रोमिंग जर्नलिस्ट

मंगलवार, 31 मई 2011

चलते-चलते अंताक्षरी, जवान बोले थम

रोमिंग जर्नलिस्ट की रिपोर्ट 12
रात के एक बजे गए थे। अमर उजाला सिटी एडीशन का पेज फाइनल होने के बाद विक्रम चौक से गांधीनगर का सफर रोजाना की तरह मैने,अनिमेष और योगेंद्र सेन प्रारंभ किया। पर्याप्त गर्म कपड़ों के बावजूद हाड़ कंपाऊ ठंड का अनुभव हो रहा था। पुलिस लाइन के गेट के पास रोजाना की तरह टेम्प्रेचर वाच पर नजर डाली तो तापमान माइनस सात डिग्री सेल्सियस दिखा। ठंड की ठिठुरन भगाने के लिए दिमाग में आइडिया आया कि हम लोग अंताक्षरी खेलने के साथ सफर जारी रखे। बाथरुम से लेकर बाइक तक पर गुनगुनाने में माहिर अनिमेष ने गाना स्टार्ट किया। उसके बाद योगेंद्र की बारी आयी। योगेंद्र कोई गाना गुनगुना रहा था, उसको हम लोग कंपकंपाते हुए बहुत खूब का तकिया कलाम सुना रहे थे। इसी बीच सैन्य क्षेत्र में प्रवेश कर गए। सुनसान सडक़ पर अचानक हम लोगों के पीछे से कहीं से तेज फ्लड लाइट पडऩे के साथ थम की बहुत तेज आवाज गूंजी। जम्मू-कश्मीर में रात में सफर के वक्त सेना के कायदे-कानून का किस तरह पालन करना हैं? इसके बारे संपादक प्रमोद भारद्वाज ने कुछ दिन पहले ही बताया था, वही सीख काम आयी। हम सब अंताक्षरी भूलकर वहीं सावधान की मुद्रा में खड़े हो गए। पीछे से पड़ी फ्लड लाइड से सडक़ पर हम लोग अपनी छाया को घूर रहे थे, इसी बीच सामने से भी एक फ्लड लाइट चेहरे पर पड़ी। यह फ्लड लाइट सेना के वाच टावर के जवानों ने सुरक्षा के नजरिए से मारी थी। हम लोगों का चेहरा देखने के बाद फ्लड लाइट बुझ गयी। हम फिर गांधीनगर की ओर चल पड़े। दस कदम के बाद सेना के जवानों की एक टुकड़ी ने हम सबको रोकने के बाद परिचय पूछा, कहां से आ रहे हैं, कहां जा रहे हैं? आईकार्ड दिखाइए?  सबका उत्तर देने के बाद पूछा कहां के रहने वाले हो? मैं दिनेश चंद्र मिश्र काशी से कश्मीर आया हूं, अनिमेष ने राजस्थान और योगेंद्र ने मध्यप्रदेश से आने की बात बतायी। तलाशी के साथ पूछताछ करने वाले जवानों में दो जवान गाजीपुर के ही थे। वह अपने आफिसर की ओर मुखातिब होकर मुझे देखकर बोले साहब गंगा किनारे का यह भी छोरा है। आधे घंटे तक तलाशी के बाद हम सब आगे के लिए रवाना हुए। रास्ते में माता रानी की महिमा का बखान करते हुए उनको दिल से धन्यवाद दिया। और विनती की वह अपनी कृपा बनाएं रखें। जब हम लोग गांधीनगर स्थित अपने किराए के आशियाने पर पहुंचे तो रात के दो बज गए थे। रात में काफी देर तक यहां के हालात और काम करने की परिस्थितियों को लेकर दिमाग में ढेरों सवाल आते रहे, इन सवालों के साथ आंखें कब बोझिल हो गयी पता हीं नहीं चला। सुबह नौ बजे नींद खुली। फ्रेश होने के साथ मीटिंग के लिए निकल पड़ा। अनिमेष और योगेंद्र को जगाना मुनासिब नहीं समझा।
विक्रम चौक पहुंचने के बाद आफिस के सामने ही पहली चाय पीने के बाद मीटिंग का इंतजार करने लगा। दिमाग में लखनऊ के आरसी शर्मा घूम रहे थे। मीटिंग में मैने जम्मू के जानीपुरा इलाके में मौजूद स्टेट फारेस्ट रिसर्च सेंटर पर एक खबर का आइडिया दिया। संपादक ने पूछा खबर क्या दोगे? इस सवाल को सुनकर दिमाग में पिछले दिनों पढ़ा एक समाचार याद आ गयी , जिसमें जंगली जानवरों के रिहायशी इलाकों में आकर हमला करने का मामला था। मैने कहा जंगली जानवरों के अचानक रिहायशी इलाकों में आने के पीछे क्या कारण है? इसपर रिपोर्ट करूंगा। संपादक जी ने इस स्टोरी पर दो-तीन प्वाइंटस अपने तरफ से भी दिए। मीटिंग के बाद फिर सिटी बस पर बैठकर जानीपुर चल दिया। जानीपुर में बस स्टाप से स्टेट फारेस्ट रिसर्च सेंटर तक जाने में काफी दूर तक पैदल चलना पड़ा। खबर की भूख और अपनों से मिलने की चाह में थकावट का अहसास ही नहीं हुआ। सेंटर पहुंचने के बाद चंद मिनटों में ही आरसी शर्मा के कमरे में दाखिल हो गया। कुर्सी छोडक़र जिस तरह शर्मा जी मिले, उसे देखकर दिल,दिमाग व देह में जो गर्मजोशी का अहसास हुआ, उसको शब्दों में व्यक्त करना नामुमकिन है। जम्मू-कश्मीर आने की कहानी के साथ चंद खबरों को लेकर चर्चा शुरू हो गयी। खबरों के बाद जम्मू-कश्मीर में काम की चुनौतियों पर बात चली तो रात का किस्सा सुनाया तो बदले में उन्होंने वह इस तरह के दर्जनों किस्से सुनाए। इन्हें सुनकर रोमांच के साथ अनुभव की सीख भी मिल रही थी। दो कप चाय के बाद पुन: खबरों की बात छेड़ दी। जंगली भालू के रिहायशी इलाकों में बड़ी संख्या में आने के पीछे के कारणों को जानने के लिए सवाल किया तो पता चला जम्मू-कश्मीर में सन्ï 1996 में सेना की बड़ी संख्या में तैनाती के बाद जहां चरमपंथियों की गतिविधियों पर अंकुश लगा, वहीं जंगली जानवरों को अवैध शिकार भी बंद हो गया है। सेना की तैनाती से पहले जहां जम्मू-कश्मीर में जंगली जानवरों का अवैध शिकार और उनको सीमा पार भेजने वाले तस्करों की तादाद ज्यादा थी, वहीं सेना के आने के बाद जंगल में शिकार करना मौत को दावत देना जैसा हो गया है। सेना के हाथों जंगली जानवरों के शिकार का दुस्साहस करने वाले कई शिकारी ढेर हो गए। सेना की सक्रियता के कारण जहां अवैध शिकार बंद हो गए, वहीं जानवरों के लिए यह माहौल जन्नत से कम नहीं है। जंगली जानवरों में सेना की तैनाती से पहले और उसके बाद की आबादी में हुई बढ़ोत्तरी के आंकड़े इस बात की गवाही दे रहे थे। एक खबर अब तक जेब में आ गयी थी। सोचा रोजाना थोड़े यहां आऊंगा, कुछ दिन का स्टाक यहां से ले चले। सेंटर में हो रहे शोध पर चर्चा हुई तो मिशन बंबू से जुड़ी एक बड़ी खबर मिली। चार-पांच खबरों का स्टाक डायरी में आ जाने के बाद शर्मा से मोहलत मांगने की भूमिका में आने लगा तो वह बोले आइए मिश्रा जी आपको अपना काम दिखाते हैं। लंबे-चौड़े फार्म हाउस को देखने के बाद अचानक वह एक वृक्ष के नीचे रुके। बोले यह साधारण पेड़ नहीं हैं, इसे आर्ट आफ लिविंग के गुरु रविशंकर ने दिया था। विदेश से लाए इस वृक्ष को यहां लाने के बाद इसका पौध तैयार किया, इसका वितरण अब हो रहा है। गुरु रविशंकर की ओर से दिए गए वृक्ष को देखकर सोचने लगा कि काश हम लोग भी अगर एक दूसरे को उपहार में पौध देने लगे तो वह दिन दूर नहीं जब ओजोन परत को लेकर दुनिया में उठ रही पर्यावरण-प्रदूषण की चिंता ही खत्म हो जाएगी। दो घंटे तक जानीपुर में भ्रमण करने के बाद वहां से चल दिया। सोचा पहली खबर जंगली जानवरों पर ही देते हैं। सेना के जवानों की तैनाती के बाद- जम्मू-कश्मीर बन गया है जंगली जानवरों का जन्नत। दिमाग में खबर का यहीं एंगिल सेट हो गया था। आफिस पहुंचकर जंगली जानवरों के जम्मू-कश्मीर के जन्नत बनने की कहानी के साथ आंकड़ों को परोसते हुए खबर संपादक जी के आने से पहले ही तैयार करके प्रिंट भी निकाल लिया। शाम को संपादक जी आए तो उनके सामने जब खबर की कापी रखी तो वह बहुत खुश हुए। कितनी बार गुड बोले याद नहीं। इस खबर को सभी संस्करणों को भेजने के लिए कहने के साथ बोले ऐसी खबरें ही पढ़ी जाती हैं, शर्मा जी से संपर्क बनाए रखना, वहां से अभी और भी खबरें निकलेंगी। संपादक जी को यह नहीं बताया कि आधा दर्जन खबरें लेकर आया हूं। उनकी बात सुनकर हां में सिर हिलाते हुए कहा कि सोच रहा हूं सर हर सप्ताह एक दिन जानीपुर जाऊंगा। उनका जवाब था..‘गुड’  अपने दिमाग में प्लान बना एकाध दिन खबरों के नाम पर जानीपुर जाने के बहाने कहीं और मस्ती करने जाया जाएगा। दिमाग में चल रही इस खिचड़ी से अंजान संपादक जी से विदा लेकर रुटीन काम में जुट गया। एक घंटे के अंदर अमर उजाला के दूसरे संस्करणों से फोन आने लगे, भाई आज फिर जम्मू-कश्मीर से एक्सक्लूसिव लांचर दागे हो.. अच्छा है, मजा आ रहा है। ऐसे कुछ फोन रिसीव करने के बाद सोचा कल जुमा है। दिमाग में जम्मू-कश्मीर वूमेन कमीशन की सेक्रेटरी हाफीजा मुजफ्फर से मुलाकात करने की खुदा से दुआ करने लगा ताकि फिरदौस का मामला उसके सामने रख सकूं।

क्रमश:  

4 टिप्‍पणियां:

satyendra ने कहा…

बहुत सही. लेकिन ये बात सार्वजनिक करने की क्या जरूरत थी कि पहले दिन ही ५ खबर ले आये? अब अगली बार जायेंगे तो संपादक जी उम्मीद करेंगे कि एक ही दिन में ६ खबर दे दीजिए, फिर ५ दिन डेस्क का काम कर लीजिए... सातवें दिन फिर रिपोर्टिग पर निकल जाइए और ८ खबर लेकर लौट आइये...

vikant ने कहा…

thand bhagane ke liye antakshari se badiya kuch nahi aur apka anubhav aur use shabdon me dhaal kar likhna ..vakai kabile tareef hai ...dinesh bhai...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत बढ़िया।

बेनामी ने कहा…

ek barfani,swargnuma per rahasya se bhare pradesh se bade atmeeya se chitthe darj karne ke liye dineshji aapka bahut, bahut aabhar ! devayani. http://electionindiawatch.blogspot.com

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