रोमिंग जर्नलिस्ट

शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

कश्मीर में पत्रकारिता का ‘बिकाऊ सच’



काशी में कोतवाल हो या कलाकार, किसी का भी पुतला फूंकनेे वाले लोगों की एक जमात है। इस जमात को औपचारिकता का बाना पहनाने के लिए किसी न किसी संगठन का नाम दे दिया जाता है। दुनिया में अगर कोई घटना होती है तो ऐसे संगठन पुतला फूंकनेे को तैयार रहते हंै, बस इंतजार होता है प्रेस फोटोग्राफरों के फोन आने का। पुतला फूंकने में माहिर संगठनों की चुस्ती-फुर्ती का दर्जनों बार चश्मदीद रहा हूं। कभी पुतला बनने के बाद दर्जनभर लोगों को बटोरकर जिंदाबाद-मुर्दाबाद करने के इंतजाम में देर होता तो मीडिया से जुड़े बंधु चाय-पान की खातिरदारी करने के साथ ..जल्दी करो बहुत काम है  का शोर मचाते रहते थे।  काशी से कश्मीर पहुंचने के बाद मीडिया के जिस पहलू से वाकिफ हुआ, वह काफी चौकाने वाला था। दो दिन की छुट्ïटी लेकर जम्मू से श्रीनगर पहुंचने के बाद वहां की खूबसूरती का कायल हो गया। चिनार के पेड़, बर्फीली वादियों के बीच जम्मू कश्मीर वूमेन कमीशन की सेक्रेटरी हाफीजा मुज्जफर की मेजबानी का लुत्फ उठा रहा था। डल झील को सिर्फ फोटो में ही देखता रहा हूं। चाहे जाड़ों में बर्फ जमने की या उस पर हाउसबोट में सैलानियों की। इसलिए पहली बार नजदीक से देखने के बाद आंखों में खूबसूरती का अद्भूत दरिया बहने लगा। दिल के अंदर इस मंजर के साथ आंखों की टानिक के लिए कश्मीर की खूबसूरत औरतों का प्राकृतिक सौन्दर्य देखकर अचानक सन्ï 1996 याद आ गया। सन्ï 96 में कश्मीर में सेना की तैनाती के साथ जवानों द्वारा वहां की महिलाओं के साथ बदसलूकी की कथित घटनाओं के पीछे का कारण भी समझ में आने लगा था। कश्मीरी औरतों की खूबसूरती को एकटक निहारते देखकर हाफीजा ने मेरा ध्यान बंटाने के लिए आंखों के सामने चुटकी बजाते हुए पूछा कहां खो गए हैं हुजूर? हाफीजा का यह अंदाज पसंद आया.. बोला कश्मीर की कली से लेकर खूबसूरत फूल तक देख रहा हूं। यह सुनकर वह बोली अब इस खूबसूरती पर दुनिया की बुरी नजर लग गयी है। कश्मीर की भोली-भाली लड़कियों को नौकरी के लालच में फंसाकर सेक्स के धंधे में धकेल देने का मामला, सीबीआई की जांच और मिस अनारा का एमएमएस कांड इन सब विषयों पर चर्चा प्रारंभ हुई तो बातचीत यहां तक पहुंच गयी कि दुनिया में कश्मीरी औरतों की मांग सबसे ज्यादा क्यों है? इस विषय पर चर्चा काफी देर तक चली। कश्मीर में डल झील पर घूमने के साथ चरमपंथी नेताओं से मिलने की इच्छी ही श्रीनगर खींचकर लायी थी। श्रीनगर में हिंदी अखबारों के कुछ पत्रकारों से मुलाकात करने के बाद यहां होने वाली छोटी-मोटी घटनाओं में सेना को बदनाम करने तथा मानवाधिकार उल्लंघन का बखेड़ा करने के पीछे की कहानी जानने की दिलचस्पी थी। अमर उजाला के श्रीनगर ब्यूरो के इंचार्ज रहे कानपुर के शैलेंद्र शुक्ला ने इस मसले पर गिलानी, यासीन मालिक जैसे नेताओं की फितरत और मीडिया में टेरर मैनेजमेंट के पीछे की जो असलियत उजागर की थी, वह हैरतअंगेज थी। पाकिस्तान से रूपये लेकर पूरे विश्व में कश्मीर मुद्ïदे पर ध्यान आकर्षित करने के लिए मीडिया मैनेजमेंट के खेल में अलगाववादी संगठनों के मुखिया का अहम रोल है। विभिन्न समाचारपत्र और टीवी चैनलों में काम करने वाले पत्रकारों को जिस तरह यूपी में पुलिस स्टेशन पर गलत काम करने वाले महीना रकम बांध लेते हैं, उसी तरह यहां के अधिकांश जर्नलिस्ट अलगाववादी संगठनों के इशारे पर पेड रिपोर्ट करते हैं। इनके एजेंट कई चैनलों और पत्रकारों को भारी धनराशि देकर कश्मीर में कट्ïटरपंथियों का पक्ष मजबूती से परोसने को मजबूर करते हैं, जो ऐसा नहीं करते हैं, उनको आंतकी संगठनों की और से जान से मारने की धमकी दी जाती है। अमर उजाला जम्मू संस्करण को ऐसी कई धमकियां मिल चुकी थी। दैनिक जागरण के एक खबरनवीस ने तो इस माहौल में रहकर उनके बीच काम करने के लिए अपने नाम के आगे एक नया शब्द भी जोड़ लिया। पाकिस्तान से भारत में आकर आतंक मचाने वाले आतंकियों की घुसपैठ को रोकने के लिए सेना जब तलाशी अभियान चलाती है तो उसका विरोध करने के लिए भाड़े पर युवकों के साथ भाड़े की मीडिया को बटोरकर उसकी ऐसी फुटेज बनवायी जाती है, जिससे लगे कि श्रीनगर में सेना आम लोगो को कितना प्रताडि़त कर रही है। सेना की छवि को धक्का पहुंचाने में कश्मीर की भाड़े पर काम करने वाली मीडिया का बहुत बड़ा रोल है। कश्मीर में सेना से जुड़ी घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने के साथ दुनियाभर के टीवी चैनलों और एजेंसियों को  फुटेज और फोटो बेचकर हजारों की कमाई करते हैं। कश्मीर में आईएसआई के इशारे पर काम करने वाली पत्रकारिता का ‘बिकाऊ सच’ जानकर दिल में बहुत कोफ्त हुआ। कश्मीर के साढ़े तीन लाख पंडितों को खदेड़ दिया गया, उनकी खोज-खबर लेने से दूर रहने वाली मीडिया के कारिंदों की काली करतूत देखने के बाद और भी गुस्सा आया। पैसे लेकर दुनिया में हिंदुस्तान की छवि बिगाडऩे वाली कश्मीर की मीडिया के हाल पर क्षोभ हुआ। अगले दिन गिलानी से मिलने की बात सोची। सेना और उसके प्राइवेट कारिंदों की तलाशी के बाद उनके दरबार-ए-खास में पहुंचा। उसके पहले ही विजीटिंग कार्ड भिजवाया। आधे घंटे इंतजार के बाद गिलानी साहब सफेद दाढ़ी को सहलाते हुए बाहर आए।  दरबार-ए-खास में मौजूद सब लोग आदाब..आदाब कहते हुए खड़े हो गए, मैं अपने जगह पर बैठा ही रहा। शाही कुर्सी पर बैठने के बाद गिलानी ने रौबदार आवाज में कहा कि सुना है कोई अखबार का नया नुमाइंदा आया है। मैने उतनी ही रौबदार आवाज में कहा मैं हूं जनाब, नाम है दिनेश चंद्र मिश्रा। अमर उजाला में हूं, काशी से कश्मीर आया हूं। आवाज अपनी भी बचपन ही तेज है, माता जी कहा करती थी लगता है गुल्लू(घर का नाम) तुम्हारे गले में दाई ने अंगुली की जगह बांस डाल दिया है। गिलानी की आवाज का प्रतिउत्तर उससे भी तेज आवाज में देने पर  बड़े गौर से देखने के बाद बोला एक और पंडित आ गया। पंडितों के प्रति उनका उपेक्षापूर्ण भाव देखकर कहा कि लगता है आपको पंडितों से बहुत नफरत है। जवाब में उन्होंने कहा जनाब नफरत आज से नहीं है, नेहरू के जमाने से है। नेहरू को लेकर गिलानी अपना विष वमन करते रहे। उनकी सुनने के बाद कुछ सवाल किया तो जवाब था इंडिया गर्वमेंट सोने की सडक़ भी बनवा दे तब भी कुछ नहीं हो सकता है। दुनिया कश्मीर में भारत सरकार के इशारे पर सेना क्या कर रही है, इसे देख रही है। गिलानी द्वारा मीडिया के कंधे पर बंदूक रखकर कश्मीर की गोली चलाना पसंद नहीं आया। मैने कहा मीडिया कैसे कौन सी खबर रिलीज करती है, इससे रियासत में आने के बाद बखूबी वाकिफ हो गया हूं। एक घंटे गिलानी के साथ बिताने के बाद खबर के नाम पर उसने जो जहर उगला वह छापने लायक नहीं था। कश्मीर में मीडिया का ‘बिकाऊ सच’ देखने के बाद माता रानी से प्रार्थना की कि ‘हिंदुस्तान की रोटी खाकर पाकिस्तान के लिए काम करने वाले कुत्तों को सद्ïबुद्घि दें। ’ इति!!
क्रमश .....

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

ठग कौन? दिग्विजय सिंह या अन्ना व रामदेव


दिग्विजय सिंह उर्फ दिग्गी राजा अपने कुतर्कों और बेतुके बयानों के लिए जाने जाते हैं। सभी लोग अच्छी तरह से जानते हैं कि उन्हें एक तरफ हिन्दू संगठनों से एलर्जी है तो दूसरी तरफ काला धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ जन आंदोलन करने वाले बाबा रामदेव और अन्ना हजारे से। दिग्विजय सिंह की नजर में वे सब आतंकवादी और भ्रष्ट हैं, जो भ्रष्टाचार का विरोध करते हैं। मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री बनने से लेकर कांग्रेस में प्रमुख बने रहने के लिए दिग्विजय सिंह ने चापलूसी और खुशामद की हदें पार कर दीं। अपनी इसी स्वामिभक्ति के कारण वह पार्टी के महामंत्री और उत्तर प्रदेश के चुनाव प्रभारी बनाये गए। अंदरूनी हालत नहीं जानने वाले कांग्रेसियों की नजर में दिग्गी राजा एक निष्ठावान और पार्टी के प्रति समर्पित नेता हैं। लेकिन यदि कोई यह कहे कि दस साल तक मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री रहते हुए, दिग्गी राजा ने खुद कांग्रस को कितना चूना लगाया? तो सनद रहे कि भोपाल स्थित कांग्रेस के कार्यालय जवाहर भवन को फर्जी ट्रस्ट बनाकर उन्होंने अपने कब्जे में कर लिया, भवन से लगी हुई दुकानों का किराया हड़प कर लिया, अदालत में झूठा शपथ पत्र दिया, अपने लोगों को फर्जी कंपनियां बना कर रुपयों का घोटाला किया और पार्टी में अपराधियों को संरक्षण दिया। तो ऐसा कहने वाले को दिग्गी राजा या कांग्रेस नेता फौरन संघ का आदमी कह देंगे, और अगर कोई यह कहे कि दिग्विजय सिंह सार्वजनिक रूप से इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी के प्रति अपशब्द कहते थे तो कांग्रेसी उस व्यक्ति को बाबा रामदेव या अन्ना हजारे का एजेंट कह देंगे।  लेकिन दिग्विजय सिंह की यह कलई किसी संघी या बाबा रामदेव के एजेंट ने नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष आरएम भटनागर ने खुद खोली है। श्री भटनागर 1978 से 1993 तक पार्टी में बने रहे। वे राजीव गांधी के भी काफी निकट थे। इनके कार्यकाल में अर्जुन सिंह और दिग्विजय सिंह मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री रहे। आज श्री भटनागर की उम्र 76 के लगभग है। श्री भटनागर ने दिग्विजय सिंह पर जो भी आरोप लगाये हैं, वह उन्होंने शपथ पूर्वक बताये हैं। जिनकी पुष्टि, अखबारों, विधानसभा के रिकार्ड और प्रमाणिक गुप्त दस्तावेजों से होती है। श्री भटनागर ने इसकी सूचना गोपनीय पत्र द्वारा दिनांक 9 अगस्त 1998 और दिनांक 29 सितम्बर 2001 को सोनिया गांधी को दे दी थी। यह खबर इंदौर से छपने
 वाले एक साप्ताहिक पत्रिका ने अपने अंकों में छापी थी। 
दिग्विजय सिंह ने पहला घोटाला कांग्रेस की सम्पति हड़पने का किया था। सन 2006 से पूर्व मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी का मुख्य कार्यालय लोक निर्माण विभाग के एक शेड में था। बाद में प्रदेश कांग्रेस कमिटी को अपना भवन बनाने हेतु मध्यप्रदेश आवास और पर्यावरण विभाग ने आदेश संख्या- 3308/4239, दिनांक 30/11/74 और पुनस्र्थापित आदेश दिनांक 30 अगस्त 1980 तथा आदेश दिनांक 20 /11 81 द्वारा रोशनपुरा भोपाल के नजूल शीट क्रमांक-3 प्लाट-7 में 5140 वर्ग फुट जमीन बिना प्रीमियम के एक रुपया वार्षिक भूभाट लेकर स्थायी पट्टे पर आवंटित कर दिया था, और उस भूखंड का विधिवत कब्जा कांग्रस कमेटी को नजूल से लेकर 23/11/81 को सौप दिया। भवन निर्माण हेतु सदस्यों और किरायेदारों से जो रुपए जमा हुए उस से तीन मंजिली ईमारत बनायी गयी, जिसमें दो बड़े हॉल और साथ में 59 दुकानें भी थीं। इस भवन का नाम जवाहर भवन शॉपिंग कॉम्प्लेक्स रखा गया। इस भवन की भूमि पूजा तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने 16 अगस्त 1984 को की थी और उद्घाटन राजीव गांधी ने किया था। निर्माण हेतु सदस्यों के चंदे से 29.84 लाख रुपए और किराये से 66.78 लाख रुपए जमा हुए थे और किराए की राशि से पार्टी का खर्च चलने
की बात कही गयी थी। 
बाद में दिग्विजय सिंह ने 19/12/85 को एक फर्जी ट्रस्ट बनाकर उस भवन पर कब्जा कर लिया। यद्यपि उस ट्रस्ट का नाम कांग्रेस कमेटी ट्रस्ट था लेकिन उसका कांग्रेस से कोई सम्बन्ध नहीं था। दिग्विजय ने अनुभागीय अधिकारी (तहसीलदार) के समक्ष शपथपत्र देकर कहा की यह ट्रस्ट पुण्यार्थ है, और जवाहर भवन की सारी चल अचल सम्पति इसी ट्रस्ट की है। इस तरह कांग्रेस पार्टी दिग्विजय की किरायेदार बन (देशबंधु दिनांक 6 दिसंबर 1998) गई। दिग्विजय सिंह ने खुद को उस ट्रस्ट का अध्यक्ष बना लिया। उक्त ट्रस्ट में निम्न पदाधिकारी थे:  1. अध्यक्ष -दिग्विजय सिंह पुत्र बलभद्र सिंह 2. मोतीलाल वोरा ट्रस्टी 3. जगत पाल सिंह मैनेजिंग ट्रस्टी।
इस ट्रस्ट के विरुद्ध न्यायालय अनुभागीय अधिकारी तहसील हुजुर भोपाल में एक जनहित याचिका भी दर्ज की गयी थी, जो प्रकरण संख्या 04 बी-113 /85-86 दिनांक 12 जुलाई 88 में दर्ज हुआ था। बाद में यह मामला श्री आर.एम. भटनागर ने विधान सभा में भी उठवाया। मध्यप्रदेश विधान सभा के प्रश्न संख्या 9 (क्रमांक 579) दिनांक 23 फरवरी 96 को उक्त ट्रस्ट के बारे में करण सिंह ने यह सवाल किया था, ‘क्या रा'यमंत्री धार्मिक न्यास यह बताने का कष्ट करेंगे की इस ट्रस्ट के पंजीयन के समय तक कितनी बार ट्रस्टियों के नाम बदले गए हैं? जैसा की भटनागर ने 24 दिसंबर 98 को प्रश्न किया था। और पंजीयक से शिकायत की थी?’
इस पर विधान सभा में धार्मिक न्यास राज्यमंत्री धनेन्द्र साहू ने उत्तर दिया था कि अब तक उक्त ट्रस्ट के ट्रस्टी चार बार बदले गए हैं और ट्रस्ट के भवन की दुकानें पट्टे पर नहीं बल्कि किराये पर दी गयी हैं और इसकी अनुमति भी नहीं ली गयी थी। यही नहीं उक्त ट्रस्ट कि ऑडिट रिपोर्ट भी 31 मार्च 2000 तक नहीं दी गयी। इसके बाद दिग्विजय सिंह ने दुकानों से प्राप्त किराया पार्टी को न देकर अपने निजी काम में लगाना शुरूकर दिया। जिसकी खबर इंदौर से प्रकाशित ‘फ्री प्रेस जरनल’ ने दिनांक 5 नवम्बर 1986 को इस हेडिंग ‘दिग्विजय ऐक्यूज्ड ऑफ मिसयूजिंग पार्टी फंड्स’ से प्रकाशित की थी। श्री भटनागर ने बताया कि जवाहर भवन की 59 दुकानों से मिलाने वाले किराये से प्रति माह दो तीन लाख रुपये की जगह सिर्फ 65000/- ही जमा होते थे। इस प्रकार अकेले 10 साल में करोड़ों का घपला किया गया है। उक्त ट्रस्ट का खाता पंजाब नैशनल बैंक के भोपाल टी.टी. नगर ब्रांच में था, जिसका खाता नम्बर 19371 है। खाते से पता चला कि 1 अप्रैल 2001 से 26 मार्च 2003 तक ट्रस्ट से 1 करोड़, 21 लाख,1,649 रुपऐ निकले गए थे। जिसमें सेल्फ के नाम से 162739/- दिग्विजय ने निकला था। बैंक का लॉकर भी था। जिसमें कई मूल्यवान वस्तुएं भी थीं जो भेंट में मिली थीं। इसके अलावा नकद राशि भी थी। भटनागर ने बताया कि उस समय खाते में ग्यारह करोड़ रुपए थेे। लॉकर की दो चाभियां थीं। एक जगतपाल सिह के पास, और दूसरी दिग्विजय सिंह के पास थी। जब जगतपाल की मौत के बाद लॉकर खोला गया तो उसमें से कीमती चीजें गायब पाई गई थीं और खाते से 9 करोड़ रुपए का कोई हिसाब नहीं मिला (इंदौर से प्रकाशित स्पुतनिक दिनांक 31 जनवरी 2005)

रविवार, 24 जुलाई 2011

चमचागीरी की कांग्रेसी कला

चमचागीरी की कांग्रेसी कला
चार ‘च’ यानी चुगली, चापलूसी, चरण वंदन और चमचागीरी में आपको महारथ हासिल है तो राजनीति में आप चमक सकते हैं। आज की राजनीति का कड़वा सच यही है। चार ‘च’ का विषबेल भारतीय राजनीति में पसर गया है।
1947 में आजादी मिलने के बाद महात्मा गांधी ने ‘भारतीय राष्टï्रीय कांग्रेस पार्टी’ के विघटन की इच्छा की थी। उनके पास कांग्रेस के विघटन के तर्क थे और दूरदृष्टि भी थी। इसलिए कि कांग्रेस के पास आजादी की धरोहर थी। कांग्रेस का मुख्य लक्ष्य आजादी था। महात्मा गांधी ने यह महसूस किया था कि ‘कांग्रेस’ के पास आजादी के इस धरोहर के साथ खिलवाड़ और नैतिकता के साथ ही साथ जनविरोधी राजनीति का पर्याय बनाया जा सकता है। इसलिए कांग्रेस का विघटन जरूरी है। महात्मा गांधी के इस इच्छा का सम्मान न हुआ और जवाहर लाल नेहरू ने कांग्रेस को अपने परिवारिक सत्ता उत्थान का मोहरा बना दिया। आज कांग्रेस के अंदर घटने वाली घटनाएं यह कहने और बताने के लिए तत्पर हैं कि महात्ता गांधी की वह इच्छा कितनी सटीक और दूरदृष्टि से परिपूर्ण थी।   
चाटुकारिता और अनैतिकता कांग्रेस के खून में रची-बसी है और उसकी राजनीतिक धमनियों में यह सब अनवरत बहती रहती है। चाटुकारिता और अनैतिकता की लहर बहाने के जिम्मेदार जवाहर लाल नेहरू थे। कांग्रेस में उन्होंने आजादी की धरोहर से जुड़े हुए राजनीति की धाराएं रोकीं और इसकी जगह चाटुकार और अनैतिकता से भरी हुई राजनीतिक शख्सियतों को स्थापित कराया। नेहरू ने चन्द्रभानु गुप्त, विधानचंद्र राय, मोरारजी देशाई जैसे अनेकों आजादी की शख्सियतों को हासिये पर डाला। संसद और राज्य विधान सभाओं के साथ ही साथ सरकारों पर नेहरू की जाति ब्राम्हणों का आधिपत्य हुआ। परिवारवाद का वृक्षारोपण हुआ। इसका उदाहरण था नेहरू द्वारा अपनी पुत्री इंदिरा गांधी को अपना उत्तराधिकारी घोषित करना और कांग्रेस की अध्यक्ष पद पर बैठाना। उस समय इंदिरा गांधी की राजनीतिक कमाई इतनी भर थी कि वह जवाहर लाल नेहरू की पुत्री थी। कांग्रेस की अध्यक्ष के रूप में इंदिरा गांधी ने वरिष्ठ और नैतिकता वाले कांग्रेसियों को बाहर करने में कोई कंजूसी नहीं बरती। लाल बहादुर शास्त्री की असमय संदेहास्पद मृत्यु के बाद प्रधानमंत्री पद पर इंदिरा जा बैठीं। अपने मनपसंद उम्मीदवार को राष्ट्रपति  का उम्मीदवार नहीं बनाये जाने पर इंदिरा गांधी ने अपनी पार्टी के राष्ट्रपति  पद के उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी को परास्त कराया और निर्दलीय वीवी गिरी को राष्ट्रपति बनाया। लोकतंत्र में ऐसा उदाहरण और नहीं मिलेगा जिसमें प्रधानमंत्री ने खुद अपने दल द्वारा घोषित राष्ट्रपति के उम्मीदवार को पराजित कराने की राजनीतिक चाल चली हो। इंदिरा गांधी ने भारतीय राजनीति में चाटुकारिता और अनैतिकता से भरी शख्सियतों की नई धारा बहाई। देवकांत बरुआ की चाटुकारिता भारतीय राजनीति में हमेशा चर्चित रही है। देवकांत बरुआ ने इंदिरा गांधी की चमचागीरी में कहा था कि ‘इंदिरा इज ए इंडिया-इंडिया इज ए इंडिया।’ इंदिरा गांधी के मुंह से निकलने वाले हर शब्द को शिरोधार्य माना जाने लगा। इंदिरा गंाधी ने केवल राजनीति में ही मोहरे नहीं बैठाये बल्कि संवैधानिक संस्थाओं में भी चाटुकारों की श्रृंखला स्थापित की। इसका परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस पूरी तरह से चमचों के चंगुल में फंस गयी। विरोध प्रकट करने और असहमति जताने की लोकतांत्रिक धारा रुक गयी। इंदिरा गंाधी निरंकुश हो गयीं। 1971 में बांग्लादेश में हुई जीत से इदिरा गांधी की निरंकुशता और बढ़ गयी। चारों तरफ गुणगान करने वालों की भीड़ लग गयी। ऐसी स्थिति बड़ी सी बड़ी राजनीतिक शख्सियत को भी सोचने-समझने की शक्ति समाप्त कर देती है। इंदिरा गाधी का आपातकाल इसी दृष्टिकोण का परिणाम था। आपातकाल ने हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर कैसा संकट खड़ा किया यह जगजाहिर है। चापलूसी की अपसंस्कृति कांग्रेस में किस कदर बढ़ी, इसे समझने के लिए इंदिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी की चप्पल उठाने वाले दो तत्कालीन मुख्यमंत्रियों के किस्से मशहूर हैं। लखनऊ में तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी और मुंबई में महाराष्टï्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री शंकर राव चव्हान ने संजय गांधी के चप्पल ढोये थे। शंकर राव चव्हान महाराष्टï्र के हाल ही मुख्यमंत्री रहे अशोक चव्हान के पिता थे। शंकर राव चव्हान तो अब जिंदा नहीं हैं पर नारायण दत्त तिवारी जिंदा हैं। सोनिया गंाधी की पीढ़ी में भी चाटुकारों और चमचों की भीड़ है, इसमें प्रधानमंत्री से लेकर कई ताकवर मंत्रियों और आला नेताओं के नाम शुमार हैं। राहुल के मुंबई दौरे में जिस तरह चाटुकारिता की स्खलित राजनीतिक पारिपाटी दिखी वह चरम है। महाराष्टï्र के गृह राज्य मंत्री रमेश ने राहुल गांधी का न केवल चप्पल उठाया बल्कि चप्पल उठाकर चलते भी देखे गये। इस चप्पलकारिता पर राहुल को भी कोई कोप नहीं हुआ बल्कि वे अपनी मुस्कान बिखरते हुए इसका आनंद लेते रहे। जबकि राहुल बार-बार यह कहते हैं कि कांग्रेस में चाटुकारिता नहीं चलेगी।  वाकई चापलूसी भारतीय राजनीति का ब्रह्मïास्त्र है। 2008 में अर्जुन सिंह ने बयान दिया कि राहुल को प्रधानमंत्री बनाने में हर्ज नहीं। इस पर अर्जुन सिंह के पीछे सारे लोग हाथ धोकर पड़ गए। कांग्रेस को बयान जारी करना पड़ा कि कांग्रेस नेतृत्व चापलूसी पसंद नहीं करता। अखबारों के मुखपृष्ठों पर इधर ये बयान छपा और उधर प्रणब मुखर्जी का दोगुनी चापलूसी वाला बयान भी छपा। एक साथ दोनों बयान! इसके बाद तो दिग्विजय सिंह ने चमचागीरी की इंतिहा ही कर दी। कांग्रेस ने चापलूसी को उच्च-कोटि की ललित कला बना दिया है। वह कला ही नहीं, विज्ञान भी बन गई है। कितनी चापलूसी कहां और कैसे करनी चाहिए, इस विधा के महारथी जितने कांग्रेस में पाए जाते हैं, किसी और पार्टी में नहीं। इसका नतीजा क्या होता है? यह संक्रामक रोग की तरह है। कांग्रेस की देखादेखी यह देश की अन्य पार्टियों में भी फैल गई है। भारतीय राजनीति के साठ साल में से लगभग 50 साल कांग्रेस का राज रहा है। कांग्रेसियों के आचरण ने शेष सभी दलों को प्रभावित किया है। चापलूसी राजनीतिक संस्कृति का अभिन्न अंग बन गई है। अनुयायी नेताओं की तरह कुर्ता, बंडी, टोपी पहनने लगते हैं, भाषण देते वक्त उनकी तरह हाथ-पांव फेंकने लगते हैं, उसी ठाठ-बाट से रहने लगते हैं। आज के नेता कोई गांधी की तरह नहीं हैं कि उनके सदगुणों को उनके अनुयायी अपने जीवन में उतारें। नेता वैसा आग्रह करते भी नहीं और अनुयायी वैसा करना जरूरी भी नहीं समझते। हमारी राजनीति ऊपर से चमकदार और अंदर से खोखली होती चली जा रही है।
किसी पार्टी के कार्यकर्ता में यह दम नहीं कि वह अपने नेता से पूछे कि इतना पैसा कहां से लाते हैं, इतनी संपत्ति कैसे जुटाई, रोज इतना खर्च कैसे करते हैं? व्यभिचार और मद्यपान करते डर नहीं लगता? पत्नी, बेटे-बेटी और भतीजे-भतीजी को हमारी छाती पर सवार क्यों कर रहे हैं? आप फलां को प्रदेशाध्यक्ष, फलां को महामंत्री, फलां को राज्यपाल, फलां को मुख्यमंत्री और फलां को मंत्री क्यों बना रहे हैं? नेता को सारे अधिकार समर्पित करके हमारे देश के पार्टी कार्यकर्ता अपनी बुद्घि को स्थायी तौर पर सुला देते हैं।
कांग्रेस में चापलूसी संस्कृति के नए सितारे बनकर दिग्विजय सिंह उभरे हैं। इनके बारे में क्या कहा जाए, चापलूसी में यह क्या-क्या कह सकते हैं, इसकी कल्पना करना मुश्किल है। दिग्विजय सिंह ने राजनीतिक कारीगरी अपने गुरु अर्जुन सिंह से सीखी है और अर्जुन सिंह अपने जमाने के जाने-माने राजनीतिक चाणक्य रहे हैं।

सोमवार, 18 जुलाई 2011

दीपावली की एक रात मां के साथ

होली हो या दीपावली त्योहार का आनंद परिवार के बीच में जो होता है, वह शायह ही कहीं और हो। जेहन में बस्ती से लेकर बनारस तक ऐसे त्योहारों की यादें तब बादलों की तरह घुमडऩे लगी जब दीवाली की तारीख नजदीक आने लगी। दीवाली आने के साथ अमर उजाला दफ्तर के कई साथी जो महीनों से घर नहीं गए थे, वह घर जाने की तैयारी में मशगूल हो गए। उनकी तैयारी देखकर घर की याद सताने लगी। पुष्कर पाण्डेय पहले ही मन न लगने के कारण बोरिया-बिस्तर छोडक़र अलीगढ़ जा चुके थे। अनिमेष कई महीने से घर नहीं गया था, वह घर जाने की तैयारी में जुट गया। आफिस से आधा दर्जन लोग छुट्ïटी पर जाने की तैयारियों के साथ टे्रन टिकट कन्फर्म कराने में लगे हुए थे। एक तरफ दोस्तों की तैयारी दूसरी तरह हम और योगेंद्र क्या करेंगे, यह सवाल दिमाग में उलझन बन गया था। दोस्तों को रेलवे स्टेशन पर हैप्पी दीपावली बोलकर विदा करने के बाद हम लोगों ने प्लान बनाया कि दीपावली की रात मां के चरणों में दीप जलाकर मनाएंगे। धनतेरस को जम्मू के रघुनाथ मार्केट में घंटों घूमने के बाद पिता जी को फोन किया तो वह बोले इतनी दूर तुम चले गए हो, त्योहार का क्या मतलब। तुम जम्मू में हो, परिवार बनारस में, मैं बस्ती में हूं। ऐसे में किसका त्योहार, कैसा त्योहार? पिता जी की बातों को सुनकर मैने कहा कि माता रानी के चरणों में दीप जलाने का सुअवसर मिला है। पिता जीे को बताया कि माता रानी के चरणों में ही दीपावली मनाऊंगा। पत्नी और बच्चों के साथ वैष्णो देवी के दर्शन करने पहले भी जा चुका था, लेकिन जम्मू में आने के बाद यह पहला मौका था जब मां के दर्शन करने की योजना बनायी। छोटी दीपावली की रात अखबार का काम खत्म होने के बाद मैं और योगेंद्र घर जाने की बजाए सीधे बस स्टैंड पहुंच गए। बस स्टैंड पर ही राजमा चावल खाने के बाद भोर में चार बजे कटरा को जाने वाली पहली बस में ही जाकर सोने का फैसला किया। लेदर जैकेट के साथ मफलर को भी गले में लपेटने के बाद बस में आगे की सीट पर पीठ सीधी करने के लिए लेट गए। सर्द मौसम में बस की खिडक़ी बंद होने के बावजूद भी सर्द हवाएं पता नहीं किस-किस कोने से घुसकर हड्ïिडयों को कंपाने का काम कर रही थी। देह को सर्द हवाओं से बचाने के लिए हम दोनों गठरी की शक्ल में एक सीट के ऊपर लेटे पड़े थे। कभी इस करवट तो कभी इस करवट होकर ठंड से बचने की मसक्कत चलती रही। चार बजने के साथ बस क्लीनर आकर बोला साहब जग जाइए, हाथ मुंह धो लीजिए, बस चलने वाली है। दो घंटे की नींद के बाद चाय की चुस्की लेने के साथ फ्रेश होने के बाद बाद हम लोग बस में बैठ गए। उद्यमपुर का रहने वाला बस क्लीनर करीम कटरा..कटरा की रट लगाने लगा। आधे घंटे के अंदर बस भर गई। देश के कोने-कोने से आए माता रानी के भक्तों को लेकर बस कटरा चलने को तैयार थी। ड्राइवर ने बस स्टार्ट कर दिया, करीम बस के ऊपर सामान बांधने में जुटा था। सामान बांधने के बाद नीचे उतरने पर बस के अंदर घुसते ही ड्राइवर को सलाम ठोका। बस का सफर प्रारंभ होते हीे से करीम ने यात्रियों की ओर मुखातिब होकर कहा बोलो शेरावाली मां की जय। करीम का यह अंदाज बहुत पसंद आया। करीम के श्रीगणेश के बाद रास्ते भर यात्रियों के अंदर माता के जयकारे की एनर्जी कटरा नजदीक आने के साथ बढ़ती जा रही थी। जयकारे की गूंज के साथ बारह बजे से पहले ही कटरा बस स्टैंड पहुंच गए। कटरा पहुंचने के बाद हम लोग मां के दरबार में मत्था टेकने के लिए परची कटाने की कतार में लग गए। योगेंद्र ने कहा भाई साहब हम लाइन में लगते हैं, आप तब तक फ्रेश हो लीजिए। एक घंटे लाइन में लगने के बाद योगेंद्र परची लेकर आ गया। माता रानी का नाम लेकर हम दोनों चढ़ाई प्रारंभ की। घर से हजारों किमी से दूर दीपावली के दिन हम दोनों माता रानी का नाम लेते हुए बाणगंगा एक घंटे के भीतर ही पहुंच गए। बाणगंगा में सामान की चेकिंग के नाम पर एक बैग भर था योगेंद्र का, उसमे मेरा भी जैकेट था। चेकिंग के बाद भवन के लिए चढ़ाई प्रारंभ हुई। रास्ते में हजारों यात्रियों का जत्था भी मां के जयकारे के साथ बढ़ रहा था। बड़ों के हाथ में दीप थे तो बच्चे के हाथ में फुलझडिय़ां थी। छोटे-छोटे बच्चों का जोश और खरोश देखने लायक था। सामान लादकर योगेंद्र आगे बढ़ रहा था, मैं उसके साथ खाली हाथ था। रास्ते में छोटी-छोटी लड़कियोंं को दुर्गा जी के प्रतीक रूप में बिठाकर पैसा मांगते लोगों की कतार मुझे कचोटने लगी। योगेंद्र भी छोटी-छोटी लड़कियों को दुर्गा जी की शक्ल में पैसा बटोरने की हरकत देखकर हतप्रभ था। जम्मू-कश्मीर में गरीबी की कोख में पल रहे परिवारों की दशा देखकर जहां कोफ्त हो रही थी, वहीं इन बच्चियों को स्कूल जाने की बजाए रास्ते में भीख मांगने के लिए बैठाए रखना भी खल रहा था। ऐसे कई मंजरों को देखने के साथ चढ़ाई चल रही थी। रास्ते में गर्मी के कारण शरीर पर कपड़े कम होते जा रहे थे। जींस और टी-शर्ट में भी पसीने से तरबतर हो गया था। चाय-काफी के लिए रास्ते में रुकने पर घर-परिवार के साथ दोस्तों की दीवाली से जुड़ी यादें जेहन में आ रही थी। रास्ते में एक जगह थकान मिटाने के लिए योगेंद्र के साथ काफी की चुस्की ली और घर फोन मिलाया। क्लास दो में पढऩे वाली छोटी बेटी ने फोन उठाया। फोन उठाते ही उसने कहा पापा आप नहीं आ रहें हैं क्या? मैने जवाब दिया बेटी माता रानी के दरबार में जा रहा हूं दीप जलाने। माता रानी से तुम्हारी पढ़ाई के लिए मन्नत मांगूगा। उसने तुरंत पापा आप पटाखे भी मांग लीजिएगा। दीपावली में पटाखे फोडऩे में बहुत मजा आता है। बेटी से लेकर बीबी तक बातचीत करने के बाद नौकरी की मजबूरियां खलने लगी। दिल में अंदर ही अंदर मां से मांगने लगा। मां इस दुनिया में साथ छोडक़र चली गयी दिल ने कहा कि मां अब तुम ही हमारी मां हो। अपना आर्शीवाद व स्नेह सदैव बनाए रखना। बनारस में इलाज के अभाव में मां की मौत के बाद मां की कमी को महसूस करते हुए  माता रानी को दिल से आवाज देते हीे में आंखों में पानी आ गया। दर्जनों बार लाशों के बीच खबर तलाशने का धंधा होने के बावजूद भी आंखों में कभी पानी नहीं आया, लेकिन अपने दुख के चलते भरी आंखों को पोछते हुए कहा कि मां इन आंसुओं को आप ही पोछेंगी। योगेंद्र मेरी आंखें गीली देखकर बोला भाई साहब कहीं लंबे सोच में डूब गए हैं आप। मैने कहा भाई बाल-बच्चों वाला आदमी हूं, त्योहार का दिन है इसलिए घर से दूरी खल रही है। खैर हाथ-मुंह धोकर हम दोनो फिर माता रानी का दर्शन करने के लिए चढ़ाई प्रारंभ की। शाम तक भवन पहुंचने के बाद ठंडे-ठंडे पानी में स्नान करके दर्शन की कतार में हम लोग गए। माता रानी का भव्य दर्शन करने के बाद भवन में दीप जलाने के उपरांत अजीब सी शांति और सुकून की अनुभूति हुई। दर्शन के बाद नीचे उतरने लगे। माता रानी के भवन से यार-दोस्तों को फोन करने के बाद चल दिया जम्मू के लिए। मां के चरणों में अमावस की इस रात में आलौकिक सुख-शांति की प्राप्ति हुई। और सोचा अगली किसी दीपावली में पूरे परिवार के साथ फिर आऊंगा दीप जलाने।
क्रमश:

बुधवार, 13 जुलाई 2011

हम खिलाएंगे बिरयानी, खाएंगे बम

हम उस देश के वासी है, जिस देश में गंगा बहती है.. इस गीत को आप भूल जाइए, अब हम उस देश के वासी है, जहां खून की नदियां बहती हैं। आम आदमी के जान की कीमत कीड़े-मकोड़े से ज्यादा नहीं है। अगर आप आतंकवादी है तो सरकार आपको दामाद की तरह सेवाभाव करेगी। कोर्ट भले ही फांसी की सजा दे लेकिन वोट की लालच में अतिथि देवो भव: की संस्कृति दिखाई जाएगी। आतंकवादी अगर बिरयानी मांगेंगे तो उनको हैदराबाद की बिरयानी के साथ कबाब भी परोसा जाएगा। ऐसे हिंदुस्तान का भविष्य क्या है सर? प्लीज आप बताइए?
गुरुवार को सबेरे ई-मेल खोलने पर यह सवाल लखनऊ विषय में परास्नातक की पढ़ाई करने वाली फेसबुक की दोस्त नेहा ने पूछा। इस ई-मेल को पढऩे  के बाद बहुत देर तक सोचता रहा है नेहा का सवाल गलत तो नहीं है।
जिन्होंने देश का दिल दहलाया अभी भी वह सजा का इंतजार कर रहे हैं। देश के खिलाफ जंग छेडऩे वाले कसाब को हत्या, हत्या की साजिश, देश के खिलाफ जंग छेडऩा, हत्या में सहयोग देने और गैर कानूनी गतिविधि अधिनियम के तहत आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने के आरोप में फांसी की सजा सुनाई गई। लेकिन अभी तक फांसी नहीं दी गई है। कांग्रेस सरकार वोट की राजनीतिक में उसके सेवा-सत्कार में जुटी है। कानूनी दांव-पेंच के सहारे जनता को भ्रम के मायाजाल में घूमा रही है, वहीं कसाब जन्मदिन पर बिरयानी खाने के बाद रिटर्न गिफ्त के रूप में बम फोड़वा रहा है। 
यही हाल संसद पर हमले का दोषी अफजल गुरू का भी है। वह भी अभी फांसी का इंतजार कर रहा है। इसकी दया याचिका 2005 से लंबित है। आलम यह है कि जिस दिन अफजल की दया याचिका राष्टï्रपति सचिवालय पहुंची, उसे तत्काल गृह मंत्रालय भेज दिया गया। वहां से उसे दिल्ली सरकार को भेज दिया गया और डेढ़-दो सालों तक दिल्ली सरकार ने इस संबंध में एक बैठक तक नहीं की। बाद में जब यह बात सामने आई, तब आनन-फानन में दिल्ली सरकार ने फाइल आगे बढ़ाई। इसके नाम पर राजनीतिक रोटियां सेंकी जा रही हैं।
आतंकवादियों के प्रति सरकार के सम्मान का सिलसिला यहीं नहीं थम रहा है। सन्ï 1993 के मुम्बई सीरियल बम कांड में करीब 200 से अधिक निर्दोष लोगों की मौतों के जिम्मेदार और 700 से अधिक लोगो को घायल करने वालों को सजा नही हो पाई है। इस बम कांड के 13 साल बाद कोर्ट का फैसला आया, तो दोषियों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी जहां अब भी इस केस पर सिर्फ सुनवाई चल रही है। लश्कर ए तैय्यबा के आतंकी मुहम्मद आरिफ ने 2000 में दिल्ली के लालकिले में घुसकर सेना के तीन जवानों की हत्या और 11 को घायल करने वाले इस शख्स की फांसी की सजा पर अभी तक सुनवाई जारी है। सन्ï  2002 में अक्षरधाम मंदिर पर हमलावरों को फांसी देने का मामला भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। सन्ï 2005 में दीपावली के मौके पर दिल्ली के बाजारों में खुशियों के बदले मौत बांटने वालों की भी अभी सुनवाई चल रही है। सन्ï 2006 में मुम्बई लोकल ट्रेनों में विस्फोट करने आतंकियो को सजा मिलने में भी अभी देरी है।
मुंबई में हुआ सीरियल ब्लास्ट आतंकवादियों की तरफ से 26 / 11 में शामिल एकमात्र जीवित आतंकी अजमल कसाब को दिया गया बर्थडे गिफ्ट है ? वैसे तो कसाब के बर्थडे को लेकर काफी कन्फ्यूजन है लेकिन मुंबई एटीएस की पूछताछ की फाइल में कसाब की जन्म तिथि 13 जुलाई 1987 बताई गई है। टाइम्स ऑफ इंडिया में 25 फरवरी 2011 को छपी एक खबर के मुताबिक सेंसस अधिकारियों ने भी कसाब की जन्म तिथि 13 जुलाई 1987 नोट की थी। अब तो देश के जो हालात हो गए है, उसे देखकर लगता है महापुरुषों के नहीं आतंकवादियों के जन्मदिन अपनी जान की खैरिएत के लिए लोगों को याद रखने होंगे। पता नहीं कल कौन कसाब बिरयानी के बदले फिर कहीं बम चला दे।

शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

नेहरू के चलते पैदा हुआ ‘शेखिस्तान’ का शूल


नेहरू के चलते पैदा हुआ ‘शेखिस्तान’ का शूल
रात के दो बजे थे। बिस्तर पर कंबल लपेटकर नींद की गोद में जाने के लिए करवटे बदल रहा था।  मोबाइल पर अचानक उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की शहनाई की कर्णप्रिय धुन का रिंग टोन बजने लगा। अंधेरे में मोबाइल को बिस्तर को टटोलने लगा। हाथ में मोबाइल आया तो स्क्रीन पर नजर पड़ते ही तीन साल पहले के गोरखपुर के पुराने पत्रकार मित्र का नंबर दिखा। निशाचर प्रजाति में गिने जाने वाले पत्रकारों को अक्सर यार-दोस्तों से प्रेम जागने का यही सही समय होता है। मैने फोन उठाते हुए कहा कि अबे इतने अरसे बाद याद आयी। दिनेश तुम तो दिल में बसते हो, दिल से दिल की बात होती रहती है। तुम्हारी खबरें पढ़ता रहता हूं। मैने कहा यह बताने के लिए फोन किए हो, नहीं यार अपने घर का एक बच्चा आपके पास पहुंचा है नाम है पुष्कर पाण्डेय। वह बहुत परेशान है, उसको तुम्हारे सहारे की जरूरत है। मैने कहा कि यहां किसी को किसी के सहारे की नहीं सिर्फ माता रानी के आर्शीवाद की जरूरत है। वैसे पुष्कर बगल में खर्राटे भर रहा है, कहिए तो जगा दें। पांच मिनट तक बातचीत के बाद फोन रखकर माता रानी का नाम लेकर सो गया। सबेरे नींद खुली तो फ्रेश होने के बाद पुष्कर की रजाई खींचकर उठा दिया। खुद आफिस जाते हुए कहा आप भी फ्रेश होकर आइए, आज आपको सैर कराएंगे। मीटिंग के बाद आज पुष्कर के साथ जम्मू घूमने का प्लान बना लिया था। पुष्कर पाण्डेय के आते ही उनको लेकर सबसे पहले तवी नदी का दर्शन कराने चला गया। रास्ते में जम्मू-कश्मीर के बारे में जो जानकारी बटोरी थी उसका सस्वर पाठ करने लगा। पुष्कर जी धरती पर स्वर्ग अगर कहीं है तो वह कश्मीर में ही है। इसको यह उपमा दी तो गई है उसके प्राकृतिक सौंदर्य से अभिभूत होकर, लेकिन इतिहास, संस्कृति और सभ्यता की दृष्टि से भी यह कुछ कम समृद्ध नहीं है। शंकराचार्य मंदिर और हजरतबल की पवित्रता, नागिन झील व डल झील का झिलमिलाता सौंदर्य, मुगल उद्यानों का शाही अंदाज, हिमशिखरों का धवल सौंदर्य और सुकून देती आबोहवा, ये सब ऐसा सघन आमंत्रण देते हैं, जिससे इनकार कर पाना किसी के लिए संभव नहीं है। भाई साहब किसी दिन कश्मीर भी चलिए, वहां भी घूमने चला जाए। चला जाएगा घबड़ाओ नहीं। माता रानी ने अपने पास आर्शीवाद देने के लिए बुलाया है। तवी नदी के किनारे पहुंचकर एक पत्थर पर बैठकर हम दोनो बहते पानी में पैर डालकर आनंद लेने लगे। जम्मू-कश्मीर का वर्णन सुनकर पुष्कर की दिलचस्पी बढ़ती जा रही थी। बोले भाई साहब यह भले ही धरती का स्वर्ग है लेकिन अपना घर स्वर्ग से सुंदर है।  यह तो है ही लेकिन हम लोग जिस पेशे में आए हैं, वह अपने शौक और रोमांच से आए है। इसके फायदा और नुकसान किसी और को नहीं हमको ही मिलेगा। आधा घंटे से ज्यादा वक्त तवी के किनारे बिताने के बाद रघुनाथ मंदिर की तरफ पैदल चल दिए। रघुनाथ मंदिर का दर्शन करने के बाद पुष्कर ने सवाल पूछा कि कश्मीर के इन हालातों के लिए जिम्मेदार कौन है? मैने कहा कि इसके लिए जिम्मेदार एक मात्र व्यक्ति है, वह है जवाहर लाल नेहरू। यह जवाब सुनकर पुष्कर चौंकते हुए कहे यह आप कैसे कह सकते हैं। मैने उन्हें फिर जम्मू-कश्मीर का पहली बार राज्यपाल बने जगमोहन के एक लेख का हवाला देते हुए कहा कि उनसे ज्यादा इस रियासत को किसी शख्स ने नजदीक से नहीं देखा है। 26 अप्रैल 1984 को जम्मू और कश्मीर में राज्यपाल के रूप में जगमोहन जब यहां पहुंचे, तो उनको सीधे राजभवन ले जाया गया। यहां उनको वह कॉम्प्लेक्स दिखाया गया, जहां से डल झील, शंकराचार्य पहाड़ी व हरि पर्वत का भव्य नजारा दिखता था। उनकी नजर एक खूबसूरत बरामदे की ओर गयी तो बताया गया जवाहरलाल नेहरू जब भी श्रीनगर आते थे, यहीं बैठकर सूर्यास्त का खूबसूरत नजारा देखते थे। बाद में वह भी इस बरामदे से सूर्यास्त के जादुई सौंदर्य का अनुभव महसूस किए होंगे। लेकिर नेहरू के बारे में उनका कहना था कि उनके पास नैसर्गिक सौंदर्य के प्रति एक बेहद संवेदनशील दृष्टि थी। उन्होंने लिखा कि नेहरू इस नजारे को किस तरह निहारते होंगे, इसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। बकौल जगमोहन कश्मीर घाटी से नेहरू के निजी और काव्यात्मक लगाव ने मुझे रोमांचित किया, वहीं कश्मीर समस्या के संबंध में उनके द्वारा लगातार की गई गलतियों से कभी-कभी मुझे निराशा भी हुई। यह एक त्रासदी या विडंबना ही है कि नेहरू जैसे महान नेता ने, जिनकी अंतर्दृष्टि व इतिहास बोध अद्भुत था, महत्वपूर्ण अवसरों पर ऐसी दुखद गलतियां कीं। पहली गलती तब हुई, जब नेहरू ने माउंटबेटन द्वारा 27 अक्टूबर 1947 को जम्मू और कश्मीर के महाराजा को लिखे गए उस पत्र की विषयवस्तु पर आपत्ति नहीं ली, जिसमें उन्होंने उनके राज्य के भारत में विलय पर सहमति जताई थी। यह पत्र भारत में विलय होने वाली अन्य रियासतों के शासकों को भेजे गए पत्रों के अनुरूप ही होना चाहिए था। लेकिन माउंटबेटन ने इसमें अनावश्यक रूप से यह भी जोड़ दिया: ‘यह हमारी सरकार की इच्छा है कि जैसे ही जम्मू और कश्मीर में कानून-व्यवस्था की स्थिति बहाल हो और उसकी धरती आक्रांताओं से मुक्त हो जाए, वैसे ही विलय की समस्या का समाधान उसके लोगों की इच्छा के मुताबिक हो।’ यह भूल तब और गंभीर हो गई, जब 28 अक्टूबर को राष्टï्र के नाम संबोधन में नेहरू ने ‘संयुक्त राष्टï्र के तत्वावधान में हुए जनमत संग्रह’ शब्दों का इस्तेमाल किया। 1 जनवरी, 1948 को इस मसले को संयुक्त राष्टï्र में ले जाना एक और भूल थी। संयुक्त राष्टï्र चार्टर के चैप्टर 7 के स्थान पर चैप्टर 6 के तहत शिकायत दर्ज करने से यह भूल और भी गंभीर हो गई। जहां चार्टर का चैप्टर 7 पराधिकार के अधिनियमों से संबंधित है, वहीं चैप्टर 6 (अनुच्छेद 34 और 35) सुरक्षा परिषद को केवल इतना ही अधिकार देता है कि वह ‘विवाद के शांतिपूर्ण समाधान के लिए उपयुक्त प्रक्रियाओं और प्रणालियों की अनुशंसा करे।’ इसके आधार पर ही सुरक्षा परिषद ने यह निर्णय दिया कि ‘इस समस्या पर समग्र रूप से विचार किया जाए और युद्धविराम की स्थिति को विवाद के अंतिम समाधान की संभावनाओं से अलग नहीं माना जा सकता।’ 1 जनवरी 1949 को, जब भारतीय सेनाएं छापामारों और पाकिस्तानी सैन्य टुकडिय़ों को निकाल बाहर करने की स्थिति में थीं, तब ‘सीजफायर’ के लिए सहमत होना भी एक और बड़ी भूल थी। लेकिन सबसे गंभीर भूल जो उन्होंने की, वह यह थी कि वे शेख अब्दुल्ला की छिपी हुई महत्वाकांक्षाओं को समझ नहीं पाए। वे समझ नहीं समझ पाए कि अब्दुल्ला अपने और अपनी मंडली के लिए एक स्वतंत्र ‘शेखिस्तान’ के निर्माण के लिए लालायित हैं। फ्रैंक मॉरेस ने वर्ष 1951 में ही अपनी किताब विटनेस टु एन एरा में लिख दिया था कि ‘सत्ता का मोह अब्दुल्ला के सिर चढक़र बोल रहा है.. वे बेहद अहंकारी व्यक्ति हैं.. वे नईदिल्ली के प्रति अवमाननापूर्ण रुख रखते हैं.. लगता है कि उनका दिमाग कश्मीर घाटी की आजादी के बारे में सोच रहा था और वे स्वयं कश्मीर के शहंशाह बनना चाहते थे।’लेकिन नेहरू ने इन बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। इसके बजाय उन्होंने भारतीय संविधान में धारा 370 को शामिल करने से लेकर राज्य के लिए अलग ध्वज अपनाने जैसी अब्दुल्ला की तमाम मांगों पर सहमति जताई। इन सबसे अब्दुल्ला की सत्ता की भूख और बढ़ी तथा उन्होंने आजादी के लिए ‘पूर्ण स्वायत्तता’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। अब्दुल्ला ने पश्चिमी ताकतों के वरिष्ठ प्रतिनिधियों से गुपचुप संपर्क किया, जो उनकी कपटपूर्ण राजनीति का नया आयाम था। तत्कालीन भारत में अमेरिकी राजदूत लॉय हैंडरसन की सितंबर 1950 की रिपोर्ट पढऩे के बाद किसी को इस पर संदेह नहीं होना चाहिए। हैंडरसन ने इसमें लिखा, ‘भविष्य के कश्मीर के बारे में चर्चा करते वक्त अब्दुल्ला का जोर इस बात पर था कि यह स्वतंत्र होना चाहिए।’ 3 मई, 1953 को एडलाई स्टीवेंसन ने श्रीनगर आकर शेख अब्दुल्ला से भेंट की। इसके तुरंत बाद द न्यूयॉर्क टाइम्स में घाटी का एक नक्शा प्रकाशित हुआ, जो उसकी स्वतंत्र स्थिति की ओर इशारा करता था। हालांकि नेहरू को इस बारे में आगाह किया गया था, फिर भी वे आंखें मूंदे रहे। लेकिन ठोस सच्चाइयों को ज्यादा दिन तक छुपाया नहीं जा सका। अगस्त 1953 के पहले हफ्ते में शेख अब्दुल्ला का एक भाषण खुफिया एजेंसियों के हाथ लग गया। इसमें उन्होंने अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में कश्मीर के भारत से बदलते रिश्ते पर सवाल उठाया था।
इसके बाद तो नेहरू भी अब्दुल्ला को मदद नहीं कर सकते थे। उन्हें पद से हटा दिया गया, हिरासत में लिया गया और बाद में उन पर मुकदमा भी चलाया गया। लेकिन जनवरी 1962 में नेहरू ने राज्य सरकार को कश्मीर षड्यंत्र के इस केस को वापस लेने के लिए राजी कर लिया। नेहरू अपने पीछे एक ऐसे कवि-राजनेता की विरासत छोड़ गए, जिनका आदर्शवाद घाटी की छल-प्रपंच की राजनीति के साथ मेल नहीं खाता था। आज भी मैं यह तय नहीं कर पाता कि घाटी में बहने वाले खून के लिए किसे दोष दिया जाए- अति महत्वाकांक्षा, अति विश्वास या जमीनी।
जम्मू-कश्मीर का गर्वनर बनने के बाद जगमोहन की कलम से निकली यह जानकारी पुष्कर को बताने के बाद घड़ी की तरफ देखा तो दो बजे थे। सोचा इनको कहीं और ले चले। जम्मू यूनिवर्सिटी नजदीक थी। रंग-बिरंगे छात्र-छात्राओं को देखकर पुष्कर का मूड थोड़ा चेंज हो जाएगा, यह सोचकर उन्हें लेकर उधर चल दिया। उस समय जम्मू के मोबाइल बाजार में जम्मू यूनिवर्सिटी का एक एमएमएस प्रकरण सुर्खियों में था। जम्मू यूनिवर्सिटी के भीतर बना एमएमएस देखकर खुजराहो के  प्रसिद्घ मंदिर के बिंदास संस्करण से वाकिफ हुआ जा सकता था। इस एमएमएस की खबर पढ़ चुके पुष्कर जब जम्मू यूनिवर्सिटी परिसर पहुंचे तो उनकी निगाह कुछ खोजती नजर आयी। खेल मैदान में लगे पेड़ के झुरमुट से लेकर कैंटीन तक में वह ऐसे नजारे देखे, जो शायद ही यूपी में कहीं दिखते हो। ऐसे कई दृश्यों को देखकर बोले भाई साहब यह तो बहुत बिंदास यूनिवर्सिटी है। मैने कहा यह कुछ नहीं है, इससे भी कई बिंदास जगह जम्मू-कश्मीर में है, फिर कभी चलेंगे।
क्रमश:

बुधवार, 6 जुलाई 2011

बाबा का साइबर ढाबा

बाबा का साइबर ढाबा
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भले ही अभी जनता से सीधे संपर्क करने में पीछे हों, लेकिन स्वनामधन्य स्वामी और बाबाओं की जमात वेब दुनिया में उनसे काफी आगे है। फेसबुक और ट्विटर जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट पर ऐसे बाबाओं और उनके समर्थकों की भारी फौज खड़ी है। सोशल नेटवर्किंग साइट पर ऐसे बाबाओं की बाढ़ अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के भ्रष्टाचार के खिलाफ छेड़े गए आंदोलन के बाद और बढ़ गई है। बाबाओं के साइबर ढाबाओं पर भक्तों की तादाद बढऩे का क्रम जारी है।
सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक और ट्विटर पर बाबाओं को लोगों का भरपूर समर्थन भी मिल रहा है। कुछ ऐसे बाबा भी सोशल नेटवर्किंग साइट पर मौजूद हैं जो मोबाइल पर एसएमएस भी नहीं कर सकते लेकिन रोजाना वह लोगों को अपने विचार परोस रहे हैं। कई बाबाओं ने तो इसके लिए हाईटेक मीडिया मैनेजर भी तैनात कर रखा है। फेसबुक को खंगालने पर साढ़े पांच हजार से ज्यादा स्वामी, बाबा, पुजारी, पुरोहित, पुजारिन और साध्वियों के दर्शन होते हैं। यहीं हाल ट्विटर का भी है। साइबर दुनिया में समर्थकों की फौज के मामले में बाबा रामदेव सबसे आगे हैं। फेसबुक पर बाबा रामदेव की चार प्रोफाइल के साथ उनके भारत स्वाभिमान संगठन के पेज को पसंद करने वालों की संख्या साठ हजार से ज्यादा है। भाजपा के पूर्व सांसद स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती तथा उनकी शिष्या साध्वी चिद्अर्पिता पांच-पांच हजार दोस्तों के साथ अक्सर वैचारिक बहस का सवाल लेकर लोगों के फेसबुल वॉल पर नजर आते हैं। स्वामी अग्निवेश फेसबुक पर वर्षों से हैं। साइबर दुनिया में उनके चाहने वाले भी हजारों है। गोरखपुर के सांसद योगी आदित्यनाथ लाखों मत हासिलकर संसद में पहुंचते हैं, लेकिन फेसबुक पर उनके दोस्तों की फेहरिश्त बहुत छोटी है। द्वारकापीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद के शिष्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के मित्र और भक्तों की संख्या दो हजार से ज्यादा है।


फेसबुक पर बाबाओं की लंबी फौज खड़ी है। सबका अपना विचार, अपना सिद्घांत और समर्थकों की फौज है। कुछ साइबर भक्त ऐसे हैं जो सबकी सुनते हैं और अपने हिसाब से कमेंट मारते रहते हैं। सिक्किम की राजधानी गंगटोक में स्वामी स्वदेशानंद उर्फ कनकधारा गुरुजी फेसबुक पर काफी सक्रिय हैं। भक्तों से सीधे चैट करके ज्ञान देने में माहिर स्वामी स्वदेशानंद बाबा रामदेव के अनशन को ढकोसला मानते हैं। बाबा अमरनाथ को लेकर स्वामी अग्निवेश की टिप्पणी से मर्माहत होकर उन्हें झापड़ रसीद करने वाले नित्यानंद दास महंथ फेसबुक पर काफी मशहूर हैं। स्वामी अग्निवेश को झापड़ मारने से पहले वह फेसबुक पर संकेतों में इसकी घोषणा कर चुके थे। इनके दोस्तों की संख्या में बड़ी तेजी से बढ़ोत्तरी हो रही है। तिरुपति मंदिर की महिला पुरोहित दुर्गावती भी फेसबुक पर उम्र के आखिरी पड़ाव में दिखाई देती हैं। स्वामी प्रज्ञानंद, स्वामी मानवतावादी, स्वामी चैतन्यकीर्ति, स्वामी प्रह्लïादनंदापुरी, आचार्य अशोकानंद के साथ टीवी चैनलों पर रोजाना सबेरे भविष्यवाणी करने वाले एस्ट्रो अंकल से लेकर तीन देवियां तक सोशल नेटवर्किंग साइ्ट्ïस पर मौजूद हैं।
बाबाओं की लंबी फौज के साथ उनके समर्थकों की भी काफी भीड़ है। दार्शनिक दीपक चोपड़ा ट्ïिवटर पर धूम मचा रहे हैं। योगी आनंद अपनी धर्मपत्नी मानसी पांडेय के साथ धर्म का मार्ग लोगों को दिखा रहे हैं। योगी को पत्नी के साथ फोटो देखकर तमाम चाहने वाले कमेंट्ïस में मर्यादा की सीमा लांघने पर भी उतारू हैं। इंदौर की स्वामी अमितानंदा मध्यप्रदेश में उसी तरह मशहूर हैं, जिस तरह यूपी में साध्वी चिदअर्पिता का आकर्षण है।
फेसबुक पर पूजा-पाठ के लिए पुजारियों की बड़ी संख्या भी मौजूद है। अगर आप अपने घर सत्यनारायण भगवान की कथा सुनना चाह रहे हैं या श्रीमद्ïभागवत, आपको पंडित खोजने के लिए फेसबुक पर लॉग-इन करना ही काफी है। फेसबुक  गुरु रविशंकर का जहां ऑनलाइन सत्संग सुनने को मिल रहा है, वहीं दिव्यप्रेम सेवा मिशन हरिद्वार के संजय चतुर्वेदी सुधांशु महाराज की कथा के साथ भावी सत्संग के कार्यक्रमों को लेकर अक्सर नजर आते हैं। फेसबुक पर पुर्तगाल में स्वामी महालयानंदा, मलेशिया में शारदापुरी सहित तमाम देशों में धर्म, योग, ज्ञान की बातें करने वाले साइबर स्वामी धूम मचाए हैं।

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

पाक औरतों में बच्चे से ज्यादा जेहाद से प्यार


‘हाफीजा ने फाड़ डाले पाक डायरी के पन्ने’! बेनजीर भुटटो की मौत के मातम में जम्मू कश्मीर वूमेन कमीशन की सेक्रेटरी से जुड़ी यह खबर हिट रही। डायरी के पन्ने भले ही फट गए थे लेकिन उसकी तमाम बातें अब भी जेहन में ताजा थी। पाकिस्तान की नापाक हरकतों की चर्चा तो तमाम लोग करते हैं लेकिन आंखोंदेखी जो हाफीजा ने सुनायी, वह जानकार पाक से और नफरत होना लाजिमी है। अमन का संदेश लेकर लाहौर पहुंची भारतीय महिलाओं के दल ने तीसरे दिन वहां के बाजार में घूमने के साथ खरीदारी करने का प्लान बनाया। हाफीजा कुछ महिलाओं के साथ सलवार सूट खरीदने के लिए लाहौर की एक मशहूर बाजार में पहुंच गयी । अफगानी,पटियाला सूट से सजे इन दुकानों पर खरीदारी के पहले बारगेनिंग गजब की दिखी। दो-तीन सूट खरीदने के बाद हाफीजा जब होटल लौट रही थी तो अचानक उनकी निगाह एक महिला पर पड़ी जो दस-बारह साल के बच्चे को लेकर शापिंग करने आयी थी। मां के साथ शापिंग के लिए आया बच्चा आइसक्रीम का ठेला देखकर लेने की जिद करने लगा तो वह उसका हाथ पकडक़र आगे खींचती रही। महिला के हाथ में कुछ छुटटे पैसे थे, बच्चा उसको लेकर आइसक्रीम खरीदना चाह रहा था, लेकिन वह औरत बच्चों की जिद को दरकिनार करके आगे बढ़ती रही। एक दुकान पर कुछ सामान खरीदने के बाद काउंटर पर रखे एक डिब्बे में छुटटे पैसे डाल दिए तो बच्चा जोर-जोर से रोने लगा। हाफीजा का दिमाग ठनक गया। मां की यह कैसी ममता? बेटे को आइसक्रीम खिलाने की बजाए चिल्लर डिब्बे में डाल दिए। हाफीजा ने उस डिब्बे पर उर्दू में कुछ लिखा देखा तो नजदीक पहुंच गयी। डिब्बे पर तालिबानी जेहाद के लिए जकात देने की बात लिखी गयी थी। जेहाद की बातों को लिखा देखकर हाफीजा का माथा ठनक गया। हिंदुस्तान जिस आतंकवाद का दंश झेल रहा है, उसको बढ़ावा देने के लिए पाकिस्तान के बाजार में चंदा इक्ïठा करने के लिए दुकानों पर डिब्बा देखकर चौंक गयी। शापिंग कर चुकी हाफीजा खोजी पत्रकार के नजरिए से बाजार में घूमी तो हर दुकान पर तालिबान को चंदा देने के लिए रखे गए डिब्बे को देखकर उनको बहुत कोफ्त हुआ। कोफ्त इस बात का था जिस पाकिस्तान में अमन का संदेश लेकर वह आयी हैं, वहां हिंदुस्तान में आतंकवाद फैलाने के लिए जिस तरीके से तालिबान लोगों से चंदा वसूल रहा है, उससे लोगों की मानसिकता में क्या फर्क आएगा? खरीदारी करने के बाद होटल लौटकर यह बात हाफीजा ने निर्मला देशपाण्डेय को बतायी। इसे सुनकर वह भी दुखी होते हुए बोली यहां अमन तब तक नहीं आ सकता है जब तक लोगों की हिंदुस्तान को परेशान करने की जेहनियत नहीं बदलेगी। लाहौर,रावलपिंडी सहित पाकिस्तान के कई इलाकों में हाफीजा घूमने गयी तो वहां उसकी नजरों को जकात के नाम पर जेहाद के लिए धन एकत्र करने के लिए रखे डिब्बों को खोजने में देर नहीं लगी। ऐसे ही एक बाजार में एक महिला को जेहाद के लिए रखे डिब्बे में पैसा डालते हुए देखकर हाफीजा अपने आप को नहीं रोक सकी। उन्होंने उससे पूछा कि जेहाद का मतलब वह क्या जानती है? उसका जवाब था इस डिब्बे में कुछ न डालने पर जान का खतरा रहता है। पाकिस्तान में हिंदुस्तान के खिलाफ दुकान-दुकान पर जेहाद के लिए चंदे एकत्र होने की बात देखकर हाफीजा का माथा ठनक गया। पाकिस्तान से हिंदुस्तान आने के बाद अपने शौहर को पूरी बात बतायी तो मियां ने कहा कि यह बात कहीं कहना नहीं। हम लोग जहां रहते हैं, वहां दिल की बात कहने से पहले सौ बार सोचना पड़ता है। इसलिए यह बात किसी से मत कहना। बेनजीर भु्टटो की मौत के बाद हाफीजा ने पाक डायरी के जो पन्ने फाड़े थे,उसमें तीन पन्ने पाकिस्तान में जेहाद के लिए एकत्र हो रहे तथाकथित जकात पर भी थे। पाक डायरी के पन्नों को फाडऩे की स्टोरी छपने के बाद पाकिस्तान में जेहाद के लिए दुकान-दुकान पर एकत्र हो रहे चंदे की खबर भी बनायी तो उसको छापने से पहले नोएडा में शशिशेखर के ध्यानार्थ भेजी गयी। वहां से यह खबर आधी रात को ओके हुई। आधी रात को आयी यह खबर दूसरे दिन अंदर के पन्ने पर छपी, विज्ञापन के चलते पेज पर स्पेस संकट से खबर की दशा देखकर बहुत दुख पहुंचा। दूसरे दिन मीटिंग में पता चला कि अलीगढ़ से पुष्कर पाण्डेय भी जम्मू तबादला होकर आ रहे हैं। शाम तक पुष्कर पाण्डेय से संपादक ने परिचित कराते हुए काम समझाने और अपने ही घर में इनको भी एडजस्ट करने को कहा। रजाई-गद्ïदा के साथ दो बैग सामान भरकर आए पुष्कर पाण्डेय का सामान गांधीनगर भिजवाने के साथ रात में बैठकी का कार्यक्रम बना। पूर्वांचल की माटी से पले-बढ़े पुष्कर को मेरे बारे में जानकारी हो चुकी थी कि जम्मू पहुंच गया हूं। यहां आने के बाद परिवार को होने वाली तकलीफ की चर्चा जब वह सर्द रात में करने लगे तो मेरे साथ अनिमेष और योगेंद्र भी गमगीन होते हुए भी हौसला बढ़ाने के काम में जुट गए। ..माता रानी सब ठीक करेंगी, यह आश्वासन कई बार देने के बाद उनको किसी तरह सुलाया गया। दूसरे दिन सबेरे जब नींद खुली तो अनिमेष ने कहा भाई साहब यह तो यहां नहीं चल पाएंगे। मैने कहा कि घबड़ाओ नहीं इनको जमीं का जन्नत दिखाया जाएगा तो मन लग जाएगा। अलीगढ़ में क्राइम रिर्पोिर्टंग करने वाले पुष्कर को फिलहाल डेस्क की जिम्मेदारी सौंपी गयी। मेरी खबरों को पढ़ते हुए उनके मन में भी रिपोर्टिंग का कीड़ा कुलबुलाने लगा। मैने संपादक से बात करने की सलाह दी। रात को बात करी तो संपादक जी ने आफ बीट स्टोरी करने की छूट दे दी। अब पुष्कर भी यायावरी गैंग में शामिल हो गए थे। मैने कहा कल आपको ऐसी जगह ले चलूंगा, जहां आपका मन लगेगा..
क्रमश:
                              
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