रोमिंग जर्नलिस्ट

मंगलवार, 17 मई 2011

यह है 1947 की लव नहीं त्रासदी स्टोरी

रोमिंग जर्नलिस्ट की रिपोर्ट 7
जम्मू-कश्मीर में एक सप्ताह तक घूमने के बाद काम करेंगे कि नहीं? पहले दिन यह फलसफा पढ़ाने वाले अमर उजाला जम्मू के स्थानीय संपादक प्रमोद भारद्वाज ने सातवें दिन ही आफ बीट स्टोरी के साथ श्रीनगर से लेकर जम्मू सिटी संस्करण के साथ प्रथम पेज पर जाने वाली खबरों के संपादन की जिम्मेदारी मीटिंग में सौंपी। पिछले कई साल से जम्मू में काम कर रहे कानपुर के रहने वाले योगेश शर्मा को खुशी हुई कि काम में हाथ बंटाने वाला कोई आ गया। मीटिंग में कठुआ संस्करण के डेस्क इंचार्ज अनिमेष शर्मा भी आए थे, ताकि वह मुझे नए मकान तक ले जा सके। मीटिंग के बाद जम्मू के पाश इलाके गांधी नगर में पहुंच गया। वहां एक सरदार जी के मकान की उपरी मंजिल को अनिमेष और योगेंद्र ने किराए पर लिया था। तीन कमरों के हवादार मकान में एक कमरे में सूने पड़े बेड पर अपना बैग रखने के जरूरी सामान लेने बगल के मार्केट में चल दिया। सर्द मौसम में गुनगुनी धूप का आनंद मकान की छत पर मिल रहा था। सामान रखने के बाद फिर निकल  पड़ा खबर की खोज में। अखबार में बहुत पढ़ा था कि कश्मीर से पंडितों को भगाया जा रहा है। कश्मीर के खदेड़े गए लोगों की खबर लेने के लिए गांधीनगर से बाड़ी ब्राम्हण की रोड पर निकल पड़ा सिटी बस से। आधे घंटे के सफर के बाद एक शरणार्थी शिविर में था।  शिविर में मिल गए पंडित रामनिवास पंगोत्रा, उम्र साठ पार की थी। बात छिड़ी सन् 1947 की। वह बताने लगे हमारा गांव (पुप्पुर श्रीनगर से दूर है )। गांव में 200 परिवार पंडित, 57 परिवार राजपूत, 22 परिवार सिख और 29 परिवार दूसरे हिन्दू थे। आज की तारीख में अगर आप मेरे गांव में जाएंगे तो तो पूरा गांव मुसलमानों का ही पाएंगे। हमारे घरों पर पर जबरदस्ती कब्जा किया गया।  किसी ने हमारी नहीं सुनी। नेहरू सरकार ने भी नहीं हमारी नहीं सुनी। हम लोग श्रीनगर हब्बाकदाल में आये जहां हमारी दुकान थी। 40 साल ठीक रहा फिर हमें वहां से मजबूरन जम्मू भगाया गया। अब कह रहें कश्मीर हिन्दू का नहीं कल जम्मू में भी ये बढ़ जायेंगे फिर कहेंगे जम्मू तुम्हारा नहीं फिर हम कहां जायेंगे? शरणार्थी शिविर में गुजर-बसर कर रहे हिंदुओं की पीड़ा नजदीक से अनुभव करने के बाद आफिस पहुंचा तो गुगल देवता का सहारा लेकर और भी आंकड़े जुटाने में लग गया ताकि खबर को और भी धार दी जा सके। पांच साल पहले के सरकारी आंकड़ों पर नजर डाली तो पता चला कि नौ लाख साठ हजार सात सौ बीस कश्मीरी हिन्दू कश्मीर से निकाले गए। जो नहीं भागा उसे मुसलमान बना दिया जो नहीं बना उसे मार दिया गया। पंडित जी से कश्मीर की आपबीती सुनने के बाद दिल में धरती के स्वर्ग में कब्जा जमाए आतंकी संगठनों की करतूतों के साथ यहां के नेताओं के बारे में सोचने लगा। कश्मीर में आजादी के बाद हिंदुओं ने क्या खोया? इसकी खोजबीन में जुटा तो पता कि आज जिसे सोपोर कहते हैं, उसका पुराना नाम शिवपुरा था। इसी तरह बारामुला का पुराना नाम ब्रह्मापुरा, आज जो काजी कुंड है वह असल में कभी काशीकुंड के नाम से जाना जाता था। दुनिया में खूबसूरती के लिए मशहूर गुल मार्ग का पुराना नाम गोविन्द मार्ग रहा है। ये नाम पहले कभी नहीं बदले गए थे जो सदियों से थे इतिहास देखकर इसकी पड़ताल की जा सकती है। न जाने और कितने ऐसे नाम हैं जो कश्मीरी मुसलामानों ने बदल दिए। अब कुछ ही नाम हैं जो कश्मीर घाटी में बच गए हैं। जैसे श्रीनगर,अमरनाथ,पंचतरनी आदि। ये नाम तब के हैं जब मुनि वशिष्ठ और विश्वामित्र जी ने तप किये थे। बाबा भोले नाथ कि कर्मस्थली भी वहीं थी। कश्मीर तब भी हिन्दुस्तान का था और आज भी है और कल भी रहेगा लेकिन जब किसी परिवार में कोई बाहरी घुस जाता है तो परिवार बिखर जाता है वही कश्मीर के साथ हुआ। शरणार्थी शिविर में मिले एक इतिहास के जानकारों ने बताया कि जब अफगानों ने कश्मीर पर हमला किया पूरा देश रजवाड़ों में बंटा था। जब अंग्रेजों का राज था तब भी कश्मीर में हिन्दू राजवाड़ों का राज था, गड़बड़ तब हुई जब हिन्दुस्तान को आजादी मिली और राजा हरि सिंह ने खुद को अलग देश घोषित किया उसी तरह हैदराबाद,जूनागढ़,जयपुर ने भी अपने को अलग ही माना। पकिस्तान ने इसी मौके का फायदा उठाया और अपने लोगों से कश्मीर पर कब्जा करा दिया। पीओके में हिन्दुओं का कत्लआम हो रहा था जो बचे भाग कर हिन्दुस्तान आये।  राजा हरि सिंह के बहुत सारे रिश्तेदार मारे गए तब हिन्दुस्तानी फौज ने भी हमला किया और पाकिस्तान हार गया। लेकिन जो पाकिस्तानी मुसलमान यहाँ घुस गए थे वो वापिस नहीं गए. जिसके कारण आज कश्मीर में दहशतगर्दी बढ़ रही है। इन सब जानकारियों को एक स्टोरी के रूप में परोसना मुश्किल था। शरणार्थी शिविर में रहने वाले कश्मीरी पंडितों के हाल पर स्टोरी तैयार हुई। फोटो के साथ उसको फ्रंट पेज पर लेने का फैसला लिया गया। लेटनाइट फ्रंट पेज की जो डमी आयी, उसमें विज्ञापन इतना था कि खबर को अंदर छापने का निर्णय संपादक जी ने लिया। विज्ञापन के बोझ से अंदर के पन्ने भी असंतुलित थे, खैर खबर छपी बिना फोटो के। जगह के चलते वह इतनी छोटी हो गयी कि उसकी आत्मा अगले दिन अखबार में कई बार पढऩे के बाद भी नहीं मिली। ऐसा इसके पहले भी कई बार हो चुका था, फिर भी अगले दिन कई घंटे मूड आफ ही था। दिल में खबर की मजबूरन सर्जरी से ज्यादा  दुख कश्मीरी पंडितों के हाल को देखकर हुआ। मीटिंग में विज्ञापन के कारण खबर का डिस्पले ठीक न हो पाने का अफसोस संपादक जी ने भी जताया,लेकिन उनके हाथ में भी कुछ नहीं था। मीटिंग में उन्होंने ऐसे विभागों को टच करने को कहा, जहां कोई यहां का रिपोर्टर जाता ही नहीं हो। उनके इस निर्देश के बाद ऐसे कई क्षेत्र चिन्हित किए। और चल दिया सीबीआई दफ्तर।
क्रमश:




2 टिप्‍पणियां:

mitthu ने कहा…

आपने जम्मू प्रवास का वृतांत लिखने के लिए ब्लॉक बना रखा था, शुक्रिया...। आठ अंश तक बिना सांस लिए पढ़ गया। आगे का इंतजार है, आप जो लिख रहे हैं वह आपकी थाती होगी।

dinesh chandra mishra ने कहा…

thx brother

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