि व इतिहास बोध अद्भुत था, महत्वपूर्ण अवसरों पर ऐसी दुखद गलतियां कीं। सत्ता का मोह अब्दुल्ला के सिर चढक़र बोल आज भी मैं यह तय नहीं कर पाता कि घाटी में बहने वाले खून के लिए किसे दोष दिया जाए- अति महत्वाकांक्षा, अति विश्वास या जमीनी।रहा है.. . निशाचर प्रजाति में गिने जाने वाले पत्रकारों को अक्सर यार-दोस्तों से प्रेम जागने का यही सही समय होता है। मैने कहा कि यहां किसी को किसी के सहारे की नहीं सिर्फ माता रानी के आर्शीवाद की जरूरत है। " best part of the report."

arun misra ने कहा…

jsmmu & kasmir ke prati mahatvapurna jankari huyee, desh ke mahan neta ki chad galatiyon ki bharpai hamain sadiyon tak karani hogi.

Sambhrant Mishra ने कहा…

ye lekh pad kar jammu- kashmeer ghumne ki betabi si ho rahi hai, puskar ji tarah apka sath mujhe bhi mile to dhanyabhaag hamare.....

बेनामी ने कहा…

http://rpmonline.messageboard.nl/posting.php?mode=reply&t=346
http://britishboxinggreats.co.uk/forum/newreply.php?do=newreply&p=92235

VASUDEV TRIPATHI ने कहा…

nehru gave this gift to india and nehru family is trying to protect this gift forever..!!!

Naman ने कहा…

सत्य वचन महाराज नेहरू ने तो वाट लगा दी हिन्दुस्तान की

Naman ने कहा…

सत्य वचन महाराज नेहरू ने तो वाट लगा दी हिन्दुस्तान की

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