रोमिंग जर्नलिस्ट

मंगलवार, 17 मई 2011

एक गांव ऐसा जहां है तेरह लादेन

रोमिंग जर्नलिस्ट की रिपोर्ट  6
जम्मू-कश्मीर की लुभाती वादियां, हिमालय की बर्फीली चोटियां, दूर-दूर तक फैले हरे-भरे मैदान, चुपचाप बहते नदी-नाले और झरनों की मीठी आवाज यह सबकुछ सिनेमाहाल या टीवी पर देखना जितना दिल को लुभाता है,उससे कई गुना ज्यादा सुकून यह चीजें दिल,दिमाग को देती हैं। इसका अहसास जम्मू-कश्मीर में पहुंचने के बाद एक संडे को उधमपुर की अधूरी बस यात्रा के दौरान ही हो गया। शंकराचार्य मंदिर, हजरतबल की पाकीजगी,नागिन झील व डल झील का झिलमिलाता सौंदर्य, मुगल उद्यानों का शाही खुशबू, हिमशिखरों का धवल सौंदर्य और ताजगी देती आबोहवा के लालच में संपादक जी को सबेरे मीटिंग में न आ पाने का एसएमएस भेज दिया। उद्यमपुर के प्राचीन रघुनाथ मंदिर,जालन्धरी देवी मंदिर की मान्यता के बारे में अमरउजाला जम्मू के साथी उमेश पंगोत्रा के मुंह से सुना था। बस में संयोग से आगे की सीट मिल गयी। मातारानी के जयकारा के साथ बस चली तो कुछ ही देर बाद नागिन पहाडिय़ां भी हम सफर बन गई। उनको देखकर मजा भी आ रहा था, लेकिन बस की स्पीड देखकर शाम तक आफिस लौटने का टाइम मैनेजमेंट गड़बड़ाता भी दिख रहा था। नौ बजे से शुरू हुआ सफर दिन में बारह बजे तक आधा भी पूरा नहीं हुआ था, बस चालक से पूछा कब तक पहुंचेंगे तो जवाब मिला तीन बजे के बाद। इस जवाब को सुनने के बाद शाम को आफिस पहुंचने के चक्कर में ना चाहते हुए भी यात्रा को बीच में छोडऩे का फैसला लेना पड़ा। जम्मू-श्रीनगर राजमार्ग पर तीन घंटे का सफर तय करने के बाद उतरने पर भूख लग आयी थी। एक होटल पर पहुंचा तो वहां की लोकल डिश कालादी-सैंडविच चखने पर तो बनारस की कचौड़ी-पूड़ी की याद आ गयी। इस पहाड़ी डिश का गजब का स्वाद लगा। पेट भरने के बाद अब दिमाग खबर की तरफ दौडऩे लगा। दिल-दिमाग खबर का ताना-बाना बुनने में जुट गए। सोचते-सोचते चाय की तलब लग गयी। चाय के लिए पहाड़ी पर बने एक होटल के बाहर पहुंच गया। होटल में चाय मांगने पर दुकानदार ने कहा लादेन साहब को चाय देना। बनारस में था तभी अमेरिका में 9/11 की घटना के बाद ओसामा बिन लादेन का नाम दुनियाभर की मीडिया में छा गया था। उधमपुर से पहले होटल में तेरह साल के लडक़े का नाम लादेन सुनकर चौंक पड़ा। गोरा-चिट्ïटा मासूम लादेन चाय का गिलास थमाने के बाद बड़े गौर से देखने लगा। चाय खत्म होने के बाद लादेन से पूछा स्कूल जाते हो? जवाब नहीं की मुद्रा में सिर हिलाकर दिया। पूछा कि लादेन नाम अब्बा ने रखा? इसका जवाब वह आंखों से होटल मालिक की तरफ इशारा करके दिया। चाय के पैसे चुकाने दुकानदार के पास पहुंचे तो कहा कि बच्चे को आतंकवाद की ट्रेनिंग दे रहो हो क्यों? नाम लादेन रख दिए। इस सवाल को सुनने के साथ वह मेरा हुलिया देखकर कुछ सकपकाते हुए कहा कि नहीं साहब जब से अमेरिका की घटना हुई तो यहां लादेन नाम का फैशन आ गया है। इसको तो लोग प्यार से लादेन बुलाते हैं, बगल एक गांव का नाम लेते हुए कहा कि वहां जाएंगे तो एक गांव में तेरह लादेन मिलेंगे। दिमाग में खबर की घंटी बज चुकी थी, अब मासूम लादेन को खोजने के लिए निकल पड़ा। जिस गांव का जिक्र होटल मालिक ने किया था, वहां आधे घंटे में पहुंच गया। गांव वालों से सीधे लादेन की खोजबीन मुनासिब नहीं समझा। एक बुजुर्ग दिखे उनके पास पहुंच कर बोला मैं अमरउजाला जम्मू में चीफ रिपोर्टर हूं, नाम है दिनेश चंद्र मिश्र। गांव में बच्चों की पढ़ाई का हाल देखने के लिए आया हूं। साठ पार कर चुके जावेद मियां बोले मियां बैठो। बोले इस रियासत में तालीम का हाल उम्दा नहीं है। स्कूल के जर्जर भवन की तरफ इशारा करते बोले उसको देख ही रहे हो, अब वहां तालीम लेने वाले बच्चों से मिल लो, खुद अंदाजा लग जाएगा। जावेद मियां ने लादेन की आवाज लगाई तो दस-बारह साल के तीन बच्चे आ गए। लादेन का नाम सुनकर चौंकने के बाद मैने पूछा इनका नाम लादेन है? बोले मियां लादेन एक..दो नहीं इस गांव में तेरह हैं। चौंकते हुए पूछा कि लादेन नाम पैदा होने के साथ रखा गया था क्या? नहीं मियां लादेन ने अमेरिका की छाती पर चढक़र उसको जो औकात बतायी, उससे हम सबका सीना फख्र से ऊंचा हो गया है। हिंदू जिस तरह अपने बच्चों के नाम राम,लक्ष्मण,कृष्ण जैसे भगवान के नाम पर रखते हैं, उसी तरह हमारे लिए अब लादेन हैं। दुनिया भले ही लादेन को आतंकी माने लेकिन हमारे लिए वह खुदा से कम नहीं है। इंशाअल्लाह एक दिन कश्मीर में भी लादेन के नाम का परचम लहराएगा। देखने में शालीन बुजुर्ग दिखने वाले जावेद मियां की जहरभरी बातों को सुनकर तन-बदन में आग लग गयी। दिल कर रहा था लादेन के इस भक्त का गला दबा दें, लेकिन मन मसोस कर रह गया। लादेन नाम रखने पर किसी को आपत्ति नहीं है? मियां यह आजाद मुल्क है। जावेद मियां ने जितने लादेन बुलाए थे, उनकी फोटो खींचने के इरादे से जेब से मोबाइल निकला। मोबाइल हाथ में देखकर जावेद मियां चौंक गए बोले मियां यहां नेटवर्क जल्दी नहीं मिलता है। खैर मोबाइल में नेटवर्क की एक झलक दिखाई पड़ी। फोन लगाने के बहाने लादेन की फोटो खींचने के बाद जेब में उसे रखकर बोला नेटवर्क की प्राब्लम बहुत है। आधे घंटे की बातचीत को समेटने की भूमिका बनाने के साथ पेन-डायरी भी जेब में रखने लगा। जावेद मियां पूछ बैठे मियां किस अखबार में छपेगा? जवाब दिया अमर उजाला? यह तो हिंदी अखबार है, उर्दू में यह नहीं निकलता है क्या? जम्मू-कश्मीर के नंबर वन हिंदी अखबार के प्रति उनका नजरिया देखकर दिल में उनके प्रति और भी घृणा पैदा हो गयी। खैर खुदाहाफिज बोलकर वहां से चल दिया। संयोग से जम्मू लौट रही एक ठसाठस भरी बस मिल गयी। उसमें सवार हुआ। शाम को छह बजे विक्रम चौक पहुंच गया। आफिस में संपादक जी तब तक नहीं आए थे। फ्रेश होने के साथ चाय-पकोड़ी खाकर उनका इंतजार करने लगा। कुछ देर बाद चैम्बर में घुसने से पहले संपादक जी की नजर मेरे ऊपर पड़ी, देखते ही बोले दिनेश मीटिंग से पहली बार तुमको छूट दे दी, आइंदा ऐसा नहीं होगा.. मैने कहा जी सर। दस मिनट बाद उनके चैंबर में घुसकर इस स्टोरी की चर्चा की, बोले मामला तो गंभीर है बास(शशिशेखर) से पूछना होगा, खैर तुम एक माइल्ड स्टोरी बनाओ, देखते हैं। स्टोरी लिखी एक गांव ऐसा जहां रहते हैं तेरह लादेन। मोबाइल कैमरे की क्षमता कम होने के कारण उससे खींची गई फोटो छपने लायक नहीं थी। लादेन की फोटो के साथ स्टोरी छपने के लिए तैयार थी, संपादक जी ने स्टोरी को ई-मेल से समूह संपादक शशिशेखर के पास भेजा। एक घंटे बाद संपादक जी टहलते हुए मेरे पास आए, बोले बास ने कहा है कि दिनेश को बोलो अभी घूमे-टहले जब समझ में आ जाए तो फिर सलीके से काम करेगा। यह जवाब समझ से परे था। खैर स्थानीय संपादक प्रमोद भारद्वाज ने बताया कि यहां किस तरह अमर उजाला रिपोर्टरों को आतंकी संगठनों से जान से मारने की धमकी के परचे उनके दरवाजे पर चिपके मिलते हैं। पीओके से अक्सर धमकी भरे मेल भी आते रहते हैं। तुम्हारी खबर से कुछ फिर बवाल हो सकता है। तुम अभी घूम-टहलो काम करने के लिए और भी इलाके हैं। दिल में स्टोरी की हत्या का दुख: हिलोरे मार रहा था, उसको जुबान तक आने नहीं दिया। रोजाना की अपेक्षा व्यवहार में थोड़ा रुखापन देखकर संपादक जी रात दस बजे बगल में आकर कुर्सी पर बैठ गए। बोले कब तक होटल में रहोगे,पैसा ज्यादा खर्च हो जाएगा, तुम्हारा परिवार भी है। डेस्क  पर काम कर रहे अनिमेष शर्मा (अब दैनिक भास्कर में) को बुलाया। बोला यह अनिमेष है, गांधीनगर में इसने योगेंद्र के साथ दो कमरे का फ्लैट लिया है। इनके साथ ही कल शिफ्ट हो जाओ। जी सर कहकर काम खत्म करके फिर होटल पहुंच गया। रात में जब तक नींद नहीं आयी तब तक लादेन की स्टोरी की भ्रूण हत्या दिल,दिमाग में चुभती रही। खैर अगले दिन चेकआउट करने के बाद एयरबैग के साथ अमर उजाला दफ्तर पहुंचा। कंधे पर बैग लटका देखकर सिक्योरिटी गार्ड बोला साहब आप भी घर जा रहे हैं क्या? उसका सवाल सुनकर मैने कहा कि मैं रणछोड़ सिंह नहीं हूं। मैदान में आखिरी दम तक मरने-मारने की क्षमता माता रानी ने दी हैं। माता रानी जब तक चाहेंगी, तब तक यहां रहेंगे। माता रानी का नाम सुनकर वह भी उनके गुणगान में व्यस्त हो गया। बोला साहब दूसरे यूनिट से यहां जो लोग आते हैं, वह जल्द ही नौकरी छोड़ देते हैं या चले जाते हैं, इसलिए यह सवाल पूछा बुरा मत मानिएगा। मैने कहा कि कोई बात मैं दिल में नहीं रखता, जो दिल में होता है उसको कह देता हूं। मीटिंग में अभी समय था, संपादक भी नहीं आए थे। इसलिए उसके साथ चाय पीकर दोस्ती गाढ़ी करने में जुट गया ताकि खबरों की खोजबीन में वह काम आ सके। चाय की चुस्की संग उसको डोगरी भाषा सिखाने के लिए अपना गुरु बना लिया। डोगरी जरूरी होने के कारण रोजाना एक घंटे उससे पढ़ाने का वादा भी लिया। चाय का गिलास खाली होने के साथ संपादक जी आते दिखाई पड़े और उससे विदा ले कर चल दिया। 
क्रमश:




1 टिप्पणी:

PRITI ने कहा…

hazaron meel ki yatra ki shuruaat ek kadam se hi hoti hai .ye bhi jaan lena aavashyak hai ki aap yaatri banana chahate hain ya salani , pahala sabak jo ham seekhte hain wo hai ki cheezen kitni asthai aur prantiy hoti hain .

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