रोमिंग जर्नलिस्ट

शनिवार, 31 दिसंबर 2011

थर्टी फर्स्ट की डर्टी मेमोरी पिक्चर

थर्टी फर्स्ट की डर्टी मेमोरी पिक्चर
इकतीस दिसबंर की तारीख दुनिया में भले ही जश्न का पर्व हो, लेकिन अखबारवालों के लिए कैसी होती है? यह बताने से पहले मैं उन भाइयों को गाली नहीं खाना चाहता हूं जो अपनी रात बर्बाद करके इस होटल से लेकर उस क्लब से तक नए साल के स्वागत की मस्ती के सुरुर को देखने के बाद उसको खबर के पैमाने में भरते हैं, ताकि संपादक के साथ पाठकों को भी इसका नशा सबेरे अखबार में दिखे। जश्न की ऐसी कई रातों का खुद भी साक्षी रहा। जम्मू-कश्मीर में भी वहीं मनहूस तारीख आ गयी जब अखबार के साथियों को खबर लिखने और पेज फाइनल करने के बीच में अगर अपने किसी खास का फोन आ गया तो शुभकामना के दो बोल भी नहीं बोल पाते हैं। इकतीस दिसंबर की मीटिंग में नए साल में रियासत को क्या नया मिलेगा इसकी न्यूज प्लानिंग के साथ संपादक प्रमोद भारद्वाज फोटोग्राफर अंकुर की तरफ मुखातिब हुए। फोटो क्या करोगे? सर जो प्रोग्राम होगा, उसकी अच्छी फोटो ले आऊंगा। मेरे दिमाग में एक शब्द गूंज रहा है गुड ब्वाय और गुड बाय। इसको पिक्चर में कैसे ढाला जा सकता है? कई आइडिया सामने आए लेकिन पसंद नहीं आया। मैं इसको लेकर क्या आइडिया हो? इसी सोच में डूबा था, तभी प्रमोद जी ने कहा कि दिनेश तुम बताओ, क्या हो सकता है। जब वह अपनी बात पूरी करते, मेरे दिमाग में एक आइडिया आ गया था। मैने कहा तवी नदी पत्थरों को चीरते हुए पत्थरों को लेकर बहती है। तवी के किनारे अंकुर किसी मासूम बच्चे को ले जाए और  छोटे-छोटे पत्थरों से गुड व्वाय और गुड बाय 2008 लिखने के बाद फोटो कर सकते हैं। यह आइडिया पसंद आते  ही अंकुर को इसे करने का फरमान जारी होने के साथ शाम को अच्छी फोटो आने पर इनाम देने की घोषणा के साथ मीटिंग खत्म। मीटिंग खत्म होने के बाद जम्मू के विक्रम चौक स्थित अमर उजाला दफ्तर से बिना लक्ष्य के रघुनाथ मार्केट की तरफ बढ़ चला। ठंड के मौसम में फर का जैकेट भी हल्का लग रहा था।  तवी नदी के पुल पर पहुंचने के बाद अचानक पैर थम गए। पत्थरों से टकराते हुए बह रही तवी की धारा देखकर सोचने लगा कि अपनी जिदंगी भी ऐसे छोटे-बड़े पत्थरों से टकराकर चलते जाने की भगवान ने लिख दी है। साल के आखिरी दिन सोचने लगा कि आखिर मैने क्या पाया? क्या खोया? बहुत देर तक काशी से जम्मू-कश्मीर आने के बारे में सोचता रहा? अपनी कमियों को ऊंगली के सहारे गिनने लगा तो हाथ-पैर की अंगुलियां कम पड़ गई। कमियों को गिनना छोडक़र माता रानी से प्रार्थना की कि अगर जाने-अनजाने में कोई गलती हो गयी हो तो माफ कीजिएगा। जिन्होंने मेरे साथ बुरा किया हो उनका भी बुरा न कीजिएगा लेकिन अच्छा भी न कीजिएगा। बाबा विश्वनाथ से लेकर माता रानी तक गुजर रहे साल की गलतियों के लिए दिल से माफी मांगने के बाद रघुनाथ मार्केट की तरफ बढ़ चला। बाजार में थर्टी फस्र्ट का सुरूर चढऩे से पहले की खूब चहल-पहल थी। चहल-पहल पता नहीं क्यों अच्छी लग रही थी। घर फोन किया तो कक्षा तीन में पढऩे वाली छोटी बेटी क्षमा ने फोन उठाते हुुए कहा कि आप कब आएंगे। मुझे अपनी सहेलियों को ग्रीटिंग कार्ड देना है। जल्द आने की बात कही तो वह गुस्सा होकर बोली आप क्रिसमस में भी नहीं आए मेला दिखाने। पापा आप बहुत झूठ बोलते हैं। उसको गाड प्रामिस किया कि जल्दी आएंगे। खबर की तलाश में सीबीआई एसपी आफिस पहुंच गया। सीबीआई के एसपी गौड़ साहब मौजूद थे। उनके साथ चाय की चुस्की लेकर जब एक साल में भ्रष्टïाचार के कितने मामले दर्ज हुए? यह जानने की कोशिश की तो पता चला कि जम्मू-कश्मीर के रहने वाले अधिकांश इंस्पेक्टर भ्रष्टïाचार का मुकदमा दर्ज करने की बजाए बाहर ही डील कर लेते हैं। एक साल में दर्ज हुए आंकड़ों का लेखा-जोखा लेकर शाम को ऑफिस आ गया।  सीबीआई की सालाना कुंडली के बाद दूसरे की खबरों की एडिट करने में लग गया। इसी बीच अंकुर फोटो लेकर आ गया था, संपादक के दिमाग के हिसाब से उसने फोटो खींचने में सफल रहा। तवी नदी के किनारे एक फटेहाल और एक खूबसूरत बच्चे को पत्थरों से गुड ब्वाय और गुड बाय लिखते हुए फोटो ले आया। फटेहाल बच्चे वाली फोटो यह कहकर खारिज हो गयी कि इसकी फोटो देखकर पाठकों के दिमाग में सवाल खड़ा होगा, क्या इसको अंग्रेजी आती है? मासूम बच्चे वाली फोटो फ्रंट पेज के लिए फाइनल हुई। अंकुर को सौ रुपए का नकद इनाम मिला। रात नौ बजे संपादक मुझे अपने कमरे में बुलाते हुए एक कार्ड थमाते हुए कहा कि दिनेश मैं चाहता हूं तुम थर्टी फस्र्ट को एंज्वाय करने के साथ इसकी एक खबर भी फाइल करो। अंकुर के साथ उस पार्टी में पहुंचा तो वहां का रंगीन माहौल देखकर लगा नहीं कि मंदिरों की नगरी जम्मू में हूं। अंकुर तो जाने के बाद अपने पीने के जुगाड़ में लग गया। सेना के रिटायर अफसर,  नेताओं के साथ पत्रकारों की मस्ती देखने लायक थी। ऐसी पार्टियों में जुगाड़ से दूर रहने की आदत नहीं है, फिर भी पता नहीं क्यों आज मन नहीं कर रहा था। अकेले बैठकर सिगरेट के कश उड़ा रहा था कि तभी अंकुर सूप का बाउल लेकर आया। बोला सर आप सूप लीजिए। सूप का पहला स्पून हलक में जाते रम का जायका समझ में आ गया, लेकिन उससे कुछ कहा नहीं। एक बाउल खत्म होने के बाद अंकुर से दूसरा भी लाने को कहा। इसी बीच जेके चैनल के एक रिपोर्टर एक खूबसूूरत महिला के साथ नजदीक आए, इनसे एक बार सीबीआई आफिस में मुलाकात हो चुकी थी। मेरी और मुखातिब होते हुए कहा कि इनसे मिलो यह मैडम सकीना। एक उर्दू अखबार की नुमाइंदा है। तुम्हारी खबरों को पढऩे के बाद मिलने की बात कई बार मुझसे की। आज तुम मिल ही गए। आउट आफ कंट्रोल हो चुकी मैडम सकीना ने हाथ मिलाने के बाद बगल में बैठ गयी। फारुख शेख से लेकर रुबिया सईद से तक दोस्ताना की बात कहते हुए ड्रिंक का आफर किया। सूप का दो पैग पहले ही ले चुका था, और लेने पर खुद आउठ आफ कंट्रोल होने के डर से इंकार कर दिया। मैडम शकीना से बातचीत का सिलसिला चल रहा था, इसी बीच फ्लोर पर डांस स्टार्ट हो गया। मैडम शकीना ने डांस का चांस देते हुुए कहा कम विथ मी। आफिस जाकर खबर लिखने का बयाना होने के कारण ..सारी बोला तो उसको बुरा लग गया। मेरे साथ डांस के लिए कितने लोग तरसते हैं तुम इंकार कर रहे हो। हिंदी,अंग्रेजी और उर्दू में ढेरों बातें सुनने के बाद दिल कर रहा था कि मैडम शकीना का दुरुस्त कर दिया जाए, लेकिन माता रानी के आर्शीवाद से गुस्से पर कंट्रोल हो गया। अंकुर को वहीं छोडक़र बाहर निकल आया। नए साल के स्वागत में अभी एक घंटे का समय का बाकी था। पैदल ही आफिस पहुंचकर खबर फाइल की। खबर कम्पलीट होने तक बारह बज गए थे। हैप्पी न्यू ईयर ..हैप्पी न्यू ईयर की गूंज होने लगी। हैप्पी न्यू ईयर के बीच शेरावाली मां का जयकारा सब मिलकर लगाए।  मां के जयकारा के बाद संपादक को गुड नाइट बोलकर चल दिया। विक्रम चौक से गांधीनगर तक की राह में माता रानी से नए साल का सूरज नई किरण लेकर आए यह प्रार्थना करता रहा।
क्रमश:

happy news year

गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

 
उत्तर में घोटाले करती मायावती महान है
दक्षिण में राजा-कनिमोझी करुणा की संतान है.
जमुना जी के तट को देखो कलमाडी की शान है
घाट-घाट का पानी पीते चावला की मुस्कान है.
देखो ये जागीर बनी है बरखा-वीर महान की
इस मिट्टी पे सर पटको ये धरती है बेईमान की.
बन्दों में है दम...राडिया-विनायकम्.
ये है अपना जयचंदानानाज़ इसे गद्दारीपे.
इसने केवल मूंग दला है मजलूमों की छाती पे.
ये समाज का कोढ़ पल रहासाम्यवाद के नारों पे
बदल गए हैं सभी अधर्मी भाडे के हत्यारे में .
हिंसा-मक्कारी ही अब,पहचान है हिन्दुस्तान की
इस मिट्टी पे सर पटको ये धरती है हैवान की.
बन्दों में है दम...राडिया-विनायकम्.
देखो मुल्क दलालों काईमान जहां पे डोला था.
सत्ता की ताकत को चांदी के जूतों से तोला था.
हर विभाग बाज़ार बना थाहर वजीर इक प्यादा था.
बोली लगी यहाँ सारे मंत्री और अफसरान की.
इस मिट्टी पे सर पटको ये धरती है शैतान की.
बन्दों में है दम...नंगेबेशरम....!

बुधवार, 16 नवंबर 2011

नेहरू खानदान यानी गयासुद्दीन गाजी का वंश


रोमिंग जर्नलिस्ट की  रिपोर्ट  24
नेहरू खानदान यानी गयासुद्दीन गाजी का वंश
जम्मू-कश्मीर में आए महीनों हो गए थे, एक  बात अक्सर दिमाग में खटकती थी कि अभी तक  नेहरू के खानदान का कोई क्यों नहीं मिला, जबकि  हमने किताबों में पढ़ा था कि  वह कश्मीरी पंडित थे। नाते-रिश्तेदार से लेकर दूरदराज तक  में से कोई न कोई नेहरू खानदान का तो मिलना ही चाहिए था। नेहरू राजवंश कि खोज में सियासत के  पुराने खिलाडिय़ों से मिला लेकिन जानकारी के नाम पर मोतीलाल नेहरू के पिता गंगाधर नेहरू  का नाम ही सामने आया। अमर उजाला दफ्तर के  नजदीक  बहती तवी के किनारे पहुंचकर एक  दिन इसी बारे में सोच रहा था तो ख्याल आया कि जम्मू-कश्मीर वूमेन कमीशन की  सचिव हाफीजा मुज्जफर से मिला जाए, शायद वह कुछ मदद  कर सके | अगले दिन जब आफिस से हाफीजा के  पास पहुंचा तो वह सवाल सुनकर चौंक  गई। बोली पंडित जी आप पंडित नेहरू के  वंश का  पोस्टमार्टम करने आए हैं क्या? हंसकर सवाल टालते हुए कहा कि मैडम ऐसा नहीं है, बस बाल कि खाल निकालने कि  आदत है इसलिए मजबूर हूं। यह सवाल काफी समय से खटक  रहा था। कश्मीरी चाय का  आर्डर देने के बाद वह अपने बुक रैक  से एक  किताब निकाली, वह थी रॉबर्ट हार्डी एन्ड्रूज कि  किताब ए लैम्प फार इंडिया- द स्टोरी ऑफ  मदाम पंडित। उस किताब मे तथाकथित गंगाधर का चित्र छपा था। जिसके  अनुसार गंगाधर असल में एक  सुन्नी मुसलमान थे जिनका असली नाम था गयासुद्दीन गाजी। इस फोटो को  दिखाते हुए हाफीजा ने कहा कि इसकी पुष्टि के लिए नेहरू ने जो आत्मकथा लिखी है, उसको पढऩा जरूरी है। नेहरू  की आत्मकथा भी अपने रैक से निकालते हुए एक  पेज को पढऩे को कहा।  इसमें एक जगह लिखा था कि उनके दादा अर्थात मोतीलाल के  पिता गंगा धर थे। इसी तरह जवाहर की बहन कृष्णा ने भी एक  जगह लिखा है कि उनके दादाजी मुगल सल्तनत बहादुरशाह जफर के  समय में नगर कोतवाल थे। अब इतिहासकारो ने खोजबीन की तो पाया कि बहादुरशाह जफ र के  समय कोई भी हिन्दू इतनी महत्वपूर्ण ओहदे पर नहीं था। और खोजबीन करने पर पता चला कि उस वक्त के  दो नायब  कोतवाल हिन्दू थे नाम थे भाऊ सिंह और काशीनाथ जो कि लाहौरी गेट दिल्ली में तैनात थे। लेकिन किसी  गंगा धर नाम के  व्यक्ति का कोई रिकार्ड  नहीं मिला है। नेहरू राजवंश की खोज में मेहदी हुसैन की  पुस्तक  बहादुरशाह जफर और 1857 का गदर में खोजबीन करने पर मालूम हुआ।  गंगा धर नाम तो बाद में अंग्रेजों के कहर के डर से बदला गया था,असली नाम तो था गयासुद्दीन गाजी। जब अंग्रेजों ने दिल्ली को  लगभग जीत लिया था तब मुगलों और मुसलमानों के  दोबारा विद्रोह के  डर से उन्होंने दिल्ली के सारे हिन्दुओं और मुसलमानों को शहर से बाहर करके  तम्बुओं में ठहरा दिया था। जैसे कि आज कश्मीरी पंडित रह रहे हैं। अंग्रेज वह गलती नहीं दोहराना चाहते थे जो हिन्दू राजाओं-पृथ्वीराज चौहान ने मुसलमान आ•्रांताओंजीवित छोडकर की थी,इसलिये उन्होंने चुन-चुन कर मुसलमानों को  मारना शुरु किया । लेकिन कुछ  मुसलमान दिल्ली से भागकर पास के  इलाको मे चले गये थे। उसी समय यह परिवार भी आगरा की  तरफ कुच कर गया। नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि आगरा जाते समय उनके दादा गंगा धर को  अंग्रेजों ने रोककर  पूछताछ की थी लेकिन  तब गंगा धर ने उनसे  कहा था कि वे मुसलमान नहीं हैं कश्मीरी पंडित हैं और अंग्रेजों ने उन्हें आगरा जाने दिया बाकी तो इतिहास है ही । यह धर उपनाम कश्मीरी पंडितों में आमतौर पाया जाता है और इसी का  अपभ्रंश होते-होते और धर्मान्तरण होते-होते यह दर या डार हो गया जो कि कश्मीर के  अविभाजित हिस्से में आमतौर पाया जाने वाला नाम है। लेकिन मोतीलाल ने नेहरू उपनाम चुना ताकि यह पूरी तरह से हिन्दू सा लगे। इतने पीछे से शुरुआत करने  का मकसद सिर्फ  यही है कि हमें पता चले कि खानदानी लोगों कि असलियत क्या होती है। 
एक कप चाय खत्म हो गयी थी, दूसरी का  आर्डर हाफीजा ने देते हुए के एन प्राण कि  पुस्तक  द नेहरू डायनेस्टी निकालने के  बाद एक  पन्ने को  पढऩे को दिया। उसके अनुसार जवाहरलाल मोतीलाल नेहरू के  पुत्र थे और मोतीलाल के  पिता का  नाम था गंगाधर । यह तो हम जानते ही हैं कि  जवाहरलाल कि  एक  पुत्री थी इन्दिरा प्रियदर्शिनी नेहरू । कमला नेहरू उनकी माता का  नाम था। जिनकी मृत्यु स्विटजरलैण्ड में टीबी से हुई थी। कमला शुरु से ही इन्दिरा के  फिरोज से विवाह के  खिलाफ थीं क्यों यह हमें नहीं बताया जाता। लेकिन यह फि रोज गाँधी कौन  थे? फिरोज उस व्यापारी के  बेटे थे जो आनन्द भवन में घरेलू सामान और शराब पहुँचाने का काम करता था। आनन्द भवन का  असली नाम था इशरत मंजिल और उसके  मालिक थे मुबारक अली। मोतीलाल नेहरू पहले इन्हीं मुबारक  अली के  यहाँ काम करते थे। सभी जानते हैं की  राजीव गाँधी के  नाना का नाम था जवाहरलाल नेहरू लेकिन  प्रत्येक  व्यक्ति के  नाना के  साथ ही दादा भी तो होते हैं। फि र राजीव गाँधी के  दादाजी का  नाम क्या था? किसी  को  मालूम नहीं, क्योंकि राजीव गाँधी के  दादा थे नवाब खान। एक  मुस्लिम व्यापारी जो आनन्द भवन में सामान सप्लाई करता था और जिसका मूल निवास था जूनागढ गुजरात में है। नवाब खान ने एक  पारसी महिला से शादी की और उसे मुस्लिम बनाया। फिरोज इसी महिला की  सन्तान थे और उनकी माँ का उपनाम था घांदी (गाँधी नहीं)घांदी नाम पारसियों में अक्सर पाया जाता था। विवाह से पहले फि रोज गाँधी ना होकर फिरोज खान थे और कमला नेहरू के विरोध का असली कारण भी यही था। हमें बताया जाता है कि फिरोज गाँधी पहले पारसी थे यह मात्र एक भ्रम पैदा किया  गया है । इन्दिरा गाँधी अकेलेपन और अवसाद का  शिकार थीं । शांति निकेतन में पढ़ते वक्त ही रविन्द्रनाथ टैगोर ने उन्हें अनुचित व्यवहारके  लिये निकाल बाहर  किया था। अब आप खुद ही सोचिये एक तन्हा जवान लडक़ी जिसके पिता राजनीति में पूरी तरह से व्यस्त और माँ लगभग मृत्यु शैया पर पड़ी हुई हों थोडी सी सहानुभूति मात्र से क्यों ना पिघलेगी विपरीत लिंग की ओर, इसी बात का  फायदा फिरोज खान ने उठाया और इन्दिरा को  बहला-फुसलाकर उसका धर्म परिवर्तन करवाकर लन्दन की  एक मस्जिद में उससे शादी रचा ली। नाम रखा मैमूना बेगम। नेहरू को  पता चला तो वे बहुत लाल-पीले हुए लेकिन  अब क्या किया  जा सकता था। जब यह खबर मोहनदास करमचन्द गाँधी को  मिली तो उन्होंने नेहरू को  बुलाकर समझाया। राजनैतिक छवि की  खातिर फिरोज को  मनाया कि वह अपना नाम गाँधी रख ले, यह एक  आसान काम  था कि एक  शपथ पत्र के जरिये बजाय धर्म बदलने के  सिर्फ  नाम बदला जाये तो फिरोज खान घांदी बन गये फिरोज गाँधी। विडम्बना यह है कि  सत्य-सत्य का  जाप करने वाले और सत्य के  साथ मेरे प्रयोग नामक आत्मकथा लिखने वाले गाँधी ने इस बात का  उल्लेख आज तक नहीं नहीं किया। खैर उन दोनों फिरोज और इन्दिरा को  भारत बुलाकर जनता के  सामने दिखावे के  लिये एक  बार पुन: वैदिक  रीति से उनका विवाह करवाया गया ताकि  उनके  खानदान की ऊँची नाक का भ्रम बना रहे । इस बारे में नेहरू के  सेकेरेटरी एम.ओ.मथाई अपनी पुस्तक  प्रेमेनिसेन्सेस ऑफ  नेहरू एज ;पृष्ट 94 पैरा 2 (अब भारत में प्रतिबंधित है किताब) में लिखते हैं कि  पता नहीं क्यों नेहरू ने सन 1942 में एक  अन्तर्जातीय और अन्तर्धार्मिक  विवाह को  वैदिक  रीतिरिवाजों से किये  जाने  को अनुमति दी जबकि उस समय यह अवैधानिक  था का कानूनी रूप से उसे सिविल मैरिज होना चाहिये था । यह तो एक  स्थापित तथ्य है कि राजीव गाँधी के जन्म के कुछ  समय बाद इन्दिरा और फि रोज अलग हो गये थे हालाँकि तलाक  नहीं हुआ था । फि रोज गाँधी अक्सर नेहरू परिवार को पैसे माँगते हुए परेशान  किया करते थे और नेहरू की राजनैतिक  गतिविधियों में हस्तक्षेप तक करने लगे थे। तंग आकर नेहरू ने फिरोज के  तीन मूर्ति भवन मे आने-जाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था । मथाई लिखते हैं फिरोज की मृत्यु से नेहरू और इन्दिरा को  बड़ी राहत मिली थी। 1960 में फिरोज गाँधी की  मृत्यु भी रहस्यमय हालात में हुई थी जबकी  वह दूसरी शादी रचाने की  योजना बना चुके  थे। संजय गाँधी का  असली नाम दरअसल संजीव गाँधी था अपने बडे भाई राजीव गाँधी से मिलता जुलता । लेकिन संजय नाम रखने की  नौबत इसलिये आई क्योंकि उसे लन्दन पुलिस ने इंग्लैण्ड में कार चोरी के आरोप में पकड़ लिया था और उसका पासपोर्ट जब्त कर लिया था। ब्रिटेन में तत्कालीन  भारतीय उच्चायुक्त कृष्ण मेनन ने तब मदद करके संजीव गाँधी का  नाम बदलकर नया पासपोर्ट संजय गाँधी के  नाम से बनवाया था, इन्हीं कृष्ण मेनन साहब को  भ्रष्टाचार के  एक  मामले में नेहरू और इन्दिरा ने बचाया था । अब संयोग पर संयोग देखिये संजय गाँधी का  विवाह मेनका आनन्द से हुआ। कहा जाता है मेनका जो कि एक  सिख लडकी थी संजय की  रंगरेलियों की  वजह से उनके पिता कर्नल आनन्द ने संजय को  जान से मारने की  धमकी दी थी फि र उनकी शादी हुई और मेनका का  नाम बदलकर मानेका किया गया क्योंकि इन्दिरा गाँधी को  यह नाम पसन्द नहीं था। फिर भी मेनका कोई  साधारण लडकी नहीं थीं क्योंकि उस जमाने में उन्होंने बॉम्बे डाईंग के  लिये सिर्फ  एक  तौलिये में विज्ञापन किया था। आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि  संजय गाँधी अपनी माँ को  ब्लैकमेल करते थे और जिसके कारण उनके सभी बुरे कामो पर इन्दिरा ने हमेशा परदा डाला और उसे अपनी मनमानी करने कि छूट दी । एम.ओ.मथाई अपनी पुस्तक के पृष्ठ 206 पर लिखते हैं - 1948 में वाराणसी से एक  सन्यासिन दिल्ली आई जिसका काल्पनिक  नाम श्रद्धा माता था। वह संस्कत की विद्वान थी और कई सांसद उसके व्याख्यान सुनने को  बेताब रहते थे । वह भारतीय पुरालेखों और सनातन संस्कृत   की  अच्छी जानकार  थी। नेहरू के पुराने कर्मचारी एस.डी.उपाध्याय ने एक  हिन्दी का  पत्र नेहरू  को सौंपा जिसके कारण नेहरू उस सन्यासिन को एक  इंटरव्यू देने  को राजी हुए । चूँकि देश तब आजाद हुआ ही था और काम बहुत था। नेहरू ने अधिकतर बार इंटरव्य़ू आधी रात के  समय ही दिये । मथाई के  शब्दों में  एक  रात मैने उसे पीएम हाऊस से निकलते देखा वह बहुत ही जवान खूबसूरत और दिलकश थी। एक  बार नेहरू के  लखनऊ दौरे के  समय श्रध्दामाता उनसे मिली और उपाध्याय जी हमेशा की तरह एक  पत्र लेकर नेहरू के  पास आये नेहरू ने भी उसे उत्तर दिया और अचानक  एक  दिन श्रद्धा माता गायब हो गईं किसी के ढूँढे से नहीं मिलीं । नवम्बर 1949 में बेंगलूर के  एक कान्वेंट से एक  सुदर्शन सा आदमी पत्रों का  एक  बंडल लेकर आया। उसने कहा कि उत्तर भारत से एक  युवती उस कान्वेंट में कुछ  महीने पहले आई थी और उसने एक  बच्चे को  जन्म दिया । उस युवती ने अपना नाम पता नहीं बताया और बच्चे के  जन्म के तुरन्त बाद ही उस बच्चे को  वहाँ छोडकर  गायब हो गई थी । उसकी निजी वस्तुओं में हिन्दी में लिखे कुछ  पत्र बरामद हुए जो प्रधानमन्त्री द्वारा लिखे गये हैं पत्रों का  वह बंडल उस आदमी ने अधिकारियों के सुपुर्द कर  दिया । मथाई लिखते हैं . मैने उस बच्चे और उसकी माँ की खोजबीन की काफी कोशिश की लेकिन कान्वेंट की मुख्य मिस्ट्रेस जो कि एक  विदेशी महिला थी बहुत कठोर अनुशासन वाली थी और उसने इस मामले में एक  शब्द भी किसी से नहीं क हा लेकिन मेरी इच्छा थी  कि उस बच्चे का पालन-पोषण मैं करुँ और उसे रोमन  कथोलिक संस्कारो  में बड़ा करूँ चाहे उसे अपने पिता का नाम कभी भी मालूम ना हो लेकिन विधाता को यह मंजूर नहीं था। नेहरू राजवंश की कुंडली जानने के बाद घड़ी की तरफ देखा तो शाम पांच बज गए थे, हाफीजा से मिली ढेरों प्रमाणिक  जानकारी के लिए शुक्रिया अदा करना दोस्ती के वसूल के खिलाफ था, इसलिए फिर मिलते हैं कहकर चल दिए अमर उजाला जम्मू दफ्तर की ओर।  
•्रमश:

शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

वंश-मेव-जयते


 वंश-मेव-जयते
आजादी के  इतने वर्षों बाद भी हम भ्रांति में ही हैं कि  हम धुर चाटुकार हैं या देश के एक  खास घराने के  गुलाम। देश के  पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की राजनीति•-पारिवारिक  विरासत को  पहले उनकी पुत्री इंदिरा गांधी ने आगे बढ़ाया फिर इंदिरा के पुत्र राजीव गांधी ने और अब सोनिया गांधी तथा राहुल गांधी उसी पारिवारिक  परम्परा को आगे बढ़ाने में जुटे हैं। क्या नेहरू, इंदिरा, राजीव की शख्सियत देश के अन्य सभी महापुरुषों और यहां तक  कि महात्मा गांधी से भी बड़ी हो गई थी कि नेहरू खानदान के कर्णधारों के  सामने देश के  सभी महापुरुष या नेता बौने नजर आने लगे? अन्य नेताओं महापुरुषों का कद बौना करने की नीयत से ही वंश-मेव-जयते देश में चल रही अरबों रुपए  की केन्द्रीय व राज्य सरकार की  तमाम योजनाएं, पुरस्कर , सडक़ें, संस्थान, स्टेडियम सब कुछ  नेहरू और नेहरू खानदान के  नुमाइंदों के  नाम पर चल रहे हैं। इन योजनाओं में से 90 जवाहर लाल नेहरू, 138 इंदिरा गांधी व 197 राजीव गांधी के  नाम हैं। केवल एक  संस्थान इंदिरा गांधी की मां कमला नेहरू के  नाम पर है। डॉ. राजेंद्र प्रसाद, लाल बहादुर शास्त्री , नेताजी सुभाषचंद्र बोस, सरदार वल्लभ भाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे महापुरुष देश के लोगों के  दिलों पर भले ही अब भी राज क रते हों, लेकिन  राज चलाने वालों के दिल पर इससे कोई फर्क  नहीं पड़ता, वे केवल दिमाग से चलते हैं वह भी शातिराना बुद्धि से। आज तक  इन महापुरुषों के  नाम पर किसी भी प्रकार की कोई  विशेष सरकरी योजना न तो केंद्र  सरकार की ओर से चलाई गई और न किसी भी राज्य सरकार की  तरफ से। शहीदे आजम भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खां, सुखदेव, राजगुरु, खुदीराम बोस, लाला लाजपत राय, वीर सावरकर, बाल गंगाधर तिलक, गोपाल कष्ण गोखले जैसे आजादी के  अनगिनत दीवानों का  तो इतिहास से नाम ही खत्म करने की  साजिश रची जा रही है। उनके नाम पर टूटे-फूटे स्मारक व दुर्गति को  पहुंचती मूर्तियां हैं। यही क्या कम हैं? हैरत और मजे दोनों  की बात यह है क़ि जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी व राजीव गांधी के  नाम पर अफगानिस्तान, मासको , मारीशस यहां तक क़ि पाकिस्तान  जैसे देश में भी संस्थाएं या पुरस्रकार  वगैरह चल रहे हैं लेकिन  नेहरू के  गृह राज्य जम्मू-कश्मीर में केवल एक  टनल और दो पार्को के  नाम नेहरू पर हैं लेकिन  एक भी जनहित योजना से नेहरू का नाम संलग्न करने से परहेज रखा गया है।

गुरुवार, 1 सितंबर 2011

करप्शन में भी स्वर्ग है कश्मीर


‘धरती में अगर कहीं स्वर्ग है तो कश्मीर में है’ बचपन में स्कूल में मिली इस जानकारी में कश्मीर पहुंचने के बाद और इजाफा हो गया। यद्यपि यह इजाफा उस स्वर्ग से कोई ताल्लुक नहीं रखता था, जिसकी दुनिया मुरीद है। जिंदगी के खौफ और पैसे के लालच में मीडिया को अलगाववादी संगठनों के इशारे पर नाचते देखने की आदत और अपरोक्ष रुप से उसका हिस्सा बनना नियति बन गई थी। लालू राज में साथियों द्वारा बिहार को भ्रष्टï राज्य कहने की बात न चाहते हुए भी इत्तेफाक करना पड़ता था। पर कश्मीर में करप्शन का जो हाल देखा, उसे देखकर सोच ही बदल गयी। केंद्र सरकार द्वारा कश्मीर में विकास और विस्थापितों के पुर्नवास के नाम पर दिए जाने अरबों रुपए भ्रष्टïाचार की कोख में कैसे चले जाते हैं? इसका नमूना किसी भी महकमे में विकासकार्यों का भौतिक सत्यापन करके जाना जा सकता है। जम्मू में तैनात सीबीआई के एसपी गौड़ साहब से मिले इस तथ्य की पड़ताल करने के लिए इंटरनेट को हथियार बनाया। जम्मू-कश्मीर सरकार की वेबसाइट से कुछ विभागों का डाटा एकत्र करने के बाद मौके पर जाकर देखने का फैसला किया। श्रीनगर में अमर उजाला के ब्यूरोचीफ के साथ जिन जगहों को पहले चिन्हित किया था तो वहां जाने पर पता चला कि कोई काम हुआ ही नहीं लेकिन भुगतान हो चुका है। भ्रष्टïाचार का आलम यह था बारामूला से शेखपुरा तक शेखपुरा से बारामूला तक एक ही रोड मरम्मत को दोनों तरफ से पैसा पास हुआ कि लेकिन काम नहीं हुआ। काम के नाम पर नतीजा सिफर। ऐसे ढेरों नमूने के देखने के बाद ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की एक रिपोर्ट हाथ लगी, जिसमे करप्शन के मामले में देश में सबसे आगे जम्मू-कश्मीर का जिक्र था। भ्रष्टïाचार तो भारत की नस-नस में व्याप्त है लेकिन कश्मीर में जिस तरह भ्रष्टïाचार महामारी के रूप में फैला है उसको नजदीक से जाकर ही अनुभव किया जा सकता है। सेना को अगर हटा दिया जाए तो जम्मू-कश्मीर का भ्रष्टï तंत्र कब कश्मीर को पाकिस्तान के हवाले कर देगा, कहां नहीं जा सकता है। कश्मीर में भ्रष्टïाचार सरकारी कामकाज से लेकर आम आदमी की जिंदगी में रोजमर्रा का हिस्सा बन गया है।  
कश्मीर में भ्रष्टïाचार सबसे ज्यादा होने के बावजूद इसके खिलाफ आवाज उठाने वाला कोई भी दिखाई नहीं पड़ता। उत्तर भारत में ट्रैफिक सिपाही द्वारा दस-बीस रुपए वसूलने पर ब्रेकिंग न्यूज टाइप की खबर अक्सर छपती है, वहीं जम्मू-कश्मीर में मीडिया की सारी हेकड़ी विलुप्त हो जाती है। यह बात समझ से परे थी। भ्रष्टïाचार के ऐसे कई मामलों की पड़ताल करने पर पता चला कि  करप्शन में लिप्त अधिकांश लोग अलगाववादी संगठनों से किसी न किसी रूप से जुड़े हुए हैं। केंद्र सरकार के पैसे को हजम करके भारत के खिलाफ ही उपद्रव करने का जो खुला खेल कश्मीर में सियासत के साये में पल बढ़ रहा था, उसे देखकर बहुत कोफ्त हुई। भ्रष्टïाचार के ऐसे कई खेलों को उजागर करने के लिए एक न्यूज स्टोरी बनायी। करप्शन करने वालों के लिए कश्मीर किस तरह स्वर्ग बना हुआ है। भ्रष्टïाचार के चंद नमूनों के साथ खबर को तैयार करके उसमे उन अलगाववादी नेताओं का भी जिक्र किया, जिनके गुर्गे इस काम में लिप्त थे। संपादक प्रमोद भारद्वाज को खबर दी तो उन्होंने तारीफ करते हुए कहा कि नोएडा खबर भेजनी होगी। नोएडा में शशि शेखर के ध्यानार्थ खबर भेजने की बात सुनने के बाद यह बात दिमाग में आयी कि यह खबर भी बिना छपे ही दफन हो जाएगी। खैर खबर जाने के दो घंटे बाद ही आशंका सच साबित हुई। शशि शेखर का संदेश मिला कि दिनेश से बोल दो ज्यादा क्रांतिकारी ना बने। मेहनत करके कोई खबर बनने के बाद जब उसके साथ ऐसा सलूक होता है तो दर्द वैसा ही होता है जैसे किसी बच्चे की अजन्मी मृत्यु हो गयी है। ‘खबर’ की ऐसी-तैसी करने के बाद आफिस में रुटीन काम निपटाने में जुट गया। खबर न छपने की बात साथियों को पता चली तो वे सांत्वना व्यक्त करने आ गए बोले भाई साहब यहां चाहकर भी कुछ अलग हटकर नहीं किया जा सकता है। जान का खतरा है सो अलग। उनकी बातों को सिर हिलाते हुए सुनता रहा। मूड पूरी तरफ आफ था। दिमाग में गुस्सा और क्या करें, क्या ना करे? के नकारात्मक ख्याल आ रहे थे। दिमाग को संतुलित करने के लिए तवी मइया के चरणों में जाने को अग्रसर हुआ। रात के आठ बज रहे थे, पैदल तवी के किनारे जाना मुनासिब नहीं था, लिहाजा तवी के पुल के ऊपर सोच-विचार के आलोडऩ-बिलोडऩ के साथ टहलने लगा। जम्मू-कश्मीर आने के बाद घर की चिंता, पिता जी की नौकरी छोडऩे की सीख के साथ घड़ी पर नजर डाली तो नौ बजने वाले थे। दिसंबर का आखिरी सप्ताह होने के कारण ठंड का असर बढऩे लगा था। तवी नदी के पुल पर वाहनों की संख्या कम हो चली थी। केवल सेना के वाहनों की ही आवाजाही चल रही थी। मैँ आफिस की और लौट पड़ा।
सिटी एडीशन छूटने के साथ जब आफिस से निकला तो रात के एक बज चुका था। मैं अनिमेष और योगेंद्र रोजाना की तरह पैदल घर की तरफ चल पड़े। पुलिस लाइन गेट पर लगी घड़ी तापमान पर नजर पड़ी तो माइनस चार डिग्री सेल्सियश दिखा रही थी। जिससे ठंड का अहसास बढ़ गया। सेना के बैरियर और चेकपोस्ट पार करते हुए घर पहुंचने के बाद रजाई में पर खबर न छपने का दर्द और भी तीव्रता के साथ दिल-दिमाग पर छाने लगा। माता रानी से प्रार्थना की  अब अपना आर्शीवाद दे दो मां। प्रार्थना में व्यवधान उस समय पड़ा जब मोबाइल में एसएमएस टोन बजी। देखा तो बनारस के एक मित्र का नए साल का अग्रिम बधाई संदेश था। जवाब देने का मूड नहीं हुआ। मोबाइल साइलेंट मोड में डालने के बाद सोने की कोशिश में लग गया। न जाने कब नींद आ गयी। सबेरे आंख खुली तो गुलाबी धूप छत पर पसरी हुई थी। फ्रेश होने के बाद आज क्या किया जाए? इसी सोच-विचार में तैयार होकर आफिस से निकल पड़ा। आफिस में मीटिंग के दौरान प्लानिंग पर चर्चा के बाद जम्मू-कश्मीर में हर महीने लोग बातचीत में मोबाइल पर कितना खर्च करते हैें? यह जानने के लिए मोबाइल कंपनियों के दफ्तर का चक्कर काटने निकल पड़ा। मोबाइल कंपनियों के दफ्तर में जाने पर खबर की खोजबीन में एक ऐसी खबर हाथ लग गयी जो राष्टï्र हित में उजागर करना अत्यंत आवश्यक था....

क्रमश:

शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

कश्मीर में पत्रकारिता का ‘बिकाऊ सच’



काशी में कोतवाल हो या कलाकार, किसी का भी पुतला फूंकनेे वाले लोगों की एक जमात है। इस जमात को औपचारिकता का बाना पहनाने के लिए किसी न किसी संगठन का नाम दे दिया जाता है। दुनिया में अगर कोई घटना होती है तो ऐसे संगठन पुतला फूंकनेे को तैयार रहते हंै, बस इंतजार होता है प्रेस फोटोग्राफरों के फोन आने का। पुतला फूंकने में माहिर संगठनों की चुस्ती-फुर्ती का दर्जनों बार चश्मदीद रहा हूं। कभी पुतला बनने के बाद दर्जनभर लोगों को बटोरकर जिंदाबाद-मुर्दाबाद करने के इंतजाम में देर होता तो मीडिया से जुड़े बंधु चाय-पान की खातिरदारी करने के साथ ..जल्दी करो बहुत काम है  का शोर मचाते रहते थे।  काशी से कश्मीर पहुंचने के बाद मीडिया के जिस पहलू से वाकिफ हुआ, वह काफी चौकाने वाला था। दो दिन की छुट्ïटी लेकर जम्मू से श्रीनगर पहुंचने के बाद वहां की खूबसूरती का कायल हो गया। चिनार के पेड़, बर्फीली वादियों के बीच जम्मू कश्मीर वूमेन कमीशन की सेक्रेटरी हाफीजा मुज्जफर की मेजबानी का लुत्फ उठा रहा था। डल झील को सिर्फ फोटो में ही देखता रहा हूं। चाहे जाड़ों में बर्फ जमने की या उस पर हाउसबोट में सैलानियों की। इसलिए पहली बार नजदीक से देखने के बाद आंखों में खूबसूरती का अद्भूत दरिया बहने लगा। दिल के अंदर इस मंजर के साथ आंखों की टानिक के लिए कश्मीर की खूबसूरत औरतों का प्राकृतिक सौन्दर्य देखकर अचानक सन्ï 1996 याद आ गया। सन्ï 96 में कश्मीर में सेना की तैनाती के साथ जवानों द्वारा वहां की महिलाओं के साथ बदसलूकी की कथित घटनाओं के पीछे का कारण भी समझ में आने लगा था। कश्मीरी औरतों की खूबसूरती को एकटक निहारते देखकर हाफीजा ने मेरा ध्यान बंटाने के लिए आंखों के सामने चुटकी बजाते हुए पूछा कहां खो गए हैं हुजूर? हाफीजा का यह अंदाज पसंद आया.. बोला कश्मीर की कली से लेकर खूबसूरत फूल तक देख रहा हूं। यह सुनकर वह बोली अब इस खूबसूरती पर दुनिया की बुरी नजर लग गयी है। कश्मीर की भोली-भाली लड़कियों को नौकरी के लालच में फंसाकर सेक्स के धंधे में धकेल देने का मामला, सीबीआई की जांच और मिस अनारा का एमएमएस कांड इन सब विषयों पर चर्चा प्रारंभ हुई तो बातचीत यहां तक पहुंच गयी कि दुनिया में कश्मीरी औरतों की मांग सबसे ज्यादा क्यों है? इस विषय पर चर्चा काफी देर तक चली। कश्मीर में डल झील पर घूमने के साथ चरमपंथी नेताओं से मिलने की इच्छी ही श्रीनगर खींचकर लायी थी। श्रीनगर में हिंदी अखबारों के कुछ पत्रकारों से मुलाकात करने के बाद यहां होने वाली छोटी-मोटी घटनाओं में सेना को बदनाम करने तथा मानवाधिकार उल्लंघन का बखेड़ा करने के पीछे की कहानी जानने की दिलचस्पी थी। अमर उजाला के श्रीनगर ब्यूरो के इंचार्ज रहे कानपुर के शैलेंद्र शुक्ला ने इस मसले पर गिलानी, यासीन मालिक जैसे नेताओं की फितरत और मीडिया में टेरर मैनेजमेंट के पीछे की जो असलियत उजागर की थी, वह हैरतअंगेज थी। पाकिस्तान से रूपये लेकर पूरे विश्व में कश्मीर मुद्ïदे पर ध्यान आकर्षित करने के लिए मीडिया मैनेजमेंट के खेल में अलगाववादी संगठनों के मुखिया का अहम रोल है। विभिन्न समाचारपत्र और टीवी चैनलों में काम करने वाले पत्रकारों को जिस तरह यूपी में पुलिस स्टेशन पर गलत काम करने वाले महीना रकम बांध लेते हैं, उसी तरह यहां के अधिकांश जर्नलिस्ट अलगाववादी संगठनों के इशारे पर पेड रिपोर्ट करते हैं। इनके एजेंट कई चैनलों और पत्रकारों को भारी धनराशि देकर कश्मीर में कट्ïटरपंथियों का पक्ष मजबूती से परोसने को मजबूर करते हैं, जो ऐसा नहीं करते हैं, उनको आंतकी संगठनों की और से जान से मारने की धमकी दी जाती है। अमर उजाला जम्मू संस्करण को ऐसी कई धमकियां मिल चुकी थी। दैनिक जागरण के एक खबरनवीस ने तो इस माहौल में रहकर उनके बीच काम करने के लिए अपने नाम के आगे एक नया शब्द भी जोड़ लिया। पाकिस्तान से भारत में आकर आतंक मचाने वाले आतंकियों की घुसपैठ को रोकने के लिए सेना जब तलाशी अभियान चलाती है तो उसका विरोध करने के लिए भाड़े पर युवकों के साथ भाड़े की मीडिया को बटोरकर उसकी ऐसी फुटेज बनवायी जाती है, जिससे लगे कि श्रीनगर में सेना आम लोगो को कितना प्रताडि़त कर रही है। सेना की छवि को धक्का पहुंचाने में कश्मीर की भाड़े पर काम करने वाली मीडिया का बहुत बड़ा रोल है। कश्मीर में सेना से जुड़ी घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने के साथ दुनियाभर के टीवी चैनलों और एजेंसियों को  फुटेज और फोटो बेचकर हजारों की कमाई करते हैं। कश्मीर में आईएसआई के इशारे पर काम करने वाली पत्रकारिता का ‘बिकाऊ सच’ जानकर दिल में बहुत कोफ्त हुआ। कश्मीर के साढ़े तीन लाख पंडितों को खदेड़ दिया गया, उनकी खोज-खबर लेने से दूर रहने वाली मीडिया के कारिंदों की काली करतूत देखने के बाद और भी गुस्सा आया। पैसे लेकर दुनिया में हिंदुस्तान की छवि बिगाडऩे वाली कश्मीर की मीडिया के हाल पर क्षोभ हुआ। अगले दिन गिलानी से मिलने की बात सोची। सेना और उसके प्राइवेट कारिंदों की तलाशी के बाद उनके दरबार-ए-खास में पहुंचा। उसके पहले ही विजीटिंग कार्ड भिजवाया। आधे घंटे इंतजार के बाद गिलानी साहब सफेद दाढ़ी को सहलाते हुए बाहर आए।  दरबार-ए-खास में मौजूद सब लोग आदाब..आदाब कहते हुए खड़े हो गए, मैं अपने जगह पर बैठा ही रहा। शाही कुर्सी पर बैठने के बाद गिलानी ने रौबदार आवाज में कहा कि सुना है कोई अखबार का नया नुमाइंदा आया है। मैने उतनी ही रौबदार आवाज में कहा मैं हूं जनाब, नाम है दिनेश चंद्र मिश्रा। अमर उजाला में हूं, काशी से कश्मीर आया हूं। आवाज अपनी भी बचपन ही तेज है, माता जी कहा करती थी लगता है गुल्लू(घर का नाम) तुम्हारे गले में दाई ने अंगुली की जगह बांस डाल दिया है। गिलानी की आवाज का प्रतिउत्तर उससे भी तेज आवाज में देने पर  बड़े गौर से देखने के बाद बोला एक और पंडित आ गया। पंडितों के प्रति उनका उपेक्षापूर्ण भाव देखकर कहा कि लगता है आपको पंडितों से बहुत नफरत है। जवाब में उन्होंने कहा जनाब नफरत आज से नहीं है, नेहरू के जमाने से है। नेहरू को लेकर गिलानी अपना विष वमन करते रहे। उनकी सुनने के बाद कुछ सवाल किया तो जवाब था इंडिया गर्वमेंट सोने की सडक़ भी बनवा दे तब भी कुछ नहीं हो सकता है। दुनिया कश्मीर में भारत सरकार के इशारे पर सेना क्या कर रही है, इसे देख रही है। गिलानी द्वारा मीडिया के कंधे पर बंदूक रखकर कश्मीर की गोली चलाना पसंद नहीं आया। मैने कहा मीडिया कैसे कौन सी खबर रिलीज करती है, इससे रियासत में आने के बाद बखूबी वाकिफ हो गया हूं। एक घंटे गिलानी के साथ बिताने के बाद खबर के नाम पर उसने जो जहर उगला वह छापने लायक नहीं था। कश्मीर में मीडिया का ‘बिकाऊ सच’ देखने के बाद माता रानी से प्रार्थना की कि ‘हिंदुस्तान की रोटी खाकर पाकिस्तान के लिए काम करने वाले कुत्तों को सद्ïबुद्घि दें। ’ इति!!
क्रमश .....

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

ठग कौन? दिग्विजय सिंह या अन्ना व रामदेव


दिग्विजय सिंह उर्फ दिग्गी राजा अपने कुतर्कों और बेतुके बयानों के लिए जाने जाते हैं। सभी लोग अच्छी तरह से जानते हैं कि उन्हें एक तरफ हिन्दू संगठनों से एलर्जी है तो दूसरी तरफ काला धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ जन आंदोलन करने वाले बाबा रामदेव और अन्ना हजारे से। दिग्विजय सिंह की नजर में वे सब आतंकवादी और भ्रष्ट हैं, जो भ्रष्टाचार का विरोध करते हैं। मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री बनने से लेकर कांग्रेस में प्रमुख बने रहने के लिए दिग्विजय सिंह ने चापलूसी और खुशामद की हदें पार कर दीं। अपनी इसी स्वामिभक्ति के कारण वह पार्टी के महामंत्री और उत्तर प्रदेश के चुनाव प्रभारी बनाये गए। अंदरूनी हालत नहीं जानने वाले कांग्रेसियों की नजर में दिग्गी राजा एक निष्ठावान और पार्टी के प्रति समर्पित नेता हैं। लेकिन यदि कोई यह कहे कि दस साल तक मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री रहते हुए, दिग्गी राजा ने खुद कांग्रस को कितना चूना लगाया? तो सनद रहे कि भोपाल स्थित कांग्रेस के कार्यालय जवाहर भवन को फर्जी ट्रस्ट बनाकर उन्होंने अपने कब्जे में कर लिया, भवन से लगी हुई दुकानों का किराया हड़प कर लिया, अदालत में झूठा शपथ पत्र दिया, अपने लोगों को फर्जी कंपनियां बना कर रुपयों का घोटाला किया और पार्टी में अपराधियों को संरक्षण दिया। तो ऐसा कहने वाले को दिग्गी राजा या कांग्रेस नेता फौरन संघ का आदमी कह देंगे, और अगर कोई यह कहे कि दिग्विजय सिंह सार्वजनिक रूप से इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी के प्रति अपशब्द कहते थे तो कांग्रेसी उस व्यक्ति को बाबा रामदेव या अन्ना हजारे का एजेंट कह देंगे।  लेकिन दिग्विजय सिंह की यह कलई किसी संघी या बाबा रामदेव के एजेंट ने नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष आरएम भटनागर ने खुद खोली है। श्री भटनागर 1978 से 1993 तक पार्टी में बने रहे। वे राजीव गांधी के भी काफी निकट थे। इनके कार्यकाल में अर्जुन सिंह और दिग्विजय सिंह मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री रहे। आज श्री भटनागर की उम्र 76 के लगभग है। श्री भटनागर ने दिग्विजय सिंह पर जो भी आरोप लगाये हैं, वह उन्होंने शपथ पूर्वक बताये हैं। जिनकी पुष्टि, अखबारों, विधानसभा के रिकार्ड और प्रमाणिक गुप्त दस्तावेजों से होती है। श्री भटनागर ने इसकी सूचना गोपनीय पत्र द्वारा दिनांक 9 अगस्त 1998 और दिनांक 29 सितम्बर 2001 को सोनिया गांधी को दे दी थी। यह खबर इंदौर से छपने
 वाले एक साप्ताहिक पत्रिका ने अपने अंकों में छापी थी। 
दिग्विजय सिंह ने पहला घोटाला कांग्रेस की सम्पति हड़पने का किया था। सन 2006 से पूर्व मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी का मुख्य कार्यालय लोक निर्माण विभाग के एक शेड में था। बाद में प्रदेश कांग्रेस कमिटी को अपना भवन बनाने हेतु मध्यप्रदेश आवास और पर्यावरण विभाग ने आदेश संख्या- 3308/4239, दिनांक 30/11/74 और पुनस्र्थापित आदेश दिनांक 30 अगस्त 1980 तथा आदेश दिनांक 20 /11 81 द्वारा रोशनपुरा भोपाल के नजूल शीट क्रमांक-3 प्लाट-7 में 5140 वर्ग फुट जमीन बिना प्रीमियम के एक रुपया वार्षिक भूभाट लेकर स्थायी पट्टे पर आवंटित कर दिया था, और उस भूखंड का विधिवत कब्जा कांग्रस कमेटी को नजूल से लेकर 23/11/81 को सौप दिया। भवन निर्माण हेतु सदस्यों और किरायेदारों से जो रुपए जमा हुए उस से तीन मंजिली ईमारत बनायी गयी, जिसमें दो बड़े हॉल और साथ में 59 दुकानें भी थीं। इस भवन का नाम जवाहर भवन शॉपिंग कॉम्प्लेक्स रखा गया। इस भवन की भूमि पूजा तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने 16 अगस्त 1984 को की थी और उद्घाटन राजीव गांधी ने किया था। निर्माण हेतु सदस्यों के चंदे से 29.84 लाख रुपए और किराये से 66.78 लाख रुपए जमा हुए थे और किराए की राशि से पार्टी का खर्च चलने
की बात कही गयी थी। 
बाद में दिग्विजय सिंह ने 19/12/85 को एक फर्जी ट्रस्ट बनाकर उस भवन पर कब्जा कर लिया। यद्यपि उस ट्रस्ट का नाम कांग्रेस कमेटी ट्रस्ट था लेकिन उसका कांग्रेस से कोई सम्बन्ध नहीं था। दिग्विजय ने अनुभागीय अधिकारी (तहसीलदार) के समक्ष शपथपत्र देकर कहा की यह ट्रस्ट पुण्यार्थ है, और जवाहर भवन की सारी चल अचल सम्पति इसी ट्रस्ट की है। इस तरह कांग्रेस पार्टी दिग्विजय की किरायेदार बन (देशबंधु दिनांक 6 दिसंबर 1998) गई। दिग्विजय सिंह ने खुद को उस ट्रस्ट का अध्यक्ष बना लिया। उक्त ट्रस्ट में निम्न पदाधिकारी थे:  1. अध्यक्ष -दिग्विजय सिंह पुत्र बलभद्र सिंह 2. मोतीलाल वोरा ट्रस्टी 3. जगत पाल सिंह मैनेजिंग ट्रस्टी।
इस ट्रस्ट के विरुद्ध न्यायालय अनुभागीय अधिकारी तहसील हुजुर भोपाल में एक जनहित याचिका भी दर्ज की गयी थी, जो प्रकरण संख्या 04 बी-113 /85-86 दिनांक 12 जुलाई 88 में दर्ज हुआ था। बाद में यह मामला श्री आर.एम. भटनागर ने विधान सभा में भी उठवाया। मध्यप्रदेश विधान सभा के प्रश्न संख्या 9 (क्रमांक 579) दिनांक 23 फरवरी 96 को उक्त ट्रस्ट के बारे में करण सिंह ने यह सवाल किया था, ‘क्या रा'यमंत्री धार्मिक न्यास यह बताने का कष्ट करेंगे की इस ट्रस्ट के पंजीयन के समय तक कितनी बार ट्रस्टियों के नाम बदले गए हैं? जैसा की भटनागर ने 24 दिसंबर 98 को प्रश्न किया था। और पंजीयक से शिकायत की थी?’
इस पर विधान सभा में धार्मिक न्यास राज्यमंत्री धनेन्द्र साहू ने उत्तर दिया था कि अब तक उक्त ट्रस्ट के ट्रस्टी चार बार बदले गए हैं और ट्रस्ट के भवन की दुकानें पट्टे पर नहीं बल्कि किराये पर दी गयी हैं और इसकी अनुमति भी नहीं ली गयी थी। यही नहीं उक्त ट्रस्ट कि ऑडिट रिपोर्ट भी 31 मार्च 2000 तक नहीं दी गयी। इसके बाद दिग्विजय सिंह ने दुकानों से प्राप्त किराया पार्टी को न देकर अपने निजी काम में लगाना शुरूकर दिया। जिसकी खबर इंदौर से प्रकाशित ‘फ्री प्रेस जरनल’ ने दिनांक 5 नवम्बर 1986 को इस हेडिंग ‘दिग्विजय ऐक्यूज्ड ऑफ मिसयूजिंग पार्टी फंड्स’ से प्रकाशित की थी। श्री भटनागर ने बताया कि जवाहर भवन की 59 दुकानों से मिलाने वाले किराये से प्रति माह दो तीन लाख रुपये की जगह सिर्फ 65000/- ही जमा होते थे। इस प्रकार अकेले 10 साल में करोड़ों का घपला किया गया है। उक्त ट्रस्ट का खाता पंजाब नैशनल बैंक के भोपाल टी.टी. नगर ब्रांच में था, जिसका खाता नम्बर 19371 है। खाते से पता चला कि 1 अप्रैल 2001 से 26 मार्च 2003 तक ट्रस्ट से 1 करोड़, 21 लाख,1,649 रुपऐ निकले गए थे। जिसमें सेल्फ के नाम से 162739/- दिग्विजय ने निकला था। बैंक का लॉकर भी था। जिसमें कई मूल्यवान वस्तुएं भी थीं जो भेंट में मिली थीं। इसके अलावा नकद राशि भी थी। भटनागर ने बताया कि उस समय खाते में ग्यारह करोड़ रुपए थेे। लॉकर की दो चाभियां थीं। एक जगतपाल सिह के पास, और दूसरी दिग्विजय सिंह के पास थी। जब जगतपाल की मौत के बाद लॉकर खोला गया तो उसमें से कीमती चीजें गायब पाई गई थीं और खाते से 9 करोड़ रुपए का कोई हिसाब नहीं मिला (इंदौर से प्रकाशित स्पुतनिक दिनांक 31 जनवरी 2005)

रविवार, 24 जुलाई 2011

चमचागीरी की कांग्रेसी कला

चमचागीरी की कांग्रेसी कला
चार ‘च’ यानी चुगली, चापलूसी, चरण वंदन और चमचागीरी में आपको महारथ हासिल है तो राजनीति में आप चमक सकते हैं। आज की राजनीति का कड़वा सच यही है। चार ‘च’ का विषबेल भारतीय राजनीति में पसर गया है।
1947 में आजादी मिलने के बाद महात्मा गांधी ने ‘भारतीय राष्टï्रीय कांग्रेस पार्टी’ के विघटन की इच्छा की थी। उनके पास कांग्रेस के विघटन के तर्क थे और दूरदृष्टि भी थी। इसलिए कि कांग्रेस के पास आजादी की धरोहर थी। कांग्रेस का मुख्य लक्ष्य आजादी था। महात्मा गांधी ने यह महसूस किया था कि ‘कांग्रेस’ के पास आजादी के इस धरोहर के साथ खिलवाड़ और नैतिकता के साथ ही साथ जनविरोधी राजनीति का पर्याय बनाया जा सकता है। इसलिए कांग्रेस का विघटन जरूरी है। महात्मा गांधी के इस इच्छा का सम्मान न हुआ और जवाहर लाल नेहरू ने कांग्रेस को अपने परिवारिक सत्ता उत्थान का मोहरा बना दिया। आज कांग्रेस के अंदर घटने वाली घटनाएं यह कहने और बताने के लिए तत्पर हैं कि महात्ता गांधी की वह इच्छा कितनी सटीक और दूरदृष्टि से परिपूर्ण थी।   
चाटुकारिता और अनैतिकता कांग्रेस के खून में रची-बसी है और उसकी राजनीतिक धमनियों में यह सब अनवरत बहती रहती है। चाटुकारिता और अनैतिकता की लहर बहाने के जिम्मेदार जवाहर लाल नेहरू थे। कांग्रेस में उन्होंने आजादी की धरोहर से जुड़े हुए राजनीति की धाराएं रोकीं और इसकी जगह चाटुकार और अनैतिकता से भरी हुई राजनीतिक शख्सियतों को स्थापित कराया। नेहरू ने चन्द्रभानु गुप्त, विधानचंद्र राय, मोरारजी देशाई जैसे अनेकों आजादी की शख्सियतों को हासिये पर डाला। संसद और राज्य विधान सभाओं के साथ ही साथ सरकारों पर नेहरू की जाति ब्राम्हणों का आधिपत्य हुआ। परिवारवाद का वृक्षारोपण हुआ। इसका उदाहरण था नेहरू द्वारा अपनी पुत्री इंदिरा गांधी को अपना उत्तराधिकारी घोषित करना और कांग्रेस की अध्यक्ष पद पर बैठाना। उस समय इंदिरा गांधी की राजनीतिक कमाई इतनी भर थी कि वह जवाहर लाल नेहरू की पुत्री थी। कांग्रेस की अध्यक्ष के रूप में इंदिरा गांधी ने वरिष्ठ और नैतिकता वाले कांग्रेसियों को बाहर करने में कोई कंजूसी नहीं बरती। लाल बहादुर शास्त्री की असमय संदेहास्पद मृत्यु के बाद प्रधानमंत्री पद पर इंदिरा जा बैठीं। अपने मनपसंद उम्मीदवार को राष्ट्रपति  का उम्मीदवार नहीं बनाये जाने पर इंदिरा गांधी ने अपनी पार्टी के राष्ट्रपति  पद के उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी को परास्त कराया और निर्दलीय वीवी गिरी को राष्ट्रपति बनाया। लोकतंत्र में ऐसा उदाहरण और नहीं मिलेगा जिसमें प्रधानमंत्री ने खुद अपने दल द्वारा घोषित राष्ट्रपति के उम्मीदवार को पराजित कराने की राजनीतिक चाल चली हो। इंदिरा गांधी ने भारतीय राजनीति में चाटुकारिता और अनैतिकता से भरी शख्सियतों की नई धारा बहाई। देवकांत बरुआ की चाटुकारिता भारतीय राजनीति में हमेशा चर्चित रही है। देवकांत बरुआ ने इंदिरा गांधी की चमचागीरी में कहा था कि ‘इंदिरा इज ए इंडिया-इंडिया इज ए इंडिया।’ इंदिरा गांधी के मुंह से निकलने वाले हर शब्द को शिरोधार्य माना जाने लगा। इंदिरा गंाधी ने केवल राजनीति में ही मोहरे नहीं बैठाये बल्कि संवैधानिक संस्थाओं में भी चाटुकारों की श्रृंखला स्थापित की। इसका परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस पूरी तरह से चमचों के चंगुल में फंस गयी। विरोध प्रकट करने और असहमति जताने की लोकतांत्रिक धारा रुक गयी। इंदिरा गंाधी निरंकुश हो गयीं। 1971 में बांग्लादेश में हुई जीत से इदिरा गांधी की निरंकुशता और बढ़ गयी। चारों तरफ गुणगान करने वालों की भीड़ लग गयी। ऐसी स्थिति बड़ी सी बड़ी राजनीतिक शख्सियत को भी सोचने-समझने की शक्ति समाप्त कर देती है। इंदिरा गाधी का आपातकाल इसी दृष्टिकोण का परिणाम था। आपातकाल ने हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर कैसा संकट खड़ा किया यह जगजाहिर है। चापलूसी की अपसंस्कृति कांग्रेस में किस कदर बढ़ी, इसे समझने के लिए इंदिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी की चप्पल उठाने वाले दो तत्कालीन मुख्यमंत्रियों के किस्से मशहूर हैं। लखनऊ में तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी और मुंबई में महाराष्टï्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री शंकर राव चव्हान ने संजय गांधी के चप्पल ढोये थे। शंकर राव चव्हान महाराष्टï्र के हाल ही मुख्यमंत्री रहे अशोक चव्हान के पिता थे। शंकर राव चव्हान तो अब जिंदा नहीं हैं पर नारायण दत्त तिवारी जिंदा हैं। सोनिया गंाधी की पीढ़ी में भी चाटुकारों और चमचों की भीड़ है, इसमें प्रधानमंत्री से लेकर कई ताकवर मंत्रियों और आला नेताओं के नाम शुमार हैं। राहुल के मुंबई दौरे में जिस तरह चाटुकारिता की स्खलित राजनीतिक पारिपाटी दिखी वह चरम है। महाराष्टï्र के गृह राज्य मंत्री रमेश ने राहुल गांधी का न केवल चप्पल उठाया बल्कि चप्पल उठाकर चलते भी देखे गये। इस चप्पलकारिता पर राहुल को भी कोई कोप नहीं हुआ बल्कि वे अपनी मुस्कान बिखरते हुए इसका आनंद लेते रहे। जबकि राहुल बार-बार यह कहते हैं कि कांग्रेस में चाटुकारिता नहीं चलेगी।  वाकई चापलूसी भारतीय राजनीति का ब्रह्मïास्त्र है। 2008 में अर्जुन सिंह ने बयान दिया कि राहुल को प्रधानमंत्री बनाने में हर्ज नहीं। इस पर अर्जुन सिंह के पीछे सारे लोग हाथ धोकर पड़ गए। कांग्रेस को बयान जारी करना पड़ा कि कांग्रेस नेतृत्व चापलूसी पसंद नहीं करता। अखबारों के मुखपृष्ठों पर इधर ये बयान छपा और उधर प्रणब मुखर्जी का दोगुनी चापलूसी वाला बयान भी छपा। एक साथ दोनों बयान! इसके बाद तो दिग्विजय सिंह ने चमचागीरी की इंतिहा ही कर दी। कांग्रेस ने चापलूसी को उच्च-कोटि की ललित कला बना दिया है। वह कला ही नहीं, विज्ञान भी बन गई है। कितनी चापलूसी कहां और कैसे करनी चाहिए, इस विधा के महारथी जितने कांग्रेस में पाए जाते हैं, किसी और पार्टी में नहीं। इसका नतीजा क्या होता है? यह संक्रामक रोग की तरह है। कांग्रेस की देखादेखी यह देश की अन्य पार्टियों में भी फैल गई है। भारतीय राजनीति के साठ साल में से लगभग 50 साल कांग्रेस का राज रहा है। कांग्रेसियों के आचरण ने शेष सभी दलों को प्रभावित किया है। चापलूसी राजनीतिक संस्कृति का अभिन्न अंग बन गई है। अनुयायी नेताओं की तरह कुर्ता, बंडी, टोपी पहनने लगते हैं, भाषण देते वक्त उनकी तरह हाथ-पांव फेंकने लगते हैं, उसी ठाठ-बाट से रहने लगते हैं। आज के नेता कोई गांधी की तरह नहीं हैं कि उनके सदगुणों को उनके अनुयायी अपने जीवन में उतारें। नेता वैसा आग्रह करते भी नहीं और अनुयायी वैसा करना जरूरी भी नहीं समझते। हमारी राजनीति ऊपर से चमकदार और अंदर से खोखली होती चली जा रही है।
किसी पार्टी के कार्यकर्ता में यह दम नहीं कि वह अपने नेता से पूछे कि इतना पैसा कहां से लाते हैं, इतनी संपत्ति कैसे जुटाई, रोज इतना खर्च कैसे करते हैं? व्यभिचार और मद्यपान करते डर नहीं लगता? पत्नी, बेटे-बेटी और भतीजे-भतीजी को हमारी छाती पर सवार क्यों कर रहे हैं? आप फलां को प्रदेशाध्यक्ष, फलां को महामंत्री, फलां को राज्यपाल, फलां को मुख्यमंत्री और फलां को मंत्री क्यों बना रहे हैं? नेता को सारे अधिकार समर्पित करके हमारे देश के पार्टी कार्यकर्ता अपनी बुद्घि को स्थायी तौर पर सुला देते हैं।
कांग्रेस में चापलूसी संस्कृति के नए सितारे बनकर दिग्विजय सिंह उभरे हैं। इनके बारे में क्या कहा जाए, चापलूसी में यह क्या-क्या कह सकते हैं, इसकी कल्पना करना मुश्किल है। दिग्विजय सिंह ने राजनीतिक कारीगरी अपने गुरु अर्जुन सिंह से सीखी है और अर्जुन सिंह अपने जमाने के जाने-माने राजनीतिक चाणक्य रहे हैं।
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