रोमिंग जर्नलिस्ट

शुक्रवार, 10 जून 2011

अ से आतंकी, ब से बंदूक, स माने सेना

रोमिंग जर्नलिस्ट की रिपोर्ट 15...
बात सन् 2007 की है। नवंबर का दूसरा सप्ताह शुरू होने के साथ ही जम्मू का जाड़ा जानलेवा हो गया था। आफिस में तो बड़े-बड़े हीटर लगे थे,लेकिन बाहर निकलने पर ठिठुरन से हालत खराब हो जाती थी। इस धंधे में अपने शौक के कारण आया था सो मुसीबत मुंहमांगी ही थी। सर्द सुबह में रजाई छोडऩे में आलस बहुत महसूस होता था फिर भी छोडऩी पड़ती थी। जम्मू की सर्दी को नजदीक से महसूस करने के साथ सबसे बुरा उस समय लगता है जब बादल का कोई टुकड़ा अचानक बरस का चला जाता है। अगर आप सडक़ पर है तो सिर छुपाने तक की जगह पहुंचते-पहुंचते ही ऊनी कपड़े तरबतर हो जाते हैं । ऐसे कई अनुभवों से यहां आने के बाद गुजर चुका था। रजाई छोडऩे के बाद आफिस जाने के लिए बाहर निकला तो फिर बूंदाबांदी स्टार्ट हो गयी थी। भीगते हुए गांधीनगर के बस स्टैंड मोड़ तक पहुंचा। लेदर जैकेट के साथ पैंट भी भीग गया था,लेकिन चाय पीकर आफिस के लिए निकल पड़ा। आफिस में गार्ड व बंटी सरदार मिल गए। भीगते हुए आते देखकर बोले सर आप भीगते हुए आ गए। रद्ïदी अखबार से हाथ-मुंह पोछने के बाद बंटी को चाय के लिए आर्डर दिया। बंटी के साथ चाय की चुस्की लेते हुए इधर-उधर की बात करने के साथ अखबार की फाइल पलटने के दौरान एक छोटी सी खबर दिखी। रियासत में बाल दिवस पर स्टेडियम में होने वाले सालाना कार्यक्रमों की तैयारियों को लेकर बैठक की सिंगल कालम खबर थी। संपादक को मीटिंग में एक खबर का आइडिया देने के लिए दिमाग अब दौडऩे लगा। बाल दिवस पर क्या खबर की जाए? जो थोड़ा अलग हो। चाय की चुस्की संग दिमाग में आइडिया के घोड़े दौडऩे लगे थे। होटल में जूठे बर्तन धोते बच्चों और कारखानों में काम करने बच्चों को लेकर इस धंधे में आने के बाद कई रिपोर्ट करने का मौका मिला,लेकिन यहां आकर क्या अलग किया जाए? कुछ अलग करने का कीड़ा दिमाग में एक कोने से दूसरे कोने में कुलबुलाते हुए दौड़ लगा रहा था। दिमागी कीड़ा अभी दौड़ ही रहा था कि अचानक संपादक जी भी रेनकोट पहनकर आते दिखे। मुझे भीगा देखकर बोले एक रेनकोट या छाता भी खरीद लो। जम्मू में बड़ी कड़ी सर्दी पड़ती है, कब अचानक पानी बरसने लगे कहां नहीं जा सकता है। यूपी नहीं है कि भीगते हुए लोगों को छत का सहारा बेहिचक दे देते हैं। यहां अगर कोई दरवाजे के बाहर खड़ा होता है तो संदेह की नजर से देखा जाता है। तुम आज ही जाकर रघुनाथ मार्केट में छाता या रेनकोट ले लेना। दस मिनट बाद मीटिंग स्टार्ट हुई। मीटिंग को पहला एजेंडा मौसम को लेकर था। जम्मू विश्वविद्यालय के साथ आर्ट एंड कल्चर व मौसम बीट कवर करने वाले संजीव पंगोत्रा ने इसकी जिम्मेदारी संभाली। उसके बाद एक-एक रिपोर्टर से आज क्या करेंगे? का सवाल उछलने लगा। मेरे नंबर आने से पहले पांच लोगों को इस सवाल का सामना करना था। कौन क्या जवाब दे रहा है, यह अपने दिमाग के पल्ले नहीं पड़ रहा था, क्योंकि आइडिया का कीड़ा अभी मेरे दिमाग में चक्रमण कर रहा था। अचानक जेहन में फ्लैश बैक की बिजली कौंधी। अपने को हाथ में तख्ती,पीठ पर बस्ता लादे उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद के गांधीनगर में मौजूद प्राइमरी पाठशाला की ओर बढ़ते पाया। पिता जी राजकीय इंटर कालेज बस्ती में गणित पढ़ाते थे, इसलिए अपने स्कूल से नजदीक इसी पाठशाला में नाम लिखवाया था। मैं अपने छोटे भाई के साथ पिता जी के साथ इसी स्कूल में जाता था, वहां का समय याद आ गया जब तख्ती पर लिखने के बाद क से कबूतर, ख से खरगोश, ग से गमला पढ़ता था। फ्लैश बैक तब ब्रेक हो गया जब संपादक जी ने कहा कि दिनेश जी कहां खो गए हैं? हड़बड़ाकर कहा कहीं नहीं सर। आज क्या स्टोरी करेंगे? सर आज मैं भारत-पाकिस्तान सरहद पर मौजूद गांवों में जाऊंगा। वहां जाकर देखना चाहता हूं कि वहां के बच्चों के दिमाग में समाज कौन से ककहरा पढ़ा रहा है? प्राइमरी की किताब में क से कबूतर नहीं तो कमल पढ़ाया जाता होगा लेकिन बच्चों के दिमाग में कौन सा ककहरा चल रहा है? इस पर रिपोर्ट करेंगे। संपादक जी को आइडिया पसंद आया। मीटिंग खत्म होने के बाद इस खबर के लिए जम्मू से सबसे नजदीक सरहद के किस गांव में जाए, इसकी टोह लेने में जुट गया। आरएसपुरा सरहद के नजदीक है। यह जानकारी मिली तो चल दिया बस से आरएसपुरा को। एक घंटे के सफर के बाद आरएसपुरा से सक्तेशवरगढ़ के लिए टेंपो में सवार होकर चला तो रास्ते कारगिल शहीद जवानों के नाम पर बने गांवों के मुख्यद्वार देखकर दिल श्रद्घा से भरता गया। हर दूसरे गांव में दो-तीन शहीद परिवार मिले। सक्तेशवरगढ़ पहुंचा तो संयोग से स्कूल में छुट्ïटी नहीं हुई थी, वहां पहुंचने के बाद सबसे पहले मास्टर साहब के पास पहुंचकर परिचय दिया। नाम दिनेश चंद्र मिश्र, अमर उजाला में पत्रकार हूं, काशी से आया हूं। काशी का नाम सुनते ही मास्टर साहब बहुत खुश हुए। ऐसा लगा जैसे उनके सामने काशी का कोई बड़ा पंडित आया हो। कुर्सी छोडक़र खड़े होने बाद बैठने का आग्रह करने लगे। बगल में पड़ी लकड़ी की कुर्सी खींचकर बैठने के बाद काशी की गलियों से लेकर गंगा मइया तक का कुशलक्षेम बताने के बाद मैं अपनी खबर की दिशा में वाक्ï मार्ग पर उनको लेकर चल निकला। पंद्रह मिनट बाद स्कूल में छुट्ïटी की घंटी बजी तो आधा दर्जन बच्चों के नाम लेकर अपने पास बुलाया। जिन बच्चों को अपने पास बुलाया उनके समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर क्यों बुलाया जा रहा है। मास्टर साहब ने बच्चों को मेरा परिचय कराया। उसके बाद बच्चों से मुखातिब होकर सरहद के हालात पर चर्चा करने के बाद जब पता किया उनके जेहन में कौन सा ककहरा चल रहा है, तो मालूम हुआ अ से आतंकी, ब से बंदूक, स माने सेना। इस ककहरा की जानकारी होने के बाद वहां से गुरुजी को प्रणाम करके चल दिया। आरएसपुरा से जम्मू आने तक छह बज गए थे। संपादक जी भी आ गए थे। दिनभर के दौरे के बाद निकली खबर को बताया तो वह सबेरे की मीटिंग से ज्यादा खुश हुए। आधे घंटे के अंदर खबर फाइल होने के बाद प्रिंट दिया तो उसको पढऩे के बाद उन्होंने सभी संस्करणों में भेजने के लिए कह दिया। अ से आतंकी, ब से बंदर और स माने सेना। यह खबर अमर उजाला के सभी संस्करणों में बेहतर तरीके से परोसी गयी। दूसरे दिन यह ककहरा तमाम दोस्तो को पसंद आया। कुछ ने एसएमएस तो कुछ फोन से बधाई दिए। सबसे ज्यादा खुशी तब हुई जब आरएसपुरा के जिस स्कूल में गया था वहां से एक ग्रामीण का फोन आया, उसने कहा कि हमारा बच्चा आपसे बात करना चाहता है। फोन पर हैलो किया तो उधर से आवाज आयी अंकल नमस्ते, मेरा नाम विक्रम है। आपने मेरी जो खबर छापी है, पापा ने पढक़र सुनायी। मास्टर साहब ने स्कूल में सबको सुनायी। हमको अच्छा लगा, इसलिए पापा से कहा कि अंकल को थैंक्स बोलना है। मासूम बच्चे के प्रति प्यार उमड़ पड़ा, सोचने लगा कि इन मासूमों को समाज कौन दिशा दे रहा है? जिन बच्चों के कंधों पर देश का भविष्य टिका है, यह ककहरा अगर उनके दिमाग में बैठ रहा है तो आगे उनका भविष्य क्या होगा?

5 टिप्‍पणियां:

PRITI ने कहा…

"tan komal mann sunder hai bachche badon se behatar hain" par unke dimag ki kori slate par jab yeh path likha jaega unhe kaun si disha milegi aur uka bhavishya kya hoga ye vicharniya vishay hai .

बेनामी ने कहा…

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