रोमिंग जर्नलिस्ट

मंगलवार, 17 मई 2011

रघुनाथ मंदिर पर अजबसिंह का गजब प्रेम

रोमिंग जर्नलिस्ट की रिपोर्ट 3
अमरउजाला जम्मू दफ्तर की सीढिय़ा जिस रफ्तार से चढ़ा था उसी रफ्तार से उतरने के बाद विक्रमचौक से रघुनाथ बाजार की तरफ जाने का प्लान दिमाग में बना। मस्ती में पैदल चौराहा पार करते ही तवी नदी पर आ गया। पुल पर खड़े होकर तवी की धारा को देखते हुए सोच के समंदर में बहने लगा। सर्द मौसम में हसीन वादियों के बीच पत्थरों से टकराकर बहती हुई तवी को एकटक देखते हुए दिल में खबरों का लेकर ताना-बाना बुनने लगा था। तवी की अविरल धारा के साथ आते-जाते लोगों का श्रद्घा के साथ शीश झुकाना देखकर गंगा मइया की याद आने लगी। घाटी में काशी जैसे घाट की कल्पना बेमतलब है, लेकिन सोच को किसी डोर में बांधा तो नहीं जा सकता, लिहाजा तवी के किनारे घाट की खोजबीन चलती रही। तवी पर घाट के नाम पर वाहनों की धुलाई करते ट्रक और बस के क्लीनर के अलावा पत्थर निकालते मजदूरों की भीड़ ही दिखी। तवी और खुद के बीच चल रहे मूक संवाद को तब विराम लगा जब सेना के वाहनों का काफिला हूटर बजाते हुए गुजरा। घड़ी पर नजर डाली तो बारह बज गए थे। मंदिरों की नगरी जम्मू में सबसे पहले रघुनाथ मंदिर में मत्था टेकने के लिए चल पड़ा। अक्टूबर का आखिरी सप्ताह था, रघुनाथ बाजार में खरीदारी करती महिलाओं की भीड़ दिखी। बाजार में जगह-जगह बालू के ढेर से बने बंकर में एक-47 व 56 के साथ तैनात सीआरपीएफ के जवानों की मौजूदगी यह अहसास दिला रही थी कि यह आतंकवाद का जिंदगी पर कितना असर है। रघुनाथ मंदिर पहुंचा तो वहां और भी कड़ी सुरक्षा व्यवस्था देखकर सालों पहले रघुनाथ मंदिर को उड़ाने के लिए हुए आतंकी हमले की सुर्खियां दिमाग में ताजा हो गयी। रघुनाथ मंदिर पर मोबाइल और चमड़े की बेल्ट निकालकर तलाशी की कतार में लगा तो अचानक आंखों में उम्मीद की चमक दिखी। चमक अपनेपन की थी। जिस जवान ने तलाशी थी, उसकी कडक़ वर्दी पर नेमप्लेट पर लिखे अक्षर ही यह अहसास दिला रहे थे। नाम लिखा था- अजब सिंह यादव। इसे पढऩे के बाद दिल-दिमाग आपस में गुफ्तगू करने लगे कि यादव जी या तो गाजीपुर के होंगे या इटावा के होंगे। यह सोचते-सोचते मंदिर के अंदर पहुंचकर राजा राम चंद्र जी का मूर्ति का दर्शन किया। यहां आकर काशी-विश्वनाथ मंदिर की यादें ताजा हो गयी। मंदिर में आने वाले श्रद्घालुओं को जिस तरह पंडे अपने जाल में फंसाने के लिए श्लोक का वाचन करते हुए ढेरों ज्ञान बघारते हैं, उसी तरह जम्मू के रघुनाथ मंदिर में भी मंजर दिखा। रोली-चंदन युक्त थाली में पुष्प-अक्षत के साथ सौ-सौ के नोट सजाकर सुखी जीवन और मनोकामना पूर्ति के लिए संकल्प कराने का हरेक श्रद्घालु पर दबाव बनाने में पंडे कोई संकोच नहीं कर रहे थे। खैर इनसे पीछा छुड़ाकर भगवान राम के चरणों में शीश नवाने के साथ जिंदगी की नई मंजिल संग मिली नई चुनौती को सामना करने की शक्ति देने की प्रार्थना मन में की। मंदिर के अंदर स्फ टिक का पारदर्शी शिवलिंग मेरे लिए अद्ïभूत चीज थी। यहां पर भी तैनात पंडित जी हर श्रद्घालुओं को ग्राहक फंसाने के अंदाज में डोरे डाल रहे थे। मंदिर में मौजूद सभी देवी-देवताओं के दर पर मत्था टेकने के बाद बाहर निकला। दिमाग में अजब सिंह यादव ही घूम रहे थे। रघुनाथ बाजार में खरीदारी करती महिलाओं की भीड़ के बीच अचानक अजब सिंह को देखकर आंखों में चमक आ गयी। करवाचौथ की पूर्व संध्या पर भीड़ देखकर बनारस का गोदौलिया बाजार याद आ गया। खुद को अजब सिंह यादव के पास पहुंचना था, इसलिए नजदीक पहुंचकर जय हिंद बोला। जवाब जय हिंद ही मिला। पूछा इटावा के हैं क्या यादव जी? ऊपर से नीचे तक एक्स-रे जैसी नजरों से मुआयना करने के बाद वह बोले गाजीपुर का हूं। यह सुनकर ऐसा लगा जैसे कोई अपना मिल गया हो। अपना परिचय देते हुए कहा ..मैं दिनेश चंद्र मिश्र, अमर उजाला बनारस से जम्मू-कश्मीर तबादला होकर आया हूं। दस साल की नौकरी में  चाल, चेहरा व चरित्र से बनारसी हो चुके  इस शख्स को अजब सिंह यादव ने जिस तरह का स्नेह दिया, वह आज भी जेहन में बरकरार है। बनारस से बातचीत चालू हुई घर-परिवार तक पहुंच गयी। सुरक्षा में लगे जवानों को देखते हुए मैने अजब भाई से पूछा कि आपकी पत्नी करवाचौथ नहीं मनाती हैं क्या? निरजला व्रत रहती है, लेकिन शादी के बाद से आज तक कोई ऐसा मौका नहीं मिला, जब चांद के साथ जब उसके सामने मौजूद रहूं। इस खबरनवीस से भी उनका यही सवाल था। प्रतिउत्तर दिया कि अखबार की नौकरी में यह चौथा करवाचौथ है, जब पत्नी के पास नहीं हूं। अपने दिमाग में खबर की बुनियाद खड़ी होने लगी थी, अजब सिंह से पूछा करवाचौथ के दिन क्या करते हैं? जवाब था यहां आसमां में चांद दिखता है तो दो साल से फोन करके हैप्पी करवाचौथ बोल देता हूं। पति-पत्नी आवाज में ही एक दूसरे का अक्स खोज लेते हैं। अब दिमाग में खबर का खाका तैयार हो गया था। फिर मिलने का वादा करके उनसे विदा ली। रघुनाथ बाजार में टहलने के साथ अब ऐसे जवानों को खोजने का लक्ष्य बनाया, जिनके नाम से लगता हो कि उनकी पत्नियां भी करवाचौथ मनाती हो। जम्मू पुलिस लाइन के पास भी बंकर के पास एक जवान मिल गया कानपुर का। उसका कहना था अटल जी के राज में जम्मू-कश्मीर में मोबाइल सेवा चालू होने के बाद घर-परिवार से बात हो जाती है। करवा चौथ के दिन चांद दिखने पर पत्नी को विश करता हूं। पत्नी जितना उस दिन चांद को देखने के लिए बेताब रहती हैं, उससे कम मैं भी नहीं रहता हूं। बाड़ी ब्राम्öïण के पास मिले एक जवान की करवाचौथ से जुड़ी यादें सुनकर तो आंखें गीली हो गयी। नाम था हरजिंदर सिंह। पंजाब का रहने वाला था। बताया पिछले साल डोडा में तैनात था करवाचौथ का दिन था, चांद निकल आया लेकिन नेटवर्क प्राब्लम के कारण फोन नहीं मिल पा रहा था। रात बारह बजे के बाद जब फोन मिला तो मेरी आवाज सुनकर बीबी रोने लगी, मैं भी उसको चुप कराते हुए अपने आंसुओं को नहीं रोक पाया। किसी तरह चुप हुई तो पता चला कि उसने मेरे फोन के इंतजार में पानी भी नहीं पिया है। सेना के जवानों को मातृभूमि की रक्षा के लिए घर-परिवार से दूरी के साथ संवेदनाओं को सीने में दफन करने की क्षमता देखकर दिल उनको बार-बार सेल्यूट कर रहा था। दर्जनों जवानों से करवाचौथ को लेकर ढेरों बातें करने के बाद घड़ी की ओर देखा तो चार बजने में कुछ मिनट कम थे। सिटी बस पकडक़र विक्रम चौक पहुंच गया। सीधे आफिस में गया, संपादक जी अभी आए नहीं था। एक कम्प्यूटर पर बैठकर पहली स्टोरी जम्मू डेटलाइन से फाइल की। हेडिंग थी- आसमां में दिखेगा चांद तो आवाज में दिखेगा अक्स। यह स्टोरी सेना के उन जवानों को समर्पित थी जो बीबी-बच्चों से दूर रहकर किस तरह घर पर होने वाले त्योहार का हिस्सा बनते हैं। उनको कितनी दिक्कतें आती हैं, क्या महसूस होता है। दिल,दिमाग के प्रयोग से न्यूज स्टोरी खूबसूरत बन गयी थी, कई बार खुद पढऩे के बाद प्रिंट निकालकर रख लिया। आफिस से नीचे उतरकर चाय की दुकान पर पहुंचा। चाय के साथ गर्म पकोड़ी का स्वाद चखने के साथ न्यूज स्टोरी को बार-बार पढ़ा ताकि कोई गलती हो तो उसे संपादक के हाथ मेें देने से पहले दूर किया जा सके। ठंड में चाय की चुस्की संग संपादक का इंतजार चलता रहा। और अचानक संपादक जी अपनी बाइक से आते दिखे।
                                                           क्रमश:


4 टिप्‍पणियां:

PRITI ने कहा…

always express yourself to someone who cares for you , not to someone who needs you , because CARE means personal commitment and NEEDS means personal requirement !!

vishal singh ने कहा…

guuuuuddddddddddddddddd

शशिकान्‍त अवस्‍थी ने कहा…

मिश्रा जी कृपया क्रम से सभी स्‍टोरी (आरभंसे अतं तक) का प्रकाशन करे कि हमारे जैसे लोग भी आपकी लेखन शैली का फायदा उठा सके ।
शशिकांत अवस्‍थी कानपुर ।

बेनामी ने कहा…

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