रोमिंग जर्नलिस्ट

मंगलवार, 31 मई 2011

चलते-चलते अंताक्षरी, जवान बोले थम

रोमिंग जर्नलिस्ट की रिपोर्ट 12
रात के एक बजे गए थे। अमर उजाला सिटी एडीशन का पेज फाइनल होने के बाद विक्रम चौक से गांधीनगर का सफर रोजाना की तरह मैने,अनिमेष और योगेंद्र सेन प्रारंभ किया। पर्याप्त गर्म कपड़ों के बावजूद हाड़ कंपाऊ ठंड का अनुभव हो रहा था। पुलिस लाइन के गेट के पास रोजाना की तरह टेम्प्रेचर वाच पर नजर डाली तो तापमान माइनस सात डिग्री सेल्सियस दिखा। ठंड की ठिठुरन भगाने के लिए दिमाग में आइडिया आया कि हम लोग अंताक्षरी खेलने के साथ सफर जारी रखे। बाथरुम से लेकर बाइक तक पर गुनगुनाने में माहिर अनिमेष ने गाना स्टार्ट किया। उसके बाद योगेंद्र की बारी आयी। योगेंद्र कोई गाना गुनगुना रहा था, उसको हम लोग कंपकंपाते हुए बहुत खूब का तकिया कलाम सुना रहे थे। इसी बीच सैन्य क्षेत्र में प्रवेश कर गए। सुनसान सडक़ पर अचानक हम लोगों के पीछे से कहीं से तेज फ्लड लाइट पडऩे के साथ थम की बहुत तेज आवाज गूंजी। जम्मू-कश्मीर में रात में सफर के वक्त सेना के कायदे-कानून का किस तरह पालन करना हैं? इसके बारे संपादक प्रमोद भारद्वाज ने कुछ दिन पहले ही बताया था, वही सीख काम आयी। हम सब अंताक्षरी भूलकर वहीं सावधान की मुद्रा में खड़े हो गए। पीछे से पड़ी फ्लड लाइड से सडक़ पर हम लोग अपनी छाया को घूर रहे थे, इसी बीच सामने से भी एक फ्लड लाइट चेहरे पर पड़ी। यह फ्लड लाइट सेना के वाच टावर के जवानों ने सुरक्षा के नजरिए से मारी थी। हम लोगों का चेहरा देखने के बाद फ्लड लाइट बुझ गयी। हम फिर गांधीनगर की ओर चल पड़े। दस कदम के बाद सेना के जवानों की एक टुकड़ी ने हम सबको रोकने के बाद परिचय पूछा, कहां से आ रहे हैं, कहां जा रहे हैं? आईकार्ड दिखाइए?  सबका उत्तर देने के बाद पूछा कहां के रहने वाले हो? मैं दिनेश चंद्र मिश्र काशी से कश्मीर आया हूं, अनिमेष ने राजस्थान और योगेंद्र ने मध्यप्रदेश से आने की बात बतायी। तलाशी के साथ पूछताछ करने वाले जवानों में दो जवान गाजीपुर के ही थे। वह अपने आफिसर की ओर मुखातिब होकर मुझे देखकर बोले साहब गंगा किनारे का यह भी छोरा है। आधे घंटे तक तलाशी के बाद हम सब आगे के लिए रवाना हुए। रास्ते में माता रानी की महिमा का बखान करते हुए उनको दिल से धन्यवाद दिया। और विनती की वह अपनी कृपा बनाएं रखें। जब हम लोग गांधीनगर स्थित अपने किराए के आशियाने पर पहुंचे तो रात के दो बज गए थे। रात में काफी देर तक यहां के हालात और काम करने की परिस्थितियों को लेकर दिमाग में ढेरों सवाल आते रहे, इन सवालों के साथ आंखें कब बोझिल हो गयी पता हीं नहीं चला। सुबह नौ बजे नींद खुली। फ्रेश होने के साथ मीटिंग के लिए निकल पड़ा। अनिमेष और योगेंद्र को जगाना मुनासिब नहीं समझा।
विक्रम चौक पहुंचने के बाद आफिस के सामने ही पहली चाय पीने के बाद मीटिंग का इंतजार करने लगा। दिमाग में लखनऊ के आरसी शर्मा घूम रहे थे। मीटिंग में मैने जम्मू के जानीपुरा इलाके में मौजूद स्टेट फारेस्ट रिसर्च सेंटर पर एक खबर का आइडिया दिया। संपादक ने पूछा खबर क्या दोगे? इस सवाल को सुनकर दिमाग में पिछले दिनों पढ़ा एक समाचार याद आ गयी , जिसमें जंगली जानवरों के रिहायशी इलाकों में आकर हमला करने का मामला था। मैने कहा जंगली जानवरों के अचानक रिहायशी इलाकों में आने के पीछे क्या कारण है? इसपर रिपोर्ट करूंगा। संपादक जी ने इस स्टोरी पर दो-तीन प्वाइंटस अपने तरफ से भी दिए। मीटिंग के बाद फिर सिटी बस पर बैठकर जानीपुर चल दिया। जानीपुर में बस स्टाप से स्टेट फारेस्ट रिसर्च सेंटर तक जाने में काफी दूर तक पैदल चलना पड़ा। खबर की भूख और अपनों से मिलने की चाह में थकावट का अहसास ही नहीं हुआ। सेंटर पहुंचने के बाद चंद मिनटों में ही आरसी शर्मा के कमरे में दाखिल हो गया। कुर्सी छोडक़र जिस तरह शर्मा जी मिले, उसे देखकर दिल,दिमाग व देह में जो गर्मजोशी का अहसास हुआ, उसको शब्दों में व्यक्त करना नामुमकिन है। जम्मू-कश्मीर आने की कहानी के साथ चंद खबरों को लेकर चर्चा शुरू हो गयी। खबरों के बाद जम्मू-कश्मीर में काम की चुनौतियों पर बात चली तो रात का किस्सा सुनाया तो बदले में उन्होंने वह इस तरह के दर्जनों किस्से सुनाए। इन्हें सुनकर रोमांच के साथ अनुभव की सीख भी मिल रही थी। दो कप चाय के बाद पुन: खबरों की बात छेड़ दी। जंगली भालू के रिहायशी इलाकों में बड़ी संख्या में आने के पीछे के कारणों को जानने के लिए सवाल किया तो पता चला जम्मू-कश्मीर में सन्ï 1996 में सेना की बड़ी संख्या में तैनाती के बाद जहां चरमपंथियों की गतिविधियों पर अंकुश लगा, वहीं जंगली जानवरों को अवैध शिकार भी बंद हो गया है। सेना की तैनाती से पहले जहां जम्मू-कश्मीर में जंगली जानवरों का अवैध शिकार और उनको सीमा पार भेजने वाले तस्करों की तादाद ज्यादा थी, वहीं सेना के आने के बाद जंगल में शिकार करना मौत को दावत देना जैसा हो गया है। सेना के हाथों जंगली जानवरों के शिकार का दुस्साहस करने वाले कई शिकारी ढेर हो गए। सेना की सक्रियता के कारण जहां अवैध शिकार बंद हो गए, वहीं जानवरों के लिए यह माहौल जन्नत से कम नहीं है। जंगली जानवरों में सेना की तैनाती से पहले और उसके बाद की आबादी में हुई बढ़ोत्तरी के आंकड़े इस बात की गवाही दे रहे थे। एक खबर अब तक जेब में आ गयी थी। सोचा रोजाना थोड़े यहां आऊंगा, कुछ दिन का स्टाक यहां से ले चले। सेंटर में हो रहे शोध पर चर्चा हुई तो मिशन बंबू से जुड़ी एक बड़ी खबर मिली। चार-पांच खबरों का स्टाक डायरी में आ जाने के बाद शर्मा से मोहलत मांगने की भूमिका में आने लगा तो वह बोले आइए मिश्रा जी आपको अपना काम दिखाते हैं। लंबे-चौड़े फार्म हाउस को देखने के बाद अचानक वह एक वृक्ष के नीचे रुके। बोले यह साधारण पेड़ नहीं हैं, इसे आर्ट आफ लिविंग के गुरु रविशंकर ने दिया था। विदेश से लाए इस वृक्ष को यहां लाने के बाद इसका पौध तैयार किया, इसका वितरण अब हो रहा है। गुरु रविशंकर की ओर से दिए गए वृक्ष को देखकर सोचने लगा कि काश हम लोग भी अगर एक दूसरे को उपहार में पौध देने लगे तो वह दिन दूर नहीं जब ओजोन परत को लेकर दुनिया में उठ रही पर्यावरण-प्रदूषण की चिंता ही खत्म हो जाएगी। दो घंटे तक जानीपुर में भ्रमण करने के बाद वहां से चल दिया। सोचा पहली खबर जंगली जानवरों पर ही देते हैं। सेना के जवानों की तैनाती के बाद- जम्मू-कश्मीर बन गया है जंगली जानवरों का जन्नत। दिमाग में खबर का यहीं एंगिल सेट हो गया था। आफिस पहुंचकर जंगली जानवरों के जम्मू-कश्मीर के जन्नत बनने की कहानी के साथ आंकड़ों को परोसते हुए खबर संपादक जी के आने से पहले ही तैयार करके प्रिंट भी निकाल लिया। शाम को संपादक जी आए तो उनके सामने जब खबर की कापी रखी तो वह बहुत खुश हुए। कितनी बार गुड बोले याद नहीं। इस खबर को सभी संस्करणों को भेजने के लिए कहने के साथ बोले ऐसी खबरें ही पढ़ी जाती हैं, शर्मा जी से संपर्क बनाए रखना, वहां से अभी और भी खबरें निकलेंगी। संपादक जी को यह नहीं बताया कि आधा दर्जन खबरें लेकर आया हूं। उनकी बात सुनकर हां में सिर हिलाते हुए कहा कि सोच रहा हूं सर हर सप्ताह एक दिन जानीपुर जाऊंगा। उनका जवाब था..‘गुड’  अपने दिमाग में प्लान बना एकाध दिन खबरों के नाम पर जानीपुर जाने के बहाने कहीं और मस्ती करने जाया जाएगा। दिमाग में चल रही इस खिचड़ी से अंजान संपादक जी से विदा लेकर रुटीन काम में जुट गया। एक घंटे के अंदर अमर उजाला के दूसरे संस्करणों से फोन आने लगे, भाई आज फिर जम्मू-कश्मीर से एक्सक्लूसिव लांचर दागे हो.. अच्छा है, मजा आ रहा है। ऐसे कुछ फोन रिसीव करने के बाद सोचा कल जुमा है। दिमाग में जम्मू-कश्मीर वूमेन कमीशन की सेक्रेटरी हाफीजा मुजफ्फर से मुलाकात करने की खुदा से दुआ करने लगा ताकि फिरदौस का मामला उसके सामने रख सकूं।

क्रमश:  

सोमवार, 30 मई 2011

लादेन की कंपनियों में बंधक बने हिंदुस्तानी

लादेन की कंपनियों में बंधक बने हिंदुस्तानी
- पैसठ से ज्यादा भारतीयों को बना लिया गया है बंधक
- तमाम की हालत बहुत खराब,हो रही खून की उल्टी
दिनेश चंद्र मिश्र
दुनिया के सबसे बड़े आतंकवादी ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान में अमेरिकी कमांडो द्वारा घुसकर मार देने के बाद आतंक का बोलबाला नहीं थमा है। एक तरफ पाकिस्तान में लगातार आतंकी हमले हो रहे हैं, दूसरी तरफ ओसामा बिन लादेन की सऊदी अरब में मौजूद कंपनियों में कार्यरत भारतीय बंधक बन गए हैं। खुदा को प्यारे हो गए आतंकी लादेन की कंपनियों में भारतीयों के साथ कुछ यूरोप के भी लोग बंधक बने हैं। ओसामा बिन लादेन समूह की कंपनियों में भारतीयों के साथ यूएसए के लोगों पर जुल्म ढाने के साथ पासपोर्ट भी जब्त कर लिया गया है। भारत सरकार ने अभी तक यह मामला गंभीरता से नहीं लिया है लेकिन अमेरिकन खुफिया एजेंसी सीआईए इस मामले की पड़ताल में जुट गयी है। सऊदीअरब में लादेन समूह की कंपनियों में ही कार्यरत एक भारतीय कामगार ने फेसबुक पर इस खबरनवीस के मौजूद ‘रोमिंग जर्नलिस्ट’ पर ई-मेल भेजकर यह सनसनीखेज खुलासा किया है।  आप खुद पढि़ए ई-मेल का मजमून और पूरा माजरा।
‘प्लीज हेल्प मी। मेरी जान बचाओ। मैं सऊदी अरब में हूं। यहां मैं सात अक्टूबर 2010 से बीमार हूं। रोज मेरे मुंह से खून आता है। यहां के डाक्टर ने कहा है कि आप जल्दी से जल्दी इंडिया चले जाएं, मगर जिस कंपनी में मैं काम करता हूं वह मुझे घर नहीं भेज रही है। मेरा पासपोर्ट कंपनी के अधिकारियों के पास बंधक है। उसे बाद वापस नहीं कर रहे। मेरा पासपोर्ट नंबर जी-7503973 और मेरा वीजा नंबर 4101267622 है। मेरा नाम मोहम्मद रिजवान है। मेरे जैसे यहां बहुत से भारतीय हैं जिनके पासपोर्ट कंपनी के अधिकारियों ने जब्त कर रखे हैं और हम बंधक बने हुए हैं। प्लीज हेल्प मी... प्लीज हेल्प मी... प्लीज हेल्प मी...’
सात समंदर पार से इस खबरनवीस के फेसबुक पर मोहम्मद रिजवान ने ई-मेल भेजकर जब अपनी पीड़ा बतायी तो दिल दहल उठा। भारतीयों के साथ हो रही ज्यादती देख कर किसी भी हिंदुस्तानी का दिल घबड़ा उठेगा। सऊदी अरब में बंधक बने मोहम्मद रिजवान के ई-मेल से मिली खबर के बाद उनसे संपर्क साधने पर पता चला कि वह अकेले नहीं बल्कि उनके जैसे 65 भारतीय नागरिक सऊदी अरब में ओसामा बिन लादेन समूह से जुड़ी कंपनी एडवांस विजन में बंधक बने हुए हैं। मोहम्मद रिजवान ने बताया कि कंपनी के अधिकारियों से जब अपनी बीमारी के कारण भारत जाने के लिए वे पासपोर्ट मांगते हैं तो उन्हें चोरी के केस में फंसा देने की धमकी दी जाती है। भारत से सऊदी अरब आने के बाद पिछले छह महीने से परेशान हाल रिजवान को पासपोर्ट देने में कंपनी के अधिकारी आनाकानी करने के साथ धमकी दे रहे हैं कि फर्जी मुकदमे में जेल में भिजवा देंगे तो हमेशा के लिए हिंदुस्तान जाना भूल जाओगे।
सऊदी अरब में बिन लादेन समूह से जुड़ी कंपनी एडवांस विजन में ही कार्यरत मोहम्मद रिजवान के साथ दो दर्जन भारतीयों का पासपोर्ट कंपनी के अधिकारियों ने जब्त कर रखा है। मोहम्मद रिजवान ने बताया कि जिन लोगों का पासपोर्ट बिल लादेन की कंपनी के अधिकारियों ने जब्त कर रखा है, वह सब लोग यूपी, बिहार के हैं। मोहम्मद रिजवान के परिवार ने केंद्र सरकार से सऊदी अरब सरकार से बात करके पासपोर्ट दिलाने के लिए कई बार खत भेजा लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई है। उधर मुंह से लगातार खून की उल्टी होने से परेशान मोहम्मद रिजवान के सामने दवा के साथ रोटी की भी समस्या खड़ी हो गयी है। पासपोर्ट के लिए परिजनों की फरियाद केंद्र सरकार द्वारा नहीं सुने जाने के बाद रिजवान ने इस खबरनवीस को अपना दर्द बयां किया है।  
सऊदी अरब में भारतीयों के साथ हो रहे जुल्म-ज्यादती के इस मामले की पड़ताल करने पर पता चला कि बिन लादेन समूह से जुड़ी अन्य कंपनियों ने भी भारतीयों का पासपोर्ट जब्त कर लिया है और कर्मचारियों को बंधक बना रखा है। बिहार के पूर्वी चंपारण के रहने वाले तौफीक ने +966580160763 से फोन करके बताया कि वह मोहम्मद रिजवान की तरह ही जिस कंपनी में काम करता है वहां भी तीस से ज्यादा भारतीयों के पासपोर्ट जब्त हैं। कोई बीमार है तो किसी के घर बेटी का ब्याह तो कोई मातमपुर्सी में भी घर नहीं जा पा रहा है। बिनलादेन समूह से जुड़ी एसबीजी-एबीसी कंपनी में जिस तरह भारतीयों के साथ सलूक किया जा रहा है वह बताते हुए दिल कांपने लगता है। तौफीक ने कहा कि आप भारत सरकार से अपील करें कि वह हम लोगों का पासपोर्ट दिलवा दे ताकि हम वतन लौट सके।
सऊदी अरब में युवाओं को नौकरी का झांसा देकर गुलाम बनाए जाने का इसके पहले कई मामला प्रकाश में आ चुका है। मुंबई के दो युवकों को हाल में ही सरकार के हस्तक्षेप के बाद वहां से आजाद कराया गया है। इसके साथ यह हकीकत भी सामने आई है कि कश्मीर, उत्तर प्रदेश और पंजाब के हजारों युवक मीलों फैले रेगिस्तान में गुलामी का नर्क भोग रहे हैं। इन युवकों को यहां के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले रईसों ने अपने ऊंटों और बकरियों को चराने का काम दे रखा है। इनसे 40 से 50 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान वाली कड़ी धूप में दिन भर काम कराया जाता है, लेकिन खाने के लिए एक वक्त की रोटी तक नहीं दी जाती। साथ ही पानी भी इतना नहीं दिया जाता कि ढंग से गला तर कर सकें। इन युवकों के साथ जानवरों जैसा बर्ताव किया जाता है और बीस घंटे तक काम लिया जाता है। जानलेवा मेहनत के बाद इन्हें एक पैसा तक नहीं दिया जाता। पिछले सप्ताह भारत लौटे अनीस का कहना है, वहां काम के लिए गए भारतीयों के साथ जानवरों सा बर्ताव होता है। प्लेसमेंट एजेंट युवकों को कतर, सऊदी, कुवैत और दुबई में अच्छी नौकरी का झांसा देते हैं और रेगिस्तान में रहने वाले रईसों के हवाले कर देते हैं। उनके अनुसार, देश के कई इलाकों के युवक सऊदी में गुलामी की जिंदगी जी रहे हैं।

गुरुवार, 26 मई 2011

घायल मन की व्यथा-कथा

रोमिंग जर्नलिस्ट की रिपोर्ट 11
जाहिरा बोली मैं लगातार फाटक पीटने के साथ अल्ला के नाम पर रहम करने की भीख मांग रही थी लेकिन साहब उन जुल्मियों ने एक भी ना सुनी बल्कि जाते-जाते धमकी दे गए कि अगर किसी को इसकी इत्तला दी तो तुम्हारी और तुम्हारे परिवार की खैर नहीं। साहब मेरी फूल जैसी बेटी की हालत बिगड़ गयी लेकिन परिवार की सलामती के लिए किसी को इत्तला नहीं दी। रेशमा बेटी(गर्वमेंट मेडिकल कालेज जम्मू में नर्स) ने हिम्मत बंधाते हुए शिकायत करने को कहा ताकि किसी और फिरदौस की इज्जत तार-तार न हो। जाहिरा की दर्द भरी बातों को सुनने के बाद एक नजर फिरदौस की तरफ डाली। सुर्ख लाल चेहरे पर अरमानों की कब्र खुदी साफ दिख रही थी तो उसके सिले होंठ मानों जुर्म की वहीं दास्ता बयां कर रहे थे। जिस मां की बेटी की इज्जत तार-तार हो गयी हो वह किसी और की बेटी के साथ ऐसा जुल्म न हो इसके लिए जिस साहस का परिचय दिया उसे देखकर उस मां को दिल से प्रणाम करने से खुद को रोक नहीं सका। फिरदौस को देखकर दिमाग में डिंपल कपाडिय़ा की अरसे पहले आयी फिल्म ‘जख्मी औरत’ की रील दिमाग के परदे पर चलने लगी। इस फिल्म में जिस तरह डिंपल कपाडिय़ा ने बलात्कारियों को सजा दी थी, काश उसी तर्ज पर फिरदौस भी सजा दे सकती। दिमाग में आए इस विचार को दफन करके फिरदौस की ओर मुखातिब होकर हिम्मत से काम लो, खुदा तुम्हारी मदद करेगा। इससे ज्यादा कुछ नहीं बोल पाया। जाहिरा को वूमेन कमीशन के दफ्तर जाने के साथ जुमे को यह मामला पहुंच जाने का आश्वासन देने के साथ भरोसा जताया कि इंशाअल्लाह वहां से कुछ न कुछ मदद जरूर मिलेगी। पंद्रह मिनट फिरदौस और उसकी मां के साथ गुजारने के बाद मन बहुत भारी हो गया था। सोचने लगा कि जिस जमीं को जन्नत कहा जाता है, वहां जुल्म की ऐसी कितनी दास्तानें जमींदोज होंगी। मेडिकल कालेज से चलते वक्त रेशमा ने फिर चाय का अनुरोध किया लेकिन उसको विनम्रता के साथ अस्वीकार करते हुए कहा आफिस पहुंचने में देर हो जाएगी। आधे घंटे के भीतर सिटी बस से विक्रम चौक पहुंचने के बाद आफिस पहुंच गया, तब तक संपादक जी नहीं आए थे। आफिस के नीचे मौजूद चाय की दुकान पर एक कप चाय पीकर मूड हल्का करने में जुट गया। चाय की चुस्की संग फिरदौस के बारे में सोचता रहा। चाय खत्म होने के बाद तवी नदी की ओर कदम स्वत: बढ़ गए। तवी से अपना जम्मू आने के बाद जो रिश्ता बंधा वह अटूट है। जब भी दिल,दिमाग भारी रहता तो तवी के किनारे आने पर जो सुकून मिलता है, उसको शब्दों में नहीं बयां किया जा सकता सिर्फ महसूस किया जा सकता है। पत्थरों से टकराते हुए बहती तवी की धारा को देखकर ऐसा लगता है जम्मू-कश्मीर में चरमपंथियों के चलते आम लोगों की जिंदगी भी ऐसे ही चल रही है। कभी तवी की अठखेलियां तो कभी उसके किनारे खेलते बच्चों को देखते हुए घड़ी पर नजर डाली तो आफिस पहुंचने का समय हो गया था, तुरंत उल्टे पांव चल पड़ा। 
संपादक जी अपने चैंबर में बैठकर ई-मेल चेक कर रहे थे, शीशे के चैंबर के बाहर से ही उनको सिर झुकाकर प्रणाम किया। संपादक के चैंबर के बगल में मौजूद अपने केबिन में आराम की मुद्रा में बैठने के साथ कम्प्यूटर आन कर दिया। अभी ई-मेल ही चेक कर रहा था कि बंटी सरदार आकर बोला संपादक जी ने बुलाया है। यह बंटी सरदार भी अपना यार बन गया था। पंजाब का रहने वाले सोलह साल के बंटी से पहली मुलाकात जम्मू रेलवे स्टेशन पर तब हुई थी जब वह प्लेटफार्म पर अखबार बेच रहा था। काशी से कश्मीर पहुंचने के बाद अमरउजाला जम्मू के दफ्तर का पता प्रिंटलाइन में देखने के लिए जब अखबार खरीदा और फ्रंट पेज की जगह आखिरी पेज पर प्रिंट लाइन देखने लगा तो वह एकबारगी चौकते हुए उसने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा। खैर बंटी सरदार के साथ अपने याराने के कई रोचक किस्से आगे बताएंगे। अभी चलते हैं सपांदक जी के चैंबर में। आओ ....दिनेश आज क्या रहा? दिनभर की भागदौड़ का किस्सा बताने के साथ डोगरी डे को लेकर विशेष आयोजन करने का प्लान बताया। यह प्लान संपादक जी को अच्छा लगा। बोले इसका ब्लू प्रिंट बनाओ। आज क्या खबर है? बोले सर आज तो हाथ में इस आइडिया के अलावा कोई खबर पकी नहीं है। फिरदौस से मिलने का किस्सा भी बताया बोले, यहां ऐसे मामले में कोई भी अखबार या चैनल तब तक हाथ नहीं डालते हैं, जब तक कोई सरकारी महकमा इसको संज्ञान में नहीं लेता है। फिरदौस पर आतंकवादियों ने किस कदर जुल्म ढाया, इसका जिक्र सुनकर उनका भी खून खोल उठा। जम्मू-कश्मीर में परिवार के साथ रहे प्रमोद भारद्वाज के चेहरे पर सिस्टम को लेकर पहली बार गुस्सा दिखा। साथ में अखबार में रहकर भी कुछ न कर पाने की बेचारगी भी झलकी, लेकिन अच्छा लगा। वूमेन कमीशन में यह मामला जाने के बाद इसको लेकर स्टोरी करने की बात कहते हुए कहा कि आज सिटी की जो खबरें हैं उनको ध्यान से पढऩा। कई खबरों को तुम्हे दुबारा लिखना भी पड़ सकता है। संपादक के चैंबर से निकलते ही चीफ सब एडीटर योगेश शर्मा पूछ पड़े.. और गुरु आज क्या मसाला लाए हो? बोला भाई आज मसाला तो दूर नमक-मिर्च भी नहीं है। अपने केबिन में आकर बैठा ही था कि एक फोन आया। मैने  सोचा यहां मुझे कौन याद करेगा? खैर फोन हाथ में लेकर हैलो.. बोला तो उधर से आवाज आयी दिनेश चंद्र मिश्र जी बोल रहे हैं क्या? मैं बोला हां भाई। अपना परिचय देते हुए बोले भाई आपकी कई खबर पढऩे को मिली इसलिए अपने को रोक नहीं सका। मेरा नाम आरसी शर्मा, मैं लखनऊ का रहने वाला हूं। यहां वन विभाग में डीएफओ हूं। शर्मा जी सुनते ही दिल बाग-बाग हो गया, खबर का ऐसा रिस्पांस पहली बार यहां देखने को मिला। काशी से कश्मीर तक आने की कहानी के बाद शर्मा जी के साथ कल चाय पीने का वादा करके फोन रख दिया। फोन रखने के साथ ही दिमाग में वन विभाग में खबरों की पैदावार शर्मा जी के सहारे कितनी की जा सकती है? इसकी संभावनाओं पर दिमाग में सोच के घोड़े दौडऩे लगे। इंतजार था कल का ताकि जम्मू संभाग के वन अधिकारी आरसी शर्मा जी से मुलाकात और खबरों की बात आगे बढ़े।
क्रमश:

सोमवार, 23 मई 2011

चाय की चुस्की संग डोगरी का दर्द

रोमिंग जर्नलिस्ट की रिपोर्ट 10
सत्रह साल की फिरदौस के नूरानी चेहरे पर अलगाववादियों के जुल्म के घाव पर सिर्फ संवेदना का ही मरहम लगा पाने से दिल में बहुत कोफ्त हुई। ऐसा पहली बार नहीं हुआ था कि जो खबर जिस अंदाज में लिखने की चाह हो, वह उसी अंदाज में छप जाए। अनमने मन से सबेरे की मीटिंग में जाने के बाद जम्मू-कश्मीर वूमेन कमीशन के दफ्तर जाने का फैसला किया। जम्मू-कश्मीर वूमेन कमीशन के दफ्तर का जब साथियों से पता पूछ रहा था तो अधिकांश का जवाब था ‘मालूम नहीं’ था। वूमेन कमीशन का पता पूछने की आवाज संपादक जी के कानों में पड़ी उन्होंने जो पता बताया उस पर जाने के लिए निकल पड़ा। रास्ते में ही था तभी गर्वमेंट मेडिकल कालेज की नर्स रेशमा के नंबर से मोबाइल पर घंटी बजने लगी। समझ में नहीं आ रहा था कि क्या जवाब दें। अत: फोन को साइलेंट मोड में डाल दिया। आफिस से निकलकर विक्रम चौक तक ही पहुंचा था कि पाकेट पर मोबाइल फिर रेंगने लगा। मोबाइल पर फिर उसका फोन देखकर रिसीव करते ही आदाब की मधुर आवाज सुनाई पड़ी। आदाब के बाद उसका अगला सवाल था कि फिरदौस की खबर छपी है क्या? दिमाग में रेडीमेड जवाब तैयार हो गया था। जवाब दिया कि संपादक जी ने कहा है कि जब मुकदमा दर्ज नहीं है तो बिना किसी अथारिटी को प्रार्थनापत्र दिए खबर नहीं छापी जा सकती है। फिरदौस की मां जाहिरा ने जो प्रार्थनापत्र दिया है उसको लेकर जम्मू-कश्मीर वूमेन कमीशन के दफ्तर जा रहा हूं। खुदा करे फिरदौस की वहां कुछ मदद हो जाए। यह आश्वासन देने के बाद सिटी बस पकडक़र वूमेन कमीशन के दफ्तर के लिए चल पड़ा। सिटी बस स्टाप से एक किमी दूर वूमेन कमीशन के दफ्तर खोजते-खोजते पहुंच गया। दफ्तर का छोटा सा बोर्ड दूसरी मंजिल पर दिख रहा था, लेकिन गेट पर जंजीर में बंधा ताला बहुत बड़ा था। आफिस के नीचे जितेंद्र उधमपुरी साहित्यकार की नेमप्लेट लगी थी। दरवाजा खटखटाने पर पचास पार के एक सज्जन बाहर आए, पूछा वूमेन कमीशन का दफ्तर कितने बजे खुलता है। इस सवाल को सुनकर ऊपर से नीचे तक देखने के बाद उन्हों पूछा आप कहां से आ रहे हैं.. बताया अमर उजाला से आ रहा हूं,नाम है दिनेश चंद्र मिश्र। यह सुनकर वह बोले आइए अंदर आपको वूमेन कमीशन के बारे में बताता हूं। जम्मू में पहली बार कोई अपने घर में आने का प्रेमाग्रह कर रहा था। पैदल चलते-चलते थक जाने की वजह से आराम करने की नियत से अंदर चला गया। मेरे काशी से जम्मू-कश्मीर आने की वजह सुनने के बाद वह अपने बारे में बताने लगे कि मैं डोगरी का साहित्यकार हूं। डोगरी साहित्य पर काफी काम किया हूं। डोगरी साहित्य में उनकी रचनाओं के साथ उनकी किताबें देखने में जुट गया। अमरउजाला के दरबान से डोगरी सीखने की ललक पहले ही जाहिर कर चुका था, संयोग से आज डोगरी के नामचीन साहित्यकार के घर पहुंचकर ऐसा लगा मानो भगवान ने अंधे को आंखें दे दी हो। ड्राइंग रूम में उधमपुरी जी की समृद्घ साहित्य रचना को देखने के बाद दिल से उनको प्रणाम किया। स्कूली जीवन में साहित्य से रिश्ता सिर्फ परीक्षा तक ही सीमित रहा लेकिन पहली बार जम्मू और कश्मीर में डोगरा लोगों की जीवन्त भाषा डोगरी की प्राचीन परंपरा से रूबरू हुआ। डोगरी के प्रति उनके कार्यों को देखते हुए जब वूमेन कमीशन के सचिव के बारे में सवाल किया तो वह बोले मैं क्षमा चाहता हूं अपनी बात बताने में भूल गया। इस बीच उनकी पत्नी चाय लेकर आ गयी। चाय की चुस्की कई जगह लिया लेकिन जितेंद्र जी के घर में उनकी पत्नी के हाथों की बनी चाय का एक घूंट अंदर जाते ही रोम-रोम में ताजगी महसूस होने लगी। चाय के प्रति मेरी दीवानगी देखकर बोले यह कश्मीरी चाय है। बगैर दूध की चाय में काजू,बादाम और अखरोट के छोटे-छोटे टुकड़े और भी जायका बढ़ा रहे थे। चाय की चुस्की संग वह बताने लगे कि वूमेन कमीशन की सेके्रटरी मोहतरमा हफीजा मुज्जफर हैं। एक सप्ताह वह श्रीनगर में बैठती हैं, एक सप्ताह जम्मू में। आप शुक्रवार को आएंगे तो उनके मुलाकात हो जाएगी। हफीजा मुज्जफ्फर का नंबर देने के साथ बोले वह श्रीनगर के जिस इलाके में उनका मकान है,वहां नेटवर्क का संकट है। हो सकता है नंबर न मिले, आप शुक्रवार को आ जाएंगे तो मुलाकात हो जाएगी। काफी व्यवहार कुशल और पढ़ी-लिखी महिला है। वूमेन कमीशन की सेक्रेटरी से संभावित मुलाकात में तीन दिन का समय था। मैं सोच में पड़ गया कि रेशमा का फिर फोन आया तो क्या जवाब देंगे? चाय की चुस्की संग यह सोच ही रहा था कि जितेंद्र जी फिर डोगरी भाषा को लेकर अपनी चर्चा आगे बढ़ाना शुरू कर दिए। उनका कहना था कि महाराजा रणवीर सिंह (1857-1885) के शासनकाल के दौरान डोगरी जम्मू और कश्मीर राज्य की सरकारी भाषा थी। उर्दू तो बाद में राज्य की सरकारी भाषा और शिक्षा का माध्यम बनी। एक सरकारी समिति की संस्तुति पर 1955 में डोगरी के लिये देवनागरी लिपि को अपनाया गया और वर्ष 1957 में इसे राज्य के संविधान में शामिल कर लिया गया। जम्मू और कश्मीर देश का एकमात्र राज्य है, जिसका अपना पृथक संविधान है। राज्य के संविधान में उर्दू को राजभाषा का स्थान दिया गया है, परन्तु इसमें यह भी कहा गया है कि जब तक विधायिका द्वारा अन्य कोई वैधानिक व्यवस्था नहीं की जाती, सभी सरकारी कार्यों के लिये अंग्रेजी का उपयोग होता रहेगा। कश्मीरी, डोगरी, गोजरी (गूजरी), बाल्टी (पाली), दर्दी, पंजाबी, पहाड़ी और लद्दाखी को क्षेत्रीय भाषाओं के तौर पर राज्य के संविधान की छठी अनुसूची में सम्मिलित किया गया है । जम्मू-कश्मीर में भाषा के प्रति ढेरों जानकारी देने के बाद जितेंद्र उधमपुरी जी की पीड़ा भी बाहर आने लगी थी। बोले आज की तारीख में किसी भी अखबार में डोगरी के लिए कोई कालम नहीं है। आज के युवा डोगरी को बोलने में परहेज करते हैं। बातचीत के दौर में जानकारी मिली कि जम्मू संभाग की मातृभाषा डोगरी को संविधान के आठवें शेडयूल में शामिल होने के बाद भी अभी तक संभाग के केवल 6 जिलों में ही डोगरी पढ़ाई जा रही है।
डोगरी भाषा को 22 दिसंबर 2003 को संविधान के आठवें शेडयूल में शामिल किया गया था और उसी वर्ष से प्राइमरी एवं अपर प्राइमरी सरकारी स्कूलों में इसे पढ़ाया जा रहा है। दिमाग में तुरंत आइडिया आया कि 22 दिसंबर को डोगरी डे के रूप में अखबार में विशेष आयोजन का सुझाव दे सकते हैं। एक घंटे से ज्यादा समय तक चली मुलाकात में खबर के नाम पर डोगरी के बारे में ‘ढेरों जानकारी’ और ‘हफीजा मुज्जफ्फर से जुमा को मिलने की आस’ ही थी। उधमपुरी जी को प्रणाम करके चल दिया। खबर कुछ हाथ में थी ही नहीं, कौन सी खबर लिखेंगे? यह सब सोच रहा था कि फोन पर घंटी बजी तो देखा रेशमा का नाम स्क्रीन पर चमक रहा था। फोन रिसीव किया तो बताया कि वूमेन कमीशन दफ्तर गए थे, सेक्रेटरी से शुक्रवार को मुलाकात होगी। यह सुनकर रेशमा थोड़ी मायूस होने के साथ बोली फिरदौस अब पहले से थोड़ा बेहतर है, अगर मिलना चाहे तो आ सकते हैं। घड़ी में देखा दो बज रहे थे, आफिस पहुंचने से पहले जाने की संभावना देखकर हां बोल दिया। फोन कट होने के बाद देखा दस मिनट से ज्यादा बातचीत हुई। जम्मू-कश्मीर जाने के एक पखवारे बाद भी अखबार की ओर से कारपोरेट सिम न मिल पाने से रोमिंग चार्ज का जेब पर बोझ बढऩे की भी चिंता होने लगी, खैर इस चिंता को वहीं छोडक़र चल दिया मेडिकल कालेज फिरदौस से मिलने।
क्रमश:

बुधवार, 18 मई 2011

फिरदौस के नूरानी चेहरे पर जुल्म का फोड़ा


रोमिंग जर्नलिस्ट की रिपोर्ट 9
रात भर दिमाग में रेशमा की कद,कïाठी नाचने के साथ एक सवाल उमड़-घुमड़ रहा था कि आखिर उसके बुलाने के पीछे मकसद क्या है? इन्हीं सब सोच-विचार में जाने किस समय नींद आ गयी। सबेरे नींद खुली तो घड़ी में नौ बज रहे थे। जम्मू का जाड़ा आलस की बेडिय़ां बन गया था। रेशमा की याद आते ही शरीर में पता नहीं कहां से ऊर्जा आ गयी कि चट से बिस्तर छोड़ दिया। ब्रश में पेस्ट लगाकर बाथरुम की तरफ बढ़ा तो अनिमेष पहले से कब्जा करके कोई पुराना हिंदी फिल्मी गाना गुनगुना रहा था। दरवाजे के बाहर से मैने आवाज लगायी बास बाहर जल्दी आओ,मुझे मीटिंग में जाना है। देर हो जाएगी तो संपादक जी..क्लास लेंगे। दस मिनट के अंदर फ्रेश होने के बाद स्नान के नाम पर हाथ-मुंह धोकर तैयार हो गया। घर से बाहर निकलकर चाय पीने के लिए बाहर एक होटल पर पहुंचा तो अखबार के साथी विनोद सिंह जागिंग सूट में मिल गए, पूछा आफिस नहीं जाना है क्या? आज मूड नहीं है अभी संपादक जी को फोन करके छुट्ïटी ले लूंगा। इधर-उधर की बातचीत के साथ चाय पीने के बाद सिटी बस पकडक़र विक्रम चौक के लिए चल दिया। अमर उजाला का समूह संपादक बनने के बाद शशि शेखर ने सभी संस्करणों में रिपोर्टरों के लिए रोजाना दो खबरों की लिस्ट मीटिंग में लाने का फरमान जारी किया था। बनारस में ही उसकी आदत पडऩे के साथ साथियों को भी इसके लिए उत्प्रेरित करने का काम किया था। यहां भी मीटिंग में वहीं फार्मूला चल रहा था। आज पहली बार संपादक ने खबरों की लिस्ट मांगी, सर लिस्ट नहीं है। दिनेश जी कल से आप भी लिस्ट देंगे। खैर मैने संपादक जी को बताया कि आज गर्वमेंट मेडिकल कालेज जाने का प्लान बनाया है। जयहिंद सुनकर बस में झटका खाने वाली रेशमा की कहानी जानबूझकर नहीं बतायी। मीटिंग के बाद बस पकडक़र रेहड़ी के लिए निकल पड़ा। रेहड़ी से पैदल ही शार्टकट से पूछते हुए जीएमसी पहुंच गया। कहने को तो यह मेडिकल कालेज था, लेकिन दुव्यर्वस्था का आलम यह था कि यूपी के किसी छोटे जनपद का जिला अस्पताल भी इससे बेहतर होता है। सुरक्षा कारणों से मेडिकल कालेज के अंदर जाने से पहले मरीजों को परचा या पास दिखाना पड़ता था। गेट पर पहुंचा तो जेके पुलिस के जवानों ने रोक लिया। परिचय देने के साथ कार्ड दिखाने पर अंदर जाने को मिला। मेडिकल कालेज के अंदर जाकर रेशमा के मोबाइल पर एसएमएस किया मैं तुम्हारा इंतजार इमरजेंसी के सामने कर रहा हूं। एसएमएस का दो मिनट में जवाब आया, पांच मिनट के भीतर आ रही हूं। बस में सलवार-सूट में मिली रेशमा नर्सों की पोशाक में जब सामने आयी तो एकटक उसको देखता ही रह गया। आप मेरे साथ आइए जनाब। यह सुनकर मैं रेशमा के पीछे चल दिया। दूसरी मंजिल पर नर्स रूम में ले जाकर बैठने को कहकर कुछ देर में आने की बात कहकर वह चली गयी। रेशमा आखिर किसलिए बुलाई है, यहां लाकर बैठाने के पीछे माजरा क्या है? इसको लेकर दिमाग में सवाल दर सवाल पैदा हो रहे थे। उस रूम में आने वाली नर्सो को देखने के साथ उनकी डोगरी और कश्मीरी में हो रही बातचीत को सुनने के साथ समझने के लिए दोनों कान आजाद छोड़ दिए थे। दस मिनट बाद रेशमा लौटी तो उसके साथ पचास साल की कश्मीरी महिला भी थी। रेशमा ने बताया है यह है जाहिरा इनकी बेटी के साथ सिरफिरों ने गलत काम किया है। सोपोर की रहने वाली जाहिरा की बेटी फिरदौस के साथ गलत काम करने के साथ किसी से कहने पर जान से मारने की धमकी दी गई है। इस घटना के बाद बेटी की हालत खराब है। इस मसले को यहां का मीडिया तवज्जों नहीं दे रहा है। मुझे पता नहीं क्यों लगा कि आप कुछ मदद कर सकते हैं, इसलिए मैंने आपको अपना नंबर दिया और बुलाया है। मैने जाहिरा की बेटी से मिलने की रेशमा से इच्छा जाहिर की तो बोली वह जनाना वार्ड में है, वहां मर्दो का जाना प्रतिबंधित है, वहां आपको नहीं ले जा सकती हूं। जाहिरा की मां को इसलिए आपसे मिलाने के लिए बुलाकर लायी हूं। जाहिरा से पूछा बेटी के साथ जो कुछ हुआ है, उसका मुकदमा दर्ज कराया है? आतंकियों के डर से मुकदमा दर्ज न कराने वाली जाहिरा की मदद फिर कैसे की जा सकती है? यह सवाल मैने रेशमा से पूछा तो वह बोली आपको इसकी मेडिकल रिपोर्ट की फोटो कापी दे देती हूं, आप खबर निकाल दीजिए ताकि रियासत के अफसरों की बंद आंख खुले। नईदिल्ली में पढ़ी-लिखी रेशमा ने कहा कि इसकी मदद के लिए आप एक काम और कर देते तो खुदा आपकी मदद करेगा? मैने पूछा क्या वह बोली जम्मू-कश्मीर वूमेन कमीशन में इस मसले को अगर आप पहुंचा देते तो इसकी कुछ मदद हो जाती है। जाहिरा की बेटी फिरदौस की मेडिकल रिपोर्ट के साथ रेशमा से मैने कहा कि जम्मू-कश्मीर वूमेन कमीशन की सेक्रेटरी के नाम एक दरखास्त बनाकर मुझे दे दो। रेशमा ने उर्दू में वूमेन कमीशन की सेक्रेटरी के नाम प्रार्थनापत्र बनाने के साथ जाहिरा से उस पर अंगूठा लगवाकर मुझे थमा दिया। फिरदौस का मामला वूमेन कमीशन ले जाने के साथ अखबार में भी इसकी रिपोर्ट करने का आश्वासन दिया जो जाहिरा ने ढेरों दुआएं कश्मीरी में दी। जाहिरा को बेटी के पास जाने के लिए रेशमा ने कहा और मुझसे चाय पीने के लिए कहकर कैंटीन की तरफ चल दी। कैंटीन में चाय की चुस्कियों संग वह काशी से कश्मीर कैसे आएं,शादी हो गयी है कि नहीं,आपको कश्मीर कैसा लग रहा है? सहित ढेरों सवाल पूछती रही। मैं खूबसूरती की उस बेमिसाल जीवंत मूर्ति को देखते हुए सबका जवाब देता रहा। फिरदौस की रिपोर्ट अखबार में छपने के बाद फिर फोन करने को कहते हुए जब विदा लेने के मूड में दिखी तो मैने पूछा कल बस में जय हिंद सुनकर तुमको झटका क्यों लगा? इस सवाल को सुनकर वह कैंटीन की टूटी बैंच पर फिर बैठ गयी। अगल-बगल देखा तो नजदीक में कोई नहीं था, बोली हम श्रीनगर के जिस इलाके से आए हैं, वहां हिंदुस्तान की तरफदारी करना किसी गुनाह से कम नहीं है। अलगाववादी संगठन इतने हावी हैं कि जयहिंद सार्वजनिक स्थान पर कोई सिविलिएन अगर बोल दे तो उसकी खैर नहीं। इसी माहौल में मेरी परिवरिश हुई, इसीलिए इससे वाकिफ हूं। इस कारण एक बारगी बस में जय हिंद सुनकर चौंक गयी थी.. आपको बुरा लगा क्या? बोला ऐसी कोई बात नहीं है। रेशमा अपने जवाब से मुझे संतुष्टï देखकर बोली कि फिरदौस के चेहरे का नूर फना हो गया है, आप प्लीज खुदा के वास्ते कुछ कीजिएगा। इंशाअल्लाह कुछ न कुछ इस मसले पर जरूर करेंगे, तुम इस हिंदुस्तानी पर विश्वास कर सकती हो। मैं अब चलता हूं फिर मिलेंगे। रेशमा को खुदाहाफिज संग जय हिंद बोलकर दस कदम ही चला था कि उसकी आवाज सुनाई पड़ी..एक मिनट और सुनिएगा। उल्टे पैर उसके पास फिर पहुंचा तो बोली .. ‘जय हिंद’। रेशमा का जय हिंद बोलना दिल को छू गया, दिमाग में फिरदौस का फना हो गया नूर वापस लाने के लिए क्या किया जाए? यह सवाल छा गया था कि फिरदौस के नूरानी चेहरे पर उभर आए जुल्म के फोड़े को कैसे फोड़ा जाए? दिमाग में यह सवाल लेकर अखबार के दफ्तर पहुंच गया। दफ्तर से श्रीनगर ब्यूरो में तैनात कानपुर के शैलेेंद्र शुक्ला को फोन लगावाया। इस घटना की जानकारी देते हुए कहा कि इस मामले की स्टोरी छपी है क्या? वह बोले अगर बिना एफआईआर के रिपोर्ट छप गयी तो दूसरे दिन सरकारी खंडन के साथ अलगाववादियों की धमकी से भी  जूझना पड़ेगा। जीवट व्यक्तित्व के मालिक शैलेंद्र शुक्ला ने कहा कि ऐसे मामले यहां बहुत होते हैं, खबर नहीं छपती है। उनके इस जवाब से दिल में बैचेनी होने लगी कि आखिर फिरदौस के घावों पर मरहम कैसे लगाया जाए? संपादक जी ने जम्मू-कश्मीर के हालात ठीक न होने के कारण बिना एफआईआर के आज या भविष्य में कोई खबर न करने की सीख दी। जेब में पड़े जाहिरा के उर्दू में लिखे प्रार्थनापत्र को देखते हुए फैसला लिया अब कल जम्मू-कश्मीर वूमेन कमीशन जाऊंगा।
क्रमश:

मंगलवार, 17 मई 2011

रघुनाथ मंदिर पर अजबसिंह का गजब प्रेम

रोमिंग जर्नलिस्ट की रिपोर्ट 3
अमरउजाला जम्मू दफ्तर की सीढिय़ा जिस रफ्तार से चढ़ा था उसी रफ्तार से उतरने के बाद विक्रमचौक से रघुनाथ बाजार की तरफ जाने का प्लान दिमाग में बना। मस्ती में पैदल चौराहा पार करते ही तवी नदी पर आ गया। पुल पर खड़े होकर तवी की धारा को देखते हुए सोच के समंदर में बहने लगा। सर्द मौसम में हसीन वादियों के बीच पत्थरों से टकराकर बहती हुई तवी को एकटक देखते हुए दिल में खबरों का लेकर ताना-बाना बुनने लगा था। तवी की अविरल धारा के साथ आते-जाते लोगों का श्रद्घा के साथ शीश झुकाना देखकर गंगा मइया की याद आने लगी। घाटी में काशी जैसे घाट की कल्पना बेमतलब है, लेकिन सोच को किसी डोर में बांधा तो नहीं जा सकता, लिहाजा तवी के किनारे घाट की खोजबीन चलती रही। तवी पर घाट के नाम पर वाहनों की धुलाई करते ट्रक और बस के क्लीनर के अलावा पत्थर निकालते मजदूरों की भीड़ ही दिखी। तवी और खुद के बीच चल रहे मूक संवाद को तब विराम लगा जब सेना के वाहनों का काफिला हूटर बजाते हुए गुजरा। घड़ी पर नजर डाली तो बारह बज गए थे। मंदिरों की नगरी जम्मू में सबसे पहले रघुनाथ मंदिर में मत्था टेकने के लिए चल पड़ा। अक्टूबर का आखिरी सप्ताह था, रघुनाथ बाजार में खरीदारी करती महिलाओं की भीड़ दिखी। बाजार में जगह-जगह बालू के ढेर से बने बंकर में एक-47 व 56 के साथ तैनात सीआरपीएफ के जवानों की मौजूदगी यह अहसास दिला रही थी कि यह आतंकवाद का जिंदगी पर कितना असर है। रघुनाथ मंदिर पहुंचा तो वहां और भी कड़ी सुरक्षा व्यवस्था देखकर सालों पहले रघुनाथ मंदिर को उड़ाने के लिए हुए आतंकी हमले की सुर्खियां दिमाग में ताजा हो गयी। रघुनाथ मंदिर पर मोबाइल और चमड़े की बेल्ट निकालकर तलाशी की कतार में लगा तो अचानक आंखों में उम्मीद की चमक दिखी। चमक अपनेपन की थी। जिस जवान ने तलाशी थी, उसकी कडक़ वर्दी पर नेमप्लेट पर लिखे अक्षर ही यह अहसास दिला रहे थे। नाम लिखा था- अजब सिंह यादव। इसे पढऩे के बाद दिल-दिमाग आपस में गुफ्तगू करने लगे कि यादव जी या तो गाजीपुर के होंगे या इटावा के होंगे। यह सोचते-सोचते मंदिर के अंदर पहुंचकर राजा राम चंद्र जी का मूर्ति का दर्शन किया। यहां आकर काशी-विश्वनाथ मंदिर की यादें ताजा हो गयी। मंदिर में आने वाले श्रद्घालुओं को जिस तरह पंडे अपने जाल में फंसाने के लिए श्लोक का वाचन करते हुए ढेरों ज्ञान बघारते हैं, उसी तरह जम्मू के रघुनाथ मंदिर में भी मंजर दिखा। रोली-चंदन युक्त थाली में पुष्प-अक्षत के साथ सौ-सौ के नोट सजाकर सुखी जीवन और मनोकामना पूर्ति के लिए संकल्प कराने का हरेक श्रद्घालु पर दबाव बनाने में पंडे कोई संकोच नहीं कर रहे थे। खैर इनसे पीछा छुड़ाकर भगवान राम के चरणों में शीश नवाने के साथ जिंदगी की नई मंजिल संग मिली नई चुनौती को सामना करने की शक्ति देने की प्रार्थना मन में की। मंदिर के अंदर स्फ टिक का पारदर्शी शिवलिंग मेरे लिए अद्ïभूत चीज थी। यहां पर भी तैनात पंडित जी हर श्रद्घालुओं को ग्राहक फंसाने के अंदाज में डोरे डाल रहे थे। मंदिर में मौजूद सभी देवी-देवताओं के दर पर मत्था टेकने के बाद बाहर निकला। दिमाग में अजब सिंह यादव ही घूम रहे थे। रघुनाथ बाजार में खरीदारी करती महिलाओं की भीड़ के बीच अचानक अजब सिंह को देखकर आंखों में चमक आ गयी। करवाचौथ की पूर्व संध्या पर भीड़ देखकर बनारस का गोदौलिया बाजार याद आ गया। खुद को अजब सिंह यादव के पास पहुंचना था, इसलिए नजदीक पहुंचकर जय हिंद बोला। जवाब जय हिंद ही मिला। पूछा इटावा के हैं क्या यादव जी? ऊपर से नीचे तक एक्स-रे जैसी नजरों से मुआयना करने के बाद वह बोले गाजीपुर का हूं। यह सुनकर ऐसा लगा जैसे कोई अपना मिल गया हो। अपना परिचय देते हुए कहा ..मैं दिनेश चंद्र मिश्र, अमर उजाला बनारस से जम्मू-कश्मीर तबादला होकर आया हूं। दस साल की नौकरी में  चाल, चेहरा व चरित्र से बनारसी हो चुके  इस शख्स को अजब सिंह यादव ने जिस तरह का स्नेह दिया, वह आज भी जेहन में बरकरार है। बनारस से बातचीत चालू हुई घर-परिवार तक पहुंच गयी। सुरक्षा में लगे जवानों को देखते हुए मैने अजब भाई से पूछा कि आपकी पत्नी करवाचौथ नहीं मनाती हैं क्या? निरजला व्रत रहती है, लेकिन शादी के बाद से आज तक कोई ऐसा मौका नहीं मिला, जब चांद के साथ जब उसके सामने मौजूद रहूं। इस खबरनवीस से भी उनका यही सवाल था। प्रतिउत्तर दिया कि अखबार की नौकरी में यह चौथा करवाचौथ है, जब पत्नी के पास नहीं हूं। अपने दिमाग में खबर की बुनियाद खड़ी होने लगी थी, अजब सिंह से पूछा करवाचौथ के दिन क्या करते हैं? जवाब था यहां आसमां में चांद दिखता है तो दो साल से फोन करके हैप्पी करवाचौथ बोल देता हूं। पति-पत्नी आवाज में ही एक दूसरे का अक्स खोज लेते हैं। अब दिमाग में खबर का खाका तैयार हो गया था। फिर मिलने का वादा करके उनसे विदा ली। रघुनाथ बाजार में टहलने के साथ अब ऐसे जवानों को खोजने का लक्ष्य बनाया, जिनके नाम से लगता हो कि उनकी पत्नियां भी करवाचौथ मनाती हो। जम्मू पुलिस लाइन के पास भी बंकर के पास एक जवान मिल गया कानपुर का। उसका कहना था अटल जी के राज में जम्मू-कश्मीर में मोबाइल सेवा चालू होने के बाद घर-परिवार से बात हो जाती है। करवा चौथ के दिन चांद दिखने पर पत्नी को विश करता हूं। पत्नी जितना उस दिन चांद को देखने के लिए बेताब रहती हैं, उससे कम मैं भी नहीं रहता हूं। बाड़ी ब्राम्öïण के पास मिले एक जवान की करवाचौथ से जुड़ी यादें सुनकर तो आंखें गीली हो गयी। नाम था हरजिंदर सिंह। पंजाब का रहने वाला था। बताया पिछले साल डोडा में तैनात था करवाचौथ का दिन था, चांद निकल आया लेकिन नेटवर्क प्राब्लम के कारण फोन नहीं मिल पा रहा था। रात बारह बजे के बाद जब फोन मिला तो मेरी आवाज सुनकर बीबी रोने लगी, मैं भी उसको चुप कराते हुए अपने आंसुओं को नहीं रोक पाया। किसी तरह चुप हुई तो पता चला कि उसने मेरे फोन के इंतजार में पानी भी नहीं पिया है। सेना के जवानों को मातृभूमि की रक्षा के लिए घर-परिवार से दूरी के साथ संवेदनाओं को सीने में दफन करने की क्षमता देखकर दिल उनको बार-बार सेल्यूट कर रहा था। दर्जनों जवानों से करवाचौथ को लेकर ढेरों बातें करने के बाद घड़ी की ओर देखा तो चार बजने में कुछ मिनट कम थे। सिटी बस पकडक़र विक्रम चौक पहुंच गया। सीधे आफिस में गया, संपादक जी अभी आए नहीं था। एक कम्प्यूटर पर बैठकर पहली स्टोरी जम्मू डेटलाइन से फाइल की। हेडिंग थी- आसमां में दिखेगा चांद तो आवाज में दिखेगा अक्स। यह स्टोरी सेना के उन जवानों को समर्पित थी जो बीबी-बच्चों से दूर रहकर किस तरह घर पर होने वाले त्योहार का हिस्सा बनते हैं। उनको कितनी दिक्कतें आती हैं, क्या महसूस होता है। दिल,दिमाग के प्रयोग से न्यूज स्टोरी खूबसूरत बन गयी थी, कई बार खुद पढऩे के बाद प्रिंट निकालकर रख लिया। आफिस से नीचे उतरकर चाय की दुकान पर पहुंचा। चाय के साथ गर्म पकोड़ी का स्वाद चखने के साथ न्यूज स्टोरी को बार-बार पढ़ा ताकि कोई गलती हो तो उसे संपादक के हाथ मेें देने से पहले दूर किया जा सके। ठंड में चाय की चुस्की संग संपादक का इंतजार चलता रहा। और अचानक संपादक जी अपनी बाइक से आते दिखे।
                                                           क्रमश:


जय हिंद सुनकर रेशमा को लग गया करंट

रोमिंग जर्नलिस्ट की रिपोर्ट 8
अमर उजाला जम्मू में मीटिंग की चाय पीने के बाद ही सीबीआई दफ्तर जाने की तैयारी के साथ दिमाग सवालों के उधेड़बुन में लग गया। जम्मू आने से पहले जम्मू-कश्मीर में सेक्स स्कैंडल का मामला काफी उछला था। दुनिया में खूबसूरती के साथ सेक्स की मंडी में कश्मीरी औरतों को हाट प्रोडक्ट बताकर बेचने के साथ धंधा कराने वाली सबीना के घर पर लोगों द्वारा हमला करने की खबर अखबारों में पढ़ी थी। विक्रम चौक से सिटी बस पकडक़र जम्मू रेलवे स्टेशन के पास मौजूद रेड हेड काम्पलेक्स में स्थित सीबीआई दफ्तर पंद्रह मिनट में पहुंच गया। गेट पर मौजूद गार्ड को परिचय दिया ..मैं अमर उजाला जम्मू में चीफ रिपोर्टर हूं, नाम है दिनेश चंद्र मिश्र। एसएसपी साहब से मिलना है। गार्ड ने जेब में मौजूद अमर उजाला बनारस के आईकार्ड में फोटो मिलाने के बाद तलाशी लेकर अंदर जाने दिया। पांच मिनट में गार्ड को परिचय और तलाशी से संतुष्टï करने के बाद सीबीआई जोनल आफिस के विजिटर गेट पर पहुंच गया। उस समय तक सीबीआई के एसएसपी का नाम भी नहीं मालूम था। अमर उजाला जम्मू टीम में शामिल क्राइम रिपोर्टर विद्यार्थी जी से जाने से पहले पूछा तो उनका कहना था, हमारा कभी जाना ही नहीं हुआ, नाम नहीं मालूम। खैर विजिटर गेट के पास पहुंचने के बाद दीवार पर नजर डाली तो एक बोर्ड दिखा, जिसमें एसएसपी के नाम के आगे .. .. गौड़ लिखा था। रिस्पेशन पर पहुंचा तो अपना परिचय देकर गौड़ साहब से मिलने की बात कही। कुछ ही देर में गौड़ साहब ने अंदर बुला लिया। राजस्थानी पंडित गौड़ साहब जितने व्यवहार कुशल थे, उतने ही धार्मिक थे। हर बात में माता रानी की कृपा कहने वाले गौड़ साहब को जब पता चला मैं बनारस से आया हूं तो उनको ऐसा लगा जैसे कोई काशी का बहुत बड़ा पंडित उनके घर आ गया हो। काशी की पांडित्य परंपरा की चर्चा करते-करते बीस मिनट बीत गए, तब तक चाय आ चुकी थी। चाय की चुस्कियों संग आने के मकसद पर चर्चा हुई तो जम्मू-कश्मीर के सेक्स स्कैंडल की चल रही सीबीआई जांच के बारे में पूछा तो पता चला कि सीबाईआई नईदिल्ली की क्राइम ब्रांच इसकी जांच खुद कर रही है, इसमें जोनल आफिस का कोई योगदान नहीं है। भष्टïाचार के मामले में उस समय नंबर एक पर मौजूद जम्मू-कश्मीर में कितने मामले इस समय दर्ज है? यह सवाल जब किया तो गौड़ साहब की पीड़ा छलक पड़ी। जम्मू-कश्मीर में मैदानी राज्यों से आने वाले लोगों को कितनी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है? वह जिस माहौल में काम करके आते हैं और यहां उन्हें जो माहौल मिलता है? उसमें कितना फर्क होता है? इसको लेकर चर्चा प्रारंभ हो गयी। गौड़ साहब ने पहले मुझसे पूछा आपने यूपी की राजधानी से लेकर देश की सांस्कृतिक राजधानी काशी तक में काम किया हैं, यहां और वहां में क्या फर्क है? दस दिन में जो फर्क महसूस किया था, उसको बताया, उसे सुनकर थोड़ा संतुष्टï हुए फिर कहने लगे आप अभी रियासत के सरकारी महकमों की कार्यप्रणाली से बखूबी वाकिफ नहीं है। भ्रष्टïाचार यहां जिस पैमाने पर फैला है, उस तरह किसी भी स्टेट में नजर नहीं आएगा। भ्रष्टï्राचार को लेकर दस मिनट तक चर्चा करने के बाद वह अपने विभाग का आफ द रिकार्ड हाल बताने लगे। सीबीआई जोनल आफिस में चौबीस इंस्पेक्टर है। भ्रष्टï्राचार को लेकर किसी भी इंस्पेक्टर ने पिछले दो साल के दौरान कोई मुकदमा ही नहीं दर्ज कराया है। इसके पीछे का कारण पूछने पर कहा कि अधिकांश इंस्पेक्टर जम्मू-कश्मीर के ही है, जो ऐसे मामले दर्ज होने के पहले ही बाहर ही बाहर ही सुलटा लेते हैं। सीबीआई में ऐसे इंस्पेक्टरों की संख्या दो तिहाई से ज्यादा है। पिछले दो सालों से कोई भी मुकदमा दर्ज नहीं हुआ है। सीबीआई जम्मू के जोनल दफ्तर का अंदरुनी हाल जानने के बाद गौड़ साहब से खबर न बनाने का वादा करने का कोफ्त भी हुआ। डेढ़ घंटे की सीबीआई एसएसपी से मुलाकात में जम्मू-कश्मीर में उनके विभाग के साथ वहां रहने वाले बाहर के लोगों का हाल जानने के साथ इधर आने पर आते रहने का वादा करके वहां से चल दिया। सीबीआई दफ्तर से बाहर निकलने पर सोचा कि खबर तो मिली नहीं लेकिन एक अच्छे इंसान से दोस्ती के साथ ढेरों ज्ञान हासिल हुआ। खबर की खोज अधूरी रही, बाहर निकला तो जम्मू के स्थानीय संपादक प्रमोद भारद्वाज की वह बात याद आ गई कि रेल हेड काम्पलेक्स में बहुत से सरकारी दफ्तर है, कोई रिपोर्टर टच नहीं करता है। बाहर निकलकर थोड़ा सा ही चला था कि सामने भारतीय खाद्य निगम का दफ्तर हिंदी,उर्दू और अंग्रेजी में लिखा दिखाई दिया। दफ्तर में घुसने के बाद सीधे पहुंच गया महाप्रबंधक के पास। परिचय के बाद खाद्यान्न उत्पादन और भंडारण से बातचीत शुरू हुई और श्रीनगर में सर्दी में खाद्यान्न समस्या से निपटने के लिए किए गए इंतजाम की एक खबर मिली। कहने को सरकारी खबर थी, लेकिन हाथ में एक खबर आने पर कुछ संतोष जरूर हुआ। कश्मीर में जम्मू से खाद्यान्न की आपूर्ति के साथ बर्फबारी के समय  श्रीनगर से संपर्क टूट जाने की स्थिति में अनाज व अन्य जरूरी चीजों के बारे में एफसीआई महाप्रबंधक से मिली खबर लेकर ही आफिस लौटने का फैसला किया।
विक्रम चौक आने के लिए जम्मू रेलवे स्टेशन के सामने बस पकडऩे के लिए आ गया। बस में आकर बैठा ही था कि थोड़ी देर में एक कश्मीरी खूबसूरत महिला भी आकर बगल में बैठ गयी। बस को ठसाठस भरने के लिए ड्राइवर और कंडक्टर यूनिवर्सिटी,विक्रम चौक,गांधीनगर की आवाज लगा रहे थे। इसी बीच संपादक जी का मोबाइल पर फोन आ गया। हैलो-हाय की जगह जय हिंद बोलने की आदत के चलते जय हिंद बोला। जय हिंद सुनते ही बगल में बैठी कश्मीरी महिला इस तरह चौंक गई जैसे उसको करंट लग गया हो। प्रमोद जी को दिनभर की गतिविधियां बताने के बाद आफिस लौटने की बात बताकर पुन: जय हिंद बोलकर फोन रख दिया। फोन रखते ही उस महिला ने पूछा जनाब आप फोर्स में हैं क्या? जवाब दिया नहीं..अगला सवाल था फिर जय हिंद क्यो बोलते हैं? नमस्ते,सलाम,राम-राम से बेहतर मुझे अभिावादन में जय हिंद कहना लगता है,इसलिए जयहिंद बोलते हैं। पढ़ी-लिखी दिख रही इस महिला ने पूछा जनाब आप काम क्या करते हैं? बताया अखबार में रिपोर्टर हूं। यह सुनने के बाद जयहिंद की आवाज कानों में जाने से करंट का झटका खा रही यह महिला थोड़ी सामान्य हुई। अपना नाम रेशमा बताते हुए उसने बताया गर्वमेंट मेडिकल कालेज में वह नर्स है। बातचीत के दौरान उसने बताया मुझे एक न्यूज आपको देनी हैं, लेकिन उसकी चर्चा यहां नहीं कर सकती, आप मेडिकल कालेज आइएगा तब बताऊंगी। बस चल पड़ी थी उधर रेशमा से फोन नंबर का आदान-प्रदान होने के साथ अन्य बातें होती रही। रेशमा का जय हिंद सुनकर बिजली का झटका खाने से लेकर मेडिकल कालेज में खबर के लिए बुलाने का कारण दिमाग में एक अनसुलझा सवाल बन गया था। इस सोच-विचार के बीच विक्रम चौक आ गया। रेशमा से खुदा हाफिज करके चल दिया दफ्तर। श्रीनगर में बर्फबारी से निपटने के लिए खाद्यान्न आपूर्ति की व्यवस्था को लेकर खबर बनाने के बाद फैसला किया रेशमा से मिलने कल जाएंगे।
क्रमश:


यह है 1947 की लव नहीं त्रासदी स्टोरी

रोमिंग जर्नलिस्ट की रिपोर्ट 7
जम्मू-कश्मीर में एक सप्ताह तक घूमने के बाद काम करेंगे कि नहीं? पहले दिन यह फलसफा पढ़ाने वाले अमर उजाला जम्मू के स्थानीय संपादक प्रमोद भारद्वाज ने सातवें दिन ही आफ बीट स्टोरी के साथ श्रीनगर से लेकर जम्मू सिटी संस्करण के साथ प्रथम पेज पर जाने वाली खबरों के संपादन की जिम्मेदारी मीटिंग में सौंपी। पिछले कई साल से जम्मू में काम कर रहे कानपुर के रहने वाले योगेश शर्मा को खुशी हुई कि काम में हाथ बंटाने वाला कोई आ गया। मीटिंग में कठुआ संस्करण के डेस्क इंचार्ज अनिमेष शर्मा भी आए थे, ताकि वह मुझे नए मकान तक ले जा सके। मीटिंग के बाद जम्मू के पाश इलाके गांधी नगर में पहुंच गया। वहां एक सरदार जी के मकान की उपरी मंजिल को अनिमेष और योगेंद्र ने किराए पर लिया था। तीन कमरों के हवादार मकान में एक कमरे में सूने पड़े बेड पर अपना बैग रखने के जरूरी सामान लेने बगल के मार्केट में चल दिया। सर्द मौसम में गुनगुनी धूप का आनंद मकान की छत पर मिल रहा था। सामान रखने के बाद फिर निकल  पड़ा खबर की खोज में। अखबार में बहुत पढ़ा था कि कश्मीर से पंडितों को भगाया जा रहा है। कश्मीर के खदेड़े गए लोगों की खबर लेने के लिए गांधीनगर से बाड़ी ब्राम्हण की रोड पर निकल पड़ा सिटी बस से। आधे घंटे के सफर के बाद एक शरणार्थी शिविर में था।  शिविर में मिल गए पंडित रामनिवास पंगोत्रा, उम्र साठ पार की थी। बात छिड़ी सन् 1947 की। वह बताने लगे हमारा गांव (पुप्पुर श्रीनगर से दूर है )। गांव में 200 परिवार पंडित, 57 परिवार राजपूत, 22 परिवार सिख और 29 परिवार दूसरे हिन्दू थे। आज की तारीख में अगर आप मेरे गांव में जाएंगे तो तो पूरा गांव मुसलमानों का ही पाएंगे। हमारे घरों पर पर जबरदस्ती कब्जा किया गया।  किसी ने हमारी नहीं सुनी। नेहरू सरकार ने भी नहीं हमारी नहीं सुनी। हम लोग श्रीनगर हब्बाकदाल में आये जहां हमारी दुकान थी। 40 साल ठीक रहा फिर हमें वहां से मजबूरन जम्मू भगाया गया। अब कह रहें कश्मीर हिन्दू का नहीं कल जम्मू में भी ये बढ़ जायेंगे फिर कहेंगे जम्मू तुम्हारा नहीं फिर हम कहां जायेंगे? शरणार्थी शिविर में गुजर-बसर कर रहे हिंदुओं की पीड़ा नजदीक से अनुभव करने के बाद आफिस पहुंचा तो गुगल देवता का सहारा लेकर और भी आंकड़े जुटाने में लग गया ताकि खबर को और भी धार दी जा सके। पांच साल पहले के सरकारी आंकड़ों पर नजर डाली तो पता चला कि नौ लाख साठ हजार सात सौ बीस कश्मीरी हिन्दू कश्मीर से निकाले गए। जो नहीं भागा उसे मुसलमान बना दिया जो नहीं बना उसे मार दिया गया। पंडित जी से कश्मीर की आपबीती सुनने के बाद दिल में धरती के स्वर्ग में कब्जा जमाए आतंकी संगठनों की करतूतों के साथ यहां के नेताओं के बारे में सोचने लगा। कश्मीर में आजादी के बाद हिंदुओं ने क्या खोया? इसकी खोजबीन में जुटा तो पता कि आज जिसे सोपोर कहते हैं, उसका पुराना नाम शिवपुरा था। इसी तरह बारामुला का पुराना नाम ब्रह्मापुरा, आज जो काजी कुंड है वह असल में कभी काशीकुंड के नाम से जाना जाता था। दुनिया में खूबसूरती के लिए मशहूर गुल मार्ग का पुराना नाम गोविन्द मार्ग रहा है। ये नाम पहले कभी नहीं बदले गए थे जो सदियों से थे इतिहास देखकर इसकी पड़ताल की जा सकती है। न जाने और कितने ऐसे नाम हैं जो कश्मीरी मुसलामानों ने बदल दिए। अब कुछ ही नाम हैं जो कश्मीर घाटी में बच गए हैं। जैसे श्रीनगर,अमरनाथ,पंचतरनी आदि। ये नाम तब के हैं जब मुनि वशिष्ठ और विश्वामित्र जी ने तप किये थे। बाबा भोले नाथ कि कर्मस्थली भी वहीं थी। कश्मीर तब भी हिन्दुस्तान का था और आज भी है और कल भी रहेगा लेकिन जब किसी परिवार में कोई बाहरी घुस जाता है तो परिवार बिखर जाता है वही कश्मीर के साथ हुआ। शरणार्थी शिविर में मिले एक इतिहास के जानकारों ने बताया कि जब अफगानों ने कश्मीर पर हमला किया पूरा देश रजवाड़ों में बंटा था। जब अंग्रेजों का राज था तब भी कश्मीर में हिन्दू राजवाड़ों का राज था, गड़बड़ तब हुई जब हिन्दुस्तान को आजादी मिली और राजा हरि सिंह ने खुद को अलग देश घोषित किया उसी तरह हैदराबाद,जूनागढ़,जयपुर ने भी अपने को अलग ही माना। पकिस्तान ने इसी मौके का फायदा उठाया और अपने लोगों से कश्मीर पर कब्जा करा दिया। पीओके में हिन्दुओं का कत्लआम हो रहा था जो बचे भाग कर हिन्दुस्तान आये।  राजा हरि सिंह के बहुत सारे रिश्तेदार मारे गए तब हिन्दुस्तानी फौज ने भी हमला किया और पाकिस्तान हार गया। लेकिन जो पाकिस्तानी मुसलमान यहाँ घुस गए थे वो वापिस नहीं गए. जिसके कारण आज कश्मीर में दहशतगर्दी बढ़ रही है। इन सब जानकारियों को एक स्टोरी के रूप में परोसना मुश्किल था। शरणार्थी शिविर में रहने वाले कश्मीरी पंडितों के हाल पर स्टोरी तैयार हुई। फोटो के साथ उसको फ्रंट पेज पर लेने का फैसला लिया गया। लेटनाइट फ्रंट पेज की जो डमी आयी, उसमें विज्ञापन इतना था कि खबर को अंदर छापने का निर्णय संपादक जी ने लिया। विज्ञापन के बोझ से अंदर के पन्ने भी असंतुलित थे, खैर खबर छपी बिना फोटो के। जगह के चलते वह इतनी छोटी हो गयी कि उसकी आत्मा अगले दिन अखबार में कई बार पढऩे के बाद भी नहीं मिली। ऐसा इसके पहले भी कई बार हो चुका था, फिर भी अगले दिन कई घंटे मूड आफ ही था। दिल में खबर की मजबूरन सर्जरी से ज्यादा  दुख कश्मीरी पंडितों के हाल को देखकर हुआ। मीटिंग में विज्ञापन के कारण खबर का डिस्पले ठीक न हो पाने का अफसोस संपादक जी ने भी जताया,लेकिन उनके हाथ में भी कुछ नहीं था। मीटिंग में उन्होंने ऐसे विभागों को टच करने को कहा, जहां कोई यहां का रिपोर्टर जाता ही नहीं हो। उनके इस निर्देश के बाद ऐसे कई क्षेत्र चिन्हित किए। और चल दिया सीबीआई दफ्तर।
क्रमश:




एक गांव ऐसा जहां है तेरह लादेन

रोमिंग जर्नलिस्ट की रिपोर्ट  6
जम्मू-कश्मीर की लुभाती वादियां, हिमालय की बर्फीली चोटियां, दूर-दूर तक फैले हरे-भरे मैदान, चुपचाप बहते नदी-नाले और झरनों की मीठी आवाज यह सबकुछ सिनेमाहाल या टीवी पर देखना जितना दिल को लुभाता है,उससे कई गुना ज्यादा सुकून यह चीजें दिल,दिमाग को देती हैं। इसका अहसास जम्मू-कश्मीर में पहुंचने के बाद एक संडे को उधमपुर की अधूरी बस यात्रा के दौरान ही हो गया। शंकराचार्य मंदिर, हजरतबल की पाकीजगी,नागिन झील व डल झील का झिलमिलाता सौंदर्य, मुगल उद्यानों का शाही खुशबू, हिमशिखरों का धवल सौंदर्य और ताजगी देती आबोहवा के लालच में संपादक जी को सबेरे मीटिंग में न आ पाने का एसएमएस भेज दिया। उद्यमपुर के प्राचीन रघुनाथ मंदिर,जालन्धरी देवी मंदिर की मान्यता के बारे में अमरउजाला जम्मू के साथी उमेश पंगोत्रा के मुंह से सुना था। बस में संयोग से आगे की सीट मिल गयी। मातारानी के जयकारा के साथ बस चली तो कुछ ही देर बाद नागिन पहाडिय़ां भी हम सफर बन गई। उनको देखकर मजा भी आ रहा था, लेकिन बस की स्पीड देखकर शाम तक आफिस लौटने का टाइम मैनेजमेंट गड़बड़ाता भी दिख रहा था। नौ बजे से शुरू हुआ सफर दिन में बारह बजे तक आधा भी पूरा नहीं हुआ था, बस चालक से पूछा कब तक पहुंचेंगे तो जवाब मिला तीन बजे के बाद। इस जवाब को सुनने के बाद शाम को आफिस पहुंचने के चक्कर में ना चाहते हुए भी यात्रा को बीच में छोडऩे का फैसला लेना पड़ा। जम्मू-श्रीनगर राजमार्ग पर तीन घंटे का सफर तय करने के बाद उतरने पर भूख लग आयी थी। एक होटल पर पहुंचा तो वहां की लोकल डिश कालादी-सैंडविच चखने पर तो बनारस की कचौड़ी-पूड़ी की याद आ गयी। इस पहाड़ी डिश का गजब का स्वाद लगा। पेट भरने के बाद अब दिमाग खबर की तरफ दौडऩे लगा। दिल-दिमाग खबर का ताना-बाना बुनने में जुट गए। सोचते-सोचते चाय की तलब लग गयी। चाय के लिए पहाड़ी पर बने एक होटल के बाहर पहुंच गया। होटल में चाय मांगने पर दुकानदार ने कहा लादेन साहब को चाय देना। बनारस में था तभी अमेरिका में 9/11 की घटना के बाद ओसामा बिन लादेन का नाम दुनियाभर की मीडिया में छा गया था। उधमपुर से पहले होटल में तेरह साल के लडक़े का नाम लादेन सुनकर चौंक पड़ा। गोरा-चिट्ïटा मासूम लादेन चाय का गिलास थमाने के बाद बड़े गौर से देखने लगा। चाय खत्म होने के बाद लादेन से पूछा स्कूल जाते हो? जवाब नहीं की मुद्रा में सिर हिलाकर दिया। पूछा कि लादेन नाम अब्बा ने रखा? इसका जवाब वह आंखों से होटल मालिक की तरफ इशारा करके दिया। चाय के पैसे चुकाने दुकानदार के पास पहुंचे तो कहा कि बच्चे को आतंकवाद की ट्रेनिंग दे रहो हो क्यों? नाम लादेन रख दिए। इस सवाल को सुनने के साथ वह मेरा हुलिया देखकर कुछ सकपकाते हुए कहा कि नहीं साहब जब से अमेरिका की घटना हुई तो यहां लादेन नाम का फैशन आ गया है। इसको तो लोग प्यार से लादेन बुलाते हैं, बगल एक गांव का नाम लेते हुए कहा कि वहां जाएंगे तो एक गांव में तेरह लादेन मिलेंगे। दिमाग में खबर की घंटी बज चुकी थी, अब मासूम लादेन को खोजने के लिए निकल पड़ा। जिस गांव का जिक्र होटल मालिक ने किया था, वहां आधे घंटे में पहुंच गया। गांव वालों से सीधे लादेन की खोजबीन मुनासिब नहीं समझा। एक बुजुर्ग दिखे उनके पास पहुंच कर बोला मैं अमरउजाला जम्मू में चीफ रिपोर्टर हूं, नाम है दिनेश चंद्र मिश्र। गांव में बच्चों की पढ़ाई का हाल देखने के लिए आया हूं। साठ पार कर चुके जावेद मियां बोले मियां बैठो। बोले इस रियासत में तालीम का हाल उम्दा नहीं है। स्कूल के जर्जर भवन की तरफ इशारा करते बोले उसको देख ही रहे हो, अब वहां तालीम लेने वाले बच्चों से मिल लो, खुद अंदाजा लग जाएगा। जावेद मियां ने लादेन की आवाज लगाई तो दस-बारह साल के तीन बच्चे आ गए। लादेन का नाम सुनकर चौंकने के बाद मैने पूछा इनका नाम लादेन है? बोले मियां लादेन एक..दो नहीं इस गांव में तेरह हैं। चौंकते हुए पूछा कि लादेन नाम पैदा होने के साथ रखा गया था क्या? नहीं मियां लादेन ने अमेरिका की छाती पर चढक़र उसको जो औकात बतायी, उससे हम सबका सीना फख्र से ऊंचा हो गया है। हिंदू जिस तरह अपने बच्चों के नाम राम,लक्ष्मण,कृष्ण जैसे भगवान के नाम पर रखते हैं, उसी तरह हमारे लिए अब लादेन हैं। दुनिया भले ही लादेन को आतंकी माने लेकिन हमारे लिए वह खुदा से कम नहीं है। इंशाअल्लाह एक दिन कश्मीर में भी लादेन के नाम का परचम लहराएगा। देखने में शालीन बुजुर्ग दिखने वाले जावेद मियां की जहरभरी बातों को सुनकर तन-बदन में आग लग गयी। दिल कर रहा था लादेन के इस भक्त का गला दबा दें, लेकिन मन मसोस कर रह गया। लादेन नाम रखने पर किसी को आपत्ति नहीं है? मियां यह आजाद मुल्क है। जावेद मियां ने जितने लादेन बुलाए थे, उनकी फोटो खींचने के इरादे से जेब से मोबाइल निकला। मोबाइल हाथ में देखकर जावेद मियां चौंक गए बोले मियां यहां नेटवर्क जल्दी नहीं मिलता है। खैर मोबाइल में नेटवर्क की एक झलक दिखाई पड़ी। फोन लगाने के बहाने लादेन की फोटो खींचने के बाद जेब में उसे रखकर बोला नेटवर्क की प्राब्लम बहुत है। आधे घंटे की बातचीत को समेटने की भूमिका बनाने के साथ पेन-डायरी भी जेब में रखने लगा। जावेद मियां पूछ बैठे मियां किस अखबार में छपेगा? जवाब दिया अमर उजाला? यह तो हिंदी अखबार है, उर्दू में यह नहीं निकलता है क्या? जम्मू-कश्मीर के नंबर वन हिंदी अखबार के प्रति उनका नजरिया देखकर दिल में उनके प्रति और भी घृणा पैदा हो गयी। खैर खुदाहाफिज बोलकर वहां से चल दिया। संयोग से जम्मू लौट रही एक ठसाठस भरी बस मिल गयी। उसमें सवार हुआ। शाम को छह बजे विक्रम चौक पहुंच गया। आफिस में संपादक जी तब तक नहीं आए थे। फ्रेश होने के साथ चाय-पकोड़ी खाकर उनका इंतजार करने लगा। कुछ देर बाद चैम्बर में घुसने से पहले संपादक जी की नजर मेरे ऊपर पड़ी, देखते ही बोले दिनेश मीटिंग से पहली बार तुमको छूट दे दी, आइंदा ऐसा नहीं होगा.. मैने कहा जी सर। दस मिनट बाद उनके चैंबर में घुसकर इस स्टोरी की चर्चा की, बोले मामला तो गंभीर है बास(शशिशेखर) से पूछना होगा, खैर तुम एक माइल्ड स्टोरी बनाओ, देखते हैं। स्टोरी लिखी एक गांव ऐसा जहां रहते हैं तेरह लादेन। मोबाइल कैमरे की क्षमता कम होने के कारण उससे खींची गई फोटो छपने लायक नहीं थी। लादेन की फोटो के साथ स्टोरी छपने के लिए तैयार थी, संपादक जी ने स्टोरी को ई-मेल से समूह संपादक शशिशेखर के पास भेजा। एक घंटे बाद संपादक जी टहलते हुए मेरे पास आए, बोले बास ने कहा है कि दिनेश को बोलो अभी घूमे-टहले जब समझ में आ जाए तो फिर सलीके से काम करेगा। यह जवाब समझ से परे था। खैर स्थानीय संपादक प्रमोद भारद्वाज ने बताया कि यहां किस तरह अमर उजाला रिपोर्टरों को आतंकी संगठनों से जान से मारने की धमकी के परचे उनके दरवाजे पर चिपके मिलते हैं। पीओके से अक्सर धमकी भरे मेल भी आते रहते हैं। तुम्हारी खबर से कुछ फिर बवाल हो सकता है। तुम अभी घूम-टहलो काम करने के लिए और भी इलाके हैं। दिल में स्टोरी की हत्या का दुख: हिलोरे मार रहा था, उसको जुबान तक आने नहीं दिया। रोजाना की अपेक्षा व्यवहार में थोड़ा रुखापन देखकर संपादक जी रात दस बजे बगल में आकर कुर्सी पर बैठ गए। बोले कब तक होटल में रहोगे,पैसा ज्यादा खर्च हो जाएगा, तुम्हारा परिवार भी है। डेस्क  पर काम कर रहे अनिमेष शर्मा (अब दैनिक भास्कर में) को बुलाया। बोला यह अनिमेष है, गांधीनगर में इसने योगेंद्र के साथ दो कमरे का फ्लैट लिया है। इनके साथ ही कल शिफ्ट हो जाओ। जी सर कहकर काम खत्म करके फिर होटल पहुंच गया। रात में जब तक नींद नहीं आयी तब तक लादेन की स्टोरी की भ्रूण हत्या दिल,दिमाग में चुभती रही। खैर अगले दिन चेकआउट करने के बाद एयरबैग के साथ अमर उजाला दफ्तर पहुंचा। कंधे पर बैग लटका देखकर सिक्योरिटी गार्ड बोला साहब आप भी घर जा रहे हैं क्या? उसका सवाल सुनकर मैने कहा कि मैं रणछोड़ सिंह नहीं हूं। मैदान में आखिरी दम तक मरने-मारने की क्षमता माता रानी ने दी हैं। माता रानी जब तक चाहेंगी, तब तक यहां रहेंगे। माता रानी का नाम सुनकर वह भी उनके गुणगान में व्यस्त हो गया। बोला साहब दूसरे यूनिट से यहां जो लोग आते हैं, वह जल्द ही नौकरी छोड़ देते हैं या चले जाते हैं, इसलिए यह सवाल पूछा बुरा मत मानिएगा। मैने कहा कि कोई बात मैं दिल में नहीं रखता, जो दिल में होता है उसको कह देता हूं। मीटिंग में अभी समय था, संपादक भी नहीं आए थे। इसलिए उसके साथ चाय पीकर दोस्ती गाढ़ी करने में जुट गया ताकि खबरों की खोजबीन में वह काम आ सके। चाय की चुस्की संग उसको डोगरी भाषा सिखाने के लिए अपना गुरु बना लिया। डोगरी जरूरी होने के कारण रोजाना एक घंटे उससे पढ़ाने का वादा भी लिया। चाय का गिलास खाली होने के साथ संपादक जी आते दिखाई पड़े और उससे विदा ले कर चल दिया। 
क्रमश:




चाचा नेहरू मतलब यहां चतुर नेहरू

रोमिंग जर्नलिस्ट की रिपोर्ट 5
चौदह नवंबर की तारीख बचपन से ही जेहन में है। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू यानी कि चाचा नेहरु के जन्मदिन पर जिस स्कूल में पढ़ता था, वहां बाल मेले का आयोजन धूमधाम से होता था। चाचा नेहरू के कसीदे रटाए जाते थे, जो लडक़ा सुर में सुनाता था उसको पेंसिल का डिब्बा इनाम में मिलता था। पेंसिल के डिब्बे की लालच में एक बार मैने भी कविता रटी,जब बारी आयी तो कार्टूनिस्ट प्राण के मशहूर कामिक्स पात्र चाचा चौधरी का गुणगान करने लगा। बच्चे खूब हंसे, दो बेंत की सजा भी मिली। यह घटना दो-तीन दशक पुरानी है। चाचा नेहरू के बारे में दिमाग में मौजूद किताबी ज्ञान जम्मू-कश्मीर जाने के बाद पूरी तरह बदल गया। जम्मू पहुंचने के बाद बात चौथे दिन की है। मीटिंग की चाय के बाद शाम तक आफिस लौट आने की संभावना देखने के बाद आरएसपुरा जाने का फैसला किया। बस पकडक़र आरएसपुरा बाजार पहुंचने के बाद शक्तेश्वरगढ़ बार्डर आउट पोस्ट पर जाने के लिए आटो में सवार हुआ। उसमे सवार लोगों से खेती-किसानी की चर्चा छिड़ी तो पहले परिचय का आदान-प्रदान हुआ। अखबार का नुमाइंदा जानने के बाद लोगों के दिल से आजादी पाने के बाद की पीड़ा ऐसी निकली जो आज भी उनके जेहन में रह-रह कर टीसती रहती है। साठ पार कर चुके सुलखान सिंह ने देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को इतनी भद्ïदी गाली देते हुए कहा कि वह चाचा नेहरू नहीं चालाक और चांडा.. नेहरू था। चेहरे पर सफेद बाल संग झांकती झुर्रियों के मालिक सुलखान की तरफ देखा तो उनके आंखों से गुस्से की लालिमा साफ दिख रही थी। आजादी के जंग में सुलखान के पिता जी शहीद हो गए थे, उनका सपना था हिंदुस्तान की आजादी का। देश जब आजाद हुआ तो प्रधानमंत्री की कुर्सी के लिए पाकिस्तान को बांटने के कारण जम्मू-कश्मीर के लोगों को कितनी दिक्कत रोजाना होती है, इसकी पीड़ा जुबान पर गुस्से संग दिखी तो संसदीय मर्यादा कहां बह गयी पता नहीं चला। आधे धंटे के रास्ते में सुलखान की तरह आधा दर्जन से ज्यादा लोग थे तो नेहरू और कांग्रेस को कोसने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे थे। दिमाग में वह मंजर घूम गया, जब कक्षा आठ में पढऩे के दौरान चुनाव होने पर कांग्रेस का बिल्ला-पोस्टर लूटने के मोहल्ले के लडक़ों से मारपीट तक कर बैठता था। नेहरू के एडविना से प्रेमप्रसंग से लेकर पेरिस से कपड़ों की धुलाई सहित तमाम ऐसे किस्से आटो में सवार लोग सुना रहे थे, जैसे वह खुद चश्मदीद हो। सुलखान का कहना था कि आज आतंकवाद की समस्या के लिए नेहरू ही जिम्मेदार है। देश की आजादी के लिए जिन लोगों ने जान दी, उनकी कुर्बानी भूलकर नेहरू नामक नासपिट्ïटा पाकिस्तान की कीमत पर प्रधानमंत्री बना। आजादी के बंटवारे में सुलखान का आधा परिवार इधर था, सो वह अपनी संपत्ति छोडक़र इधर आ गए। ऐसा ही दर्द हर दूसरे शख्स के दिल से बाहर निकलकर अपनी बात कहने के लिए ऐसे-ऐसे शब्दों की शक्ल में सुनाई पडऩे लगा, जिसको लिखना ठीक नहीं है। चाचा नेहरू को लेकर देश के लोगों के दिलों में जो छवि बैठायी गयी है, उसके विपरीत निकली इस खबर को किस एंगिल से लिखा जाए कि छप सके। दिमाग में यह खिचड़ी पकने लगी थी, नेहरू को जितनी उपाधियों से नवाजा गया, उतनी किसी के मुंह से सुना नहीं था। पाकिस्तान बार्डर तक के सफर में हमसफर बने लोगों की बातचीत का रुख मोडऩे के लिए उनके नाते रिश्तेदारों के बारे में चर्चा शुरू की। सरहद पार सिसकते रिश्तों की दर्दभरी कहानी सामने आयी। उसकी ही खबर बनाने का दिमाग में फैसला किया। शाम को लौटने के बाद संपादक प्रमोद भारद्वाज से दिनभर का वाकया बताने के साथ रिकार्डेड बातचीत सुनायी। उनके लिए यह सामान्य बात लगी, बोले यहां तो नेहरू के प्रति तुम जो नजरिया देखे तो वह आजादी के बाद से हैं। इसमें कोई नई बात नहीं है। सरहद पार रिश्तेदारों से मिलने को वह कितना बेताब है, इस पर एक मानवीय एंगिल से स्टोरी फाइल कर दो। सरहद पार सिसक रहे रिश्तों की खबर फाइल करने के बाद रात को सो नहीं पाया। दिमाग में चाचा नेहरू के बारे में जम्मू-कश्मीर की धरती से निकले नए सच को लेकर सोचता रहा। दिल-दिमाग में ऐसे हिन्दुस्तान का नक्शा घूमने लगा, जिसमें पाकिस्तान और बांगलादेश भी होता। सोच को पंख लग गए थे, अखंड भारत की परिकल्पना के बाद यह सवाल खड़ा हुआ, क्या ऐसे हिंदुस्तान के सामने अमेरिका की चौधराहट चलती? ऐसे ढेरों विचार दिमाग में उमडऩे-घुमडऩे लगे, इसी सोच में कब नींद आ गई पता नहीं चला। सबेरे नींद खुली तो दिमाग में पहला सवाल उठा आज क्या करोगे बेटा दिनेश?
क्रमश:



लाहौर है नजदीक लखनऊ बहुत दूर

रोमिंग जर्नलिस्ट की रिपोर्ट 4
पाकिस्तान की सरहद पर तैनात जवानों की पत्नी जब चांद को देखकर उनकी लंबी उम्र मांगती हैं तो उनका दिल क्या कहता है? अमरउजाला जम्मू में काम करने से पहले घूमकर देखने समझने की संपादक प्रमोद भारद्वाज की सीख के कुछ घंटों के अंदर निकली खबर की कापी हाथ में थी। आसमां में दिखेगा चांद तो आवास में अक्स हेडिंग भी प्यारी बन गई थी। संपादक के आफिस में जाते ही पांच मिनट के भीतर में भी पीछे घुसा। चैंबर में बैठकर वह ई-मेल चेक करने में जुटे थे, इसी बीच में पहुंच गया उनके सामने। सर..अंदर आ जाए? हां आओ दिनेश। कहां घूमे आज। मैने बताया रघुनाथ मंदिर में भगवान के दर्शन करने गया था। दर्शन हो गया ठीकठाक.. जी सर। फिर बात चली बनारस के काशी विश्वनाथ मंदिर की। मैने कहा कि सर एक चीज समान मिली, पंडे जिस तरह वहां श्रद्घालुओं की जेब चूसने में लगे रहते हैं, उसी तरह यहां भी खेल है। धीर,गंभीर दिखने वाले संपादक के चेहरे पर इस बात से पहली बार मुस्कराहट की एक लकीर दिखी। रघुनाथ मंदिर के अलावा और कहीं नहीं गए? प्रश्नवाचक निगाह से इस सवाल को दागे भारद्वाज जी को बताया कि सर रघुनाथ बाजार ही टहला। करवाचौथ को लेकर खरीदारी करती महिलाओं की भीड़ खूब थी। वहां सुरक्षा मंदिर के बाहर कुछ जवानों से बातचीत होने लगी तो करवाचौथ पर केंद्रित हो गयी। जवानों के बातचीत एक खबर समझ में आयी। उसे आपको दिखाने के लिए बनाया हंू। यह कहते हुए न्यूज स्टोरी का प्रिंट संपादक जी को थमा दिया। हेडिंग और इंट्रो को पढऩे के बाद उनका कमेंट था..पहले दिन से ही फायरिंग स्टार्ट कर दिए। स्टोरी की तारीफ कराते हुए उसे सभी संस्करणों को भेजने के लिए कहा। स्टोरी आल एडिशन भेजने के बाद वह संपादकीय के सभी साथियों से कल की मीटिंग में मिलाने की बात कहकर फिर घूमने-टहलने को कहा। संपादक जी को प्रणाम करके आफिस से निकल दिया। सबेरे हल्का-फुल्का नाश्ता करके ही काम चला दिया था, शाम को पेट में कुछ सालिड की जरूरत महसूस होने लगी थी। आफिस से निकलते ही विक्रम चौक पर बालगोत्रा होटल पर नजर पड़ी। होटल के अंदर जाने के बाद दालफ्राई और रोटी का आर्डर दिया। दाल फ्राई के नाम पर राजमा की दाल और तंदूर की रोटी सामने आने के बाद पूछा अरहर की दाल नहीं मिलेगी क्या? तेरह-चौदह साल का गोरा चिट्ïटा कश्मीरी लडक़ा एक बार ऊपर से नीचे मासूमियत के साथ घूरता हुआ इस तरह देख रहा था मानो उसके समझ में कुछ नहीं आया। काउंटर पर बैठे होटल मालिक की तरफ इशारा करते हुए कहा कि उनसे पूछिए। भाई साहब अरहर की दाल नहीं मिलेगी क्या? इस सवाल को सुनकर होटल में पहले से खा रहे लोग भी चौंककर मेरी तरफ देखने लगे। माजरा समझ में आता इसके पहले ही होटल मालिक ने कहा कि साहब यहां तो आपकी यही दाल मिलेगी। खैर राजमा का अरसे बाद जायका रोटी संग लिया। रोटी संग राजमा से मजा नहीं आया तो हाफ प्लेट चावल भी मंगाया। राजमा चावल खाकर पेट भर गया था। होटल में पहुंचा तो शाम के सात बजे थे। मेरी निगाह उस शख्स को तलाश रही थी, जो पहले दिन जिंदा गोश्त का शौकीन समझकर आफर लेकर आया था। एक और खबर तराशने की आस में उस शख्स की खोज अधूरी रही, मालूम हुआ कि वह अपने घर गया है। होटल के कमरे में पहुंचकर टीवी देखते हुए कब नींद आ गई पता ही नहीं चला। सबेरे नौ बजे का समय रहा होगा, तभी बनारस से अमर उजाला के साथी आशुतोष त्रिपाठी का फोन आया। हैलो कहते ही वह बधाई देने लगा। पूछा किस बात की बधाई? भाई आपने जो जम्मू से स्टोरी का ग्रेनेड चलाया है, उसको बनारस के लोग भी देख रहे हैं। मजा आ गया खबर पढक़र। मोबाइल रोमिंग में होने के कारण बिल ज्यादा उठने की बात जब याद आयी तो उसको धन्यवाद कहकर फोन रख दिया। मोबाइल देखा तो कई एसएमएस आसमा में दिखेगा चांद,आवाज में दिखेगा अक्स की स्टोरी पर बधाई देने वाले भरे थे। फोन और एसएमएस से मिल रहे बधाई को देखते हुए मन अमर उजाला देखने को बैचेन हो गया। होटल से बाहर निकलकर अखबार देखा तो फ्रंट पेज पर बाइलाइन खबर पढक़र दिल खुश हो गया। काशी से कश्मीर आने को लेकर दिल,दिमाग में चल रहे सवाल और चिंता पता नहीं कहां चले गए। बनारस,लखनऊ, गोरखपुर, कानपुर,पंजाब सहित कई हिस्सों से पत्रकार साथियों के फोन आए। कुछ बधाई दिए तो कुछ कहे काला पानी की सजा हुई है क्या जो वहां भेज दिए गए। सबको अपने हिसाब से जवाब देने का दौर चलता रहा। होटल से निकलकर आफिस की ओर कदम बढ़ाते हुए चल पड़ा। राह में तवी का पुल मिला तो उसपर खड़ा होने के बाद दिल के साथ हाथ जोडक़र प्रणाम करते हुए आर्शीवाद बनाए रखने की मन्नत मांगी। मीटिंग शुरू होने में अभी आधा घंटा का समय बाकी था, विक्रम चौक से पुलिस लाइन की सडक़ पर वक्त काटने के लिए बेमतलब टहलते हुए चलने लगा। एक किमी जाने के बाद एक माइल स्टोन देखकर ठहर गया। उस पर लिखा था लाहौर 287 किमी। इसको देखकर सोचने लगा यहां से लाहौर तो नजदीक है पर लखनऊ बहुत दूर है। वहां से उल्टे पांव आफिस लौट आया। संपादक जी ने मीटिंग में संपादकीय के साथियों से परिचय कराते हुए कहा कि यह है अपने नए साथी दिनेश चंद्र मिश्र। अखबार में बाइलाइन देखने के बाद अचरज भाव से मीटिंग में आए संपादकीय के तमाम साथी एक्स-रे की नजरों से देखने लगे। पहली खबर से प्रभावित हो चुके प्रमोद जी ने कहा कि काशी से जम्मू-कश्मीर आए है, आप लोग के साथ काम करेंगे,आप लोग इनका सहयोग कीजिएगा। और यह है योगेश शर्मा, अनिमेष शर्मा, योगेंद्र, विनोद कुमार, संजीव,राहुल। सबसे हाथ मिलाकर परिचय किया। एक सप्ताह तक घूमकर फिर काम करने के बारे में बताने की सलाह देने वाले संपादक जी ने अस्थायी रूप से फ्रंटपेज पर जाने वाली खबरों को देखने के साथ कोई बीट न देकर कहीं से भी खबर लाने की बात कही। पत्रकारिता का कीड़ा काटने के बाद जब से इस प्रोफेशन में आया जब से रिपोर्टिंग में ही हाथ अजमा रहा था, पहली बार डेस्क की बखूबी जिम्मेदारी मिली। नई जिम्मेदारी और नई चुनौती के बीच नए साथियों से भी नजदीकी बढ़ी। भोपाल के अनिमेष शर्मा और योगेंद्र सेन,गोरखपुर के राहुल के साथ आधा दर्जन से ज्यादा नए दोस्त पाकर खुश होने के साथ कल क्या करेंगे? इसी सोच में फिर मीटिंग के बाद आफिस से निकल पड़ा।
क्रमश:

काशी नहीं कश्मीर है, कलम कम एके-56 ज्यादा..


रोमिंग जर्नलिस्ट की रिपोर्ट 2
धरती का स्वर्ग जम्मू-कश्मीर है। कक्षा आठ में किताब में फोटो के साथ देखकर रटी हुई बात,जेहन की खिडक़ी से निकल रात को आसमान में ही जन्नत खोजने में जुट गयी। अंधेरी रात होने के कारण कुछ समझ में नहीं आया। ठंड की चुभन भी बढऩे लगी थी। ट्रांसफर एडवांस के रूप में मिले दस हजार रुपए जेब में जरूर गरमी का अहसास दिला रहे थे। जेब की गरमी ठंड में बेमतलब लग रही थी तो होटल की तलाश में जुट गया। रात नौ बजे थे, लेकिन सडक़ों पर पसरे सन्नाटे को सेना के गश्ती वाहन और इक्का-दुक्का आटो चीर रहे थे। स्टेशन से निकलकर आटो स्टैंड पर एक आटो वाले ने सौ रुपए में रघुनाथ मार्केट स्थित  होटल कैपिटल तक पहुंचाया। रात के दस बज गए थे। बाजार में खाने-पीने की दुकानें बंद हो गयी थी। होटल का गेट भी बंद पड़ा था, आटो वाला अंदर जाकर खुलवाने के बाद मुझे बुलाया। कमरा मिलते ही आटो ड्राइवर को पैसा देकर विदा किया। कमरे में  अभी कपड़े बदला ही रहा था कि दरवाजे पर खटखट की आवाज हुई। दरवाजा खोला तो छह फुट लंबा-चौड़ा एक बुजुर्ग एक जग पानी लेकर आया। खाने को क्या मिलेगा? साहब अब होटल बंद हो गया है, कुछ नहीं मिलेगा। चाय तो मिलेगी, साहब वह भी नहीं मिलेगी। फिर आखिर मिलेगा क्या? साहब आप गोश्त खाते हैं? पहले खाता था अब नहीं। साहब.. हम जिस गरम गोश्त की बात कर रहे हैं, वह पूरी दुनिया में मशहूर है। रेडलाइट एरिया के दलालों की तरह आंखों में ग्राहक को रिझाने वाली चमक पैदा करते हुए कहा ठंड भाग जाएगी.. साहब। उसका इशारा समझते हुए देर नहीं लगी, उसको दो टूक कहा एक चाय तो पिला नहीं पा रहे हो आए हो गोश्त खिलाने। उसको विदा करने के बाद पानी पीने के लिए जग से एक गिलास पानी निकाला तो एक घूंट मुंह में डालते ही लगा दांत में करंट उतर गया। बैग में खाने-पीने की बची-खुची चीज खोजने में लग गय। बिस्कुट का आधा पैकेट मिला, उसको साफ करने के बाद भगवान का नाम लेकर सोने की तैयारी में जुट गया। कमरे में रखे दो कंबल के साथ जिस कंबल को ले गया था,उसको भी सटाकर ओढ़ लिया। कमरे में रखे टीवी को आन करके रिमोट लेकर चैनल यात्रा प्रारंभ की। हिंदी,अंग्रेजी चैनलों के साथ जेके चैनल को देखकर ठहर गया। लंबे सफर के चलते थकान के कारण आंखें बोझिल होने लगी। माता रानी का नाम दिल में लिया ताकि सबेरे समय से नींद खुल जाए। सोने की कोशिश जुट गया लेकिन दिमाग में जो विचारों का ज्वार-भाटा आया था वह थमने का नाम नहीं ले रहा था। 
शादी के चार साल बाद एक बार पत्नी और दुधमुंही बेटी के साथ माता रानी के दर्शन करने आया था,तब सोचा नहीं था कि रोटी की जंग के लिए मां के चरणों को कर्मभूमि बनानी होगी। नौकरी छोडक़र खेती-बाड़ी करने की पिता जी द्वारा दी गई हिदायतें सोचने को मजबूर कर रही थी। दिल-दिमाग के बीच गजब का वैचारिक संघर्ष हो रहा था। दिमाग में उमड़ रहे सवालों को दिल यह कहकर खारिज करता रहा कि सरहद पर तैनात सेना के जवानों के भी मां-बाप,परिवार होते हैं,जो डर गया वो मर गया, दिल और दिमाग एक दूसरे को तसल्ली देने के लिए कितनी रात को नए-नए तर्क-कुतर्क गढ़ते रहे मालूम नहीं। सबेरे नौ बजे दरवाजे पर खटखट होने के साथ नींद खुली। गर्म पानी से नहाने के बाद तैयार होकर अमर उजाला जम्मू आफिस के लिए चल दिया। तवी नदी पार करते ही विक्रम चौक आ गया। एक बहुमंजिला इमारत के ऊपर अमरउजाला की होर्डिंग दूर से दिखाई पड़ रही थी। नजदीक पहुंचा तो नीचे गार्ड ने रोका, परिचय देने के साथ मकसद समझाया तो ऊपर जाने दिया। घड़ी में साढ़े दस बज गए थे। स्थानीय संपादक प्रमोद भारद्वाज जी अपने चैंबर में आ गए थे। चपरासी ने जाकर बताया तो अंदर बुला लिया। प्रणाम के बाद प्रोफेशनल अनुभव के साथ परिवार के बारे में जानकारी ली। बोले बास (शशिशेखर) ने तुम्हारे बारे में बताया कि रिपोर्टर अच्छे हो लेकिन....... मैने कहा हर आदमी के अंदर कुछ न कुछ लेकिन होता है,नहीं होता है तो भगवान बन जाता है। इस जवाब को उनको उम्मीद नहीं थी। वह कहे तुम्हारे सामने अलीगढ़, बरेली का भी विकल्प था, फिर यहां क्यों आए। जवाब था रोमांच और चुनौती को चीरने की जुनूनी जिद है। उनके हावभाव से लगा कि यह उत्तर भी उनको नहीं भाया। ऐसे कई सवाल का जवाब सुनने के बाद वह काशी और कश्मीर की पत्रकारिता में अंतर समझाने लगे। पहली बाधा तो भाषा की है, आप हिंदी,अंग्रेजी जानते हैं लेकिन यहां डोगरी और कश्मीरी जानने वाले ही रिपोर्टिंग में सफल होते हैं। धारा 370 का फंदा यहां की पत्रकारिता को भी किसी न किसी कोण से निर्भीक बनने से रोकता है। आतंकवाद प्रभावित क्षेत्र होने के कारण कभी भी कहीं कुछ हो सकता है। जम्मू की मंडी में हुए एक आरडीएक्स धमाके का जिक्र करते हुए कहा कि मैं वहां से निकला था कि पांच मिनट के अंदर ब्लास्ट हुआ। घर सामान लेकर पहुंचा उससे पहले धमाके की खबर जेके चैनल पर आ गयी थी। आतंकवाद के चलते पत्रकारिता की राह में ऐसी दर्जनों  अनसुनी चुनौतियों को बताने के बाद कहा यह काशी नहीं कश्मीर है, कलम कम एके-56 ज्यादा बोलती है। आप दस दिन जम्मू-कश्मीर घूमकर आप समझ लीजिए, अगर आपको लगेगा तो काम स्टार्ट कीजिएगा। भेड़ के दूध की बनी एक चाय के साथ एक घंटा से ज्यादा का प्रवचन सुनने के बाद, चैंबर से निकलकर जमीं का जन्नत घूमने का दिल कर रहा था। संपादक जी के मंद पड़ रहे प्रवचन को सुनने के बाद बोला सर, आप सही कह रहे हैं पहले घूमता हुं फिर जो समझ में आएगा आपको बताएंगे। और प्रणाम करके संपादक के चैंबर से निकल दिया जन्नत की सैर करने। 

...अरे तुम काशी से कश्मीर आ गए

 रोमिंग जर्नलिस्ट की रिपोर्ट 1
बात पांच साल पुरानी है। अक्टूबर का महीना था। अमर उजाला वाराणसी में जम्मू-कश्मीर का तबादला का मौखिक आदेश मिलने के बाद वहां के लिए चल दिया। काशी से कश्मीर की विदाई एक दिन पहले आफिस में मीटिंग के दौरान तत्कालीन स्थानीय संपादक अकु श्रीवास्तव ने शाल पहनाकर की, कैंट रेलवे स्टेशन पर जब जम्मू के लिए ट्रेन पकडऩे गया तो एचआर वाले फूलों का गुलदस्ता लेकर आए। फूल देने का अंदाजा ऐसे था, जैसे किसी ताबूत पर पुष्पचक्र भेंट करने आए हों। आधा दर्जन से ज्यादा दोस्त भी थे, जो वाकई में गमगीन थे। इनको सांत्वना देने के लिए अपने मुंह मियां मिठ्ïठु बनने में जुटा था। उनका दर्द था.. सर आप तो धरती के स्वर्ग कश्मीर में जा रहे हैं, लेकिन हम लोग की जिंदगी नरक हो जाएगी। जवाब था-बाबा विश्वनाथ का तुम्हारे सिर पर हाथ है, मस्त होकर काम करो। मैं उनको निराश नहीं देख सकता था,इसलिए शेखी बघारते हुए कहा काशी से कश्मीर कोई पत्रकारिता करने गया है? बाबू विष्णुराव पराडक़र से लेकर आज तक किसी का नाम जानते हो बतावो? इस सवाल पर सब चुप हो गए, दो मिनट की खामोशी के बाद बोले सर आपके साथ काम करने का आनंद अलग है। ढांढ़स और सांत्वना के बीच तबादले के पीछे आफिस की राजनीति के त्रिकोण के चौथे कोण की भी खोजबीन होती रही। इसी बीच जम्मू तवी एक्सप्रेस ने सीटी दे दी। सबसे गले लगने के बाद ट्रेन के दरवाजे पर खड़े होकर हाथ हिलाकर सबको विदा किया और जिंदगी की गाड़ी काशी से कश्मीर की ओर चल पड़ी।
सेना के जवान और माता रानी को दर्शन को जाने वाले श्रद्घालुओं से ट्रेन भरी थी। लोअर बर्थ होने के कारण खिडक़ी के किनारे बैठकर नई मंजिल,नई चुनौती,नई दिक्कतों के साथ दिमाग में इतने विचार आ रहे थे कि समझ में नहीं आ रहा था, क्या करें? क्या न करें? अखबार की नौकरी की भागदौड़ में मां का उचित इलाज न करा पाने के कारण खो देने के साथ ही मणिकर्णिका घाट पर अंतिम संस्कार तक का मंजर दु:स्वपन की सुनामी बनकर दिमाग में तबाही मचा रहा था। वैचारिक मंथन के बीच पिता जी का वह डायलाग भी याद आ रहा था,जब उनसे मिलने बस्ती स्थित घर गया, तो उन्होंने कहा कि नौकरी छोड़ दो, घर में खेती-बाड़ी कराना तो अखबार की नौकरी से ज्यादा ही तुम कमाओगे। जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी घटनाओं की आए दिन अखबार और टीवी में आने वाली खबरों के कारण पापा के प्यार को दिल की गहराई से महसूस कर रहा था। रुआंसे हो गए पापा को मनाने के लिए एक झूठ बोला। ..अमर उजाला सभी इलाके से एक-एक रिपोर्टर को आतंकवाद प्रभावित क्षेत्र में रिर्पोटिंग का अनुभव लेने के लिए भेज रहा है। आपके इस बेटे का चयन शशिशेखर(उस समय अमरउजाला के समूह संपादक) ने खुद पूर्वांचल से किया है। छह माह से एक साल के भीतर कोर्स कम्पलीट करके लौट आना है। बेटे के झूठ को बाप को पकड़ते देर नहीं लगी होगी,लेकिन वह मन मसोस कर अपना ध्यान देना, आंतकवाद वाले इलाकों में मत जाना, रोजाना फोन करते रहना, खाने-पीने में लापरवाही मत करना सहित ढेरों सीख
जेहन में तेज गति से दौड़ रहे थे। सवालों के साहिल में खुद को मंझधार में पा रहा था। ट्रेन तेज गति से पटरियों पर दौड़ रही थी,कब जौनपुर और सुलतानपुर निकल गया, पता ही नहीं चला। सूरज अस्ताचल की ओर चल दिए थे, ट्रेन लखनऊ के नजदीक आ गई थी। वहीं उलझन,वहीं सवाल के बीच जम्मू-कश्मीर में क्या करेंगे? क्या खबर हो सकती है? लखनऊ पहुंचते ही दिमाग में चकराने लगा था, एक चाय पीने के बाद फिर सीट पर आ गया। सोच-विचार में रात हो गयी थी। पत्नी ने रास्ते के लिए टिफिन रखा था। पूड़ी-सब्जी के साथ अपनी पसंदीदा स्वीट डिश लौंगलत्ता को देखकर जीभ में पानी आ गया। चार-पांच पूड़ी खाने के साथ पूरा लौंगलत्ता साफ करने के बाद फिर सोच के समंदर में डूब गया। मौसम ठंड का था लेकिन दिमाग गर्म हो गया था। कंबल ओढक़र सोचते-सोचते कब नींद आ गई पता ही नहीं चला। जब नींद खुली तो ट्रेन पंजाब में दाखिल हो चुकी थी। पंजाब और जम्मू-कश्मीर के बार्डर लखनपुर ट्रेन रुकी थी, पता किया तो जम्मू एक-दो घंटे में आने की जानकारी मिली। रात आठ बजे जम्मू स्टेशन पर ट्रेन रुकने के बाद दिल में बाबा विश्वनाथ के साथ माता रानी का नाम लिया। स्टेशन से जम्मू  के संपादक प्रमोद भारद्वाज को फोन लगाया। .. कडक़दार आवाज में हैलो सुनाई पड़ा.. प्रणाम सर, मैं दिनेश चंद्र मिश्र बोल रहा हूं, काशी से जम्मू-कश्मीर तबादला हुआ है। .. यह सुनकर उधर से जवाब मिला ..अरे तुम काशी से कश्मीर आ गए। कल सबेरे साढ़े दस बजे मीटिंग में आओ फिर बात होती है। साढ़े दस का मतलब साढ़े दस बजे याद रखना..ओके। ..ओके..गुडनाइट सर।
क्रमश:
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