रोमिंग जर्नलिस्ट

बुधवार, 22 अप्रैल 2015

मोदी के दत्तक गांव में किसानों का मातम
-बनारस के जयापुर में बेमौसम बरसात से बर्बाद किसानों की सुध लेने राज्य सरकार को कोई अफसर नहीं पहुंचा
- इस गांव में छोटे किसानों की 70 प्रतिशत फसल हो चुकी है बर्बाद, मुआवजा तो दूर तहसीलदार भी नहीं आए
दिनेश चंद्र मिश्र
वाराणसी। बेमौसम बरसात से फसलों के बर्बाद होने पर खून के आंसू प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दत्तक गांव जयापुर के भी छोटे किसान रो रहे हैं। मोदी के गोद लिए के इस गांव में गेहूं की 70 फीसदी फसल बर्बाद हो गयी है। गेंहू के साथ मटर और चना की फसल बोए किसान भी कुदरत की मार के चलते रोने को विवश है। मोदी के दत्तक गांव में फसल बर्बाद होने से किसानों के खेत से लेकर घर तक मातम पसरा है। मौसम की मार से आर्थिक घायल हुए किसानों के साथ राज्य सरकार के अफसर सौतेला व्यवहार भी कर रहे हैं। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है आज तक बर्बाद फसलों का सर्वे करने के लिए तहसीलदार तक नहीं गए हैं।
सपा सरकार जहां प्रदेश में फसलों के नुकसान का दुबारा सर्वे करवा रही है, वहीं जयापुर में किसी राजस्व अधिकारी के न पहुंचने को लेकर गांव की प्रधान दुर्गादेवी भी बहुत चिंतित है। वह बताती है कि तीन दिन पहले लेखपाल आए और एक-दो खेत देखकर लौट गए। यहां तो किसानों की 70 प्रतिशत फसल बर्बाद हो गयी है वह अपनी रिपोर्ट में कितना नुकसान दिखाएं हैं,मालूम नहीं। वह कहती है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खत भेजकर उनके गोद लिए गांव के बर्बादी के साथ अफसरों के सौतेलापन की बात जरूर बताएंगे। मोदी के गोद लिए गांव में बर्बाद किसानों का जितना गुस्सा जिले के आला अधिकारियों को लेकर है उससे कम गुस्सा जनप्रतिनिधियों को लेकर भी नहीं है। मोदी का नाम इस गांव के किसानों की मदद के लिए जनप्रतिनिधि मदद के हाथ दलीय दीवार के कारण भी नहीं बढ़ा रहे हैं।

कर्ज तो दूर,सूद देना भी संकट
मोदी के गोद लिए गांव जयापुर के छोटे किसानों की कमर को बेमौसम बरसात ने पूरी तरह तोड़ दिया है। इसी गांव के लालचंद्र,मन्नू पटेल, सेचन व झम्मन की आधी से ज्यादा फसल बरसात के कारण सड़ गई। कर्ज में डूबे इन किसानों को फसल अच्छी होने पर पुराना कर्ज चुकाकर मुक्ति पाने की आस थी, इस आस पर ब्रज पड़ गया है। इनका कहना है अब कर्ज चुकाना तो दूर  समय पर सूद देना भी एक संकट है।

सोमवार, 20 अक्तूबर 2014


दीपावली पर यादों का इक दीया


दीपावली हो या होली, इन त्योहार के आने से पहले ही बचपन में जो उमंग रहती थी, समय के साथ कहां चली गयी पता ही नहीं चला। एक बार फिर दीपावली आ गयी लेकिन इस बार उमंग दिल में नाममात्र की भी नहीं बची है। पिछले साल तक दीपावली पर अगर बस्ती स्थित घर नहीं पहुंच पाता तो पापा का फोन आता था। फोन पर प्रणाम करने के बाद पापा हालचाल जानने के बाद कहते थे तुम्हारे लिए एक अंडरवियर और बनियान खरीदा हूं,आना तो लेते जाना। यह पापा का प्यार था, जो नौकरी करने के बाद भी पिछले कई सालों से मिल रहा था। इस बार त्योहार पर पापा की ओर से नए कपड़े के रूप में मिलने वाले इस तोहफे की कमी जो खल रही है,उसको किसी बाजार में खरीद नहीं सकता हूं। पापा के लाड़-प्यार के साथ गलती के लिए मार की जो थाती अपनी थी, अब अनमोल यादें बन गयी है। पहले मां गयी और अब पापा भी छोड़कर चले गये। अपनी जिंदगी में दीपावली इतनी काली कभी नहीं थी, जितनी इस साल है।

अमर उजाला वाराणसी में काम करने के दौरान माता जी ने गोद में दम तोड़ दिया था,  इस साल पापा भी अप्रैल में हम लोगों को छोड़कर चले गये। बीएचयू के सर अस्पताल में पापा की वह हंसी याद करके आंखों में पानी भर आता है, जो जेहन में कैद है। स्कूल के दिनों में पापा की मार उनके खड़ाऊ से लेकर लकड़ी की स्केल तक से अपनी गलतियों के लिए बहुत खायी लेकिन दिल में एक भी चोट नहीं है। पापा की मार पर माता जी का बचाने के लिए किचन से दौड़कर आना याद आता है तो आंखों से आंसू थमते नहीं हैं। यायावरी की आदत के चलते अखबार की नौकरी में कई ऐसी दीपावली रही, जब परिवार से बहुत दूर रहा। अमर उजाला जम्मू-कश्मीर में नौकरी के दौरान परिवार बनारस तो पापा बस्ती में थे। मैं दीपावली के दिन अपनों से दूर माता रानी के चरणों में आस्था का एक दीप जलाने के लिए पहुंच गया था। वहां से पापा को फोन करके आर्शीवाद लिया तो कहे माता रानी से प्रार्थना करो वह तुम्हे घर के नजदीक भेज दो। माता रानी ने पापा की सुन ली, चंद महीनों में ही नोएडा आ गया। काशी से कश्मीर, दिल्ली से दार्जिलिंग तक पत्रकारिता के पथ पर काम करने के दौरान कई दीपावली ऐसी रही जब घर-परिवार से सैकड़ों कोस दूर रहा, लेकिन वह उतना नहीं खला जितना इस बार अम्मा-पापा के बिना प्रकाशपर्व से पहले ही खालीपन महसूस हो रहा है। अम्मा-पापा के बिना प्रकाशपर्व इस साल काटने के लिए दौड़ रहा है। पिछले साल पापा ने दीपावली पर जो अंडरवियर और बनियान दिया था,वह आज भी शरीर पर है लेकिन अपने को अधूरा पा रहा हूं। दीपावली के दिन अम्मा-पापा की याद में एक-एक दीप बनारस के मणिकर्णिका घाट पर जलाने को सोच रहा हूं, जहां उनको मुखाग्नि दी थी। 

शुक्रवार, 24 मई 2013

सोनभद्र का हलक यूपी में सबसे ज्यादा सूखा


दिनेश चंद्र मिश्र
लखनऊ। गर्मी में तो वैसे सबका हलक चार कदम चलने के बाद सूख जाता है लेकिन सूबे के सोनभद्र जिले के ग्रामीण क्षेत्र में लोगों का हलक सबसे ज्यादा सूखा है। प्रदेश के दर्जनभर से ज्यादा जिलों के ग्रामीण इलाकों में आज भी एक चौथाई घरों में पानी नहीं मौजूद है। पानी की तलाश में इन लोगों को लंबा सफर करना पड़ता है। सबसे ज्यादा खराब स्थिति सोनभद्र जिले की है। सोनांचल कहे जाने वाले इस इलाके ३३.७० प्रतिशत घरों में पानी का इंतजाम नहीं है। पानी के लिए इनको घर से दूर सरकारी हैंडपंप से लेकर कुंआ,नदी व तालाब का सहारा लेना पड़ता है। गर्मी में यहां भी पानी सूख जाता है तो लोगों को हलक में दो बंूद पानी के लिए लंबी जद्ïदोजहद करनी पड़ती है।
भारत सरकार द्वारा देश के सभी जिलों में कितने घरों पानी का इंतजाम मौजूद है? कितनों में नहीं है? यह जानने के लिए किये सर्वे से इस बात का खुलासा हुआ कि सोनभद्र के ग्रामीण इलाकों का हलक सबसे ज्यादा सूखा है। सोनभद्र देहात के ३३.७० प्रतिधत घरों में जहां पानी मौजूद नहीं है वहीं शहरी इलाकों में ११.६० प्रतिशत घर भी बेपानी है। सोनभद्र के बाद भगवान श्रीकृष्ण की नगरी मथुरा का भी हलक काफी सूखा है। मथुरा के गांवों में भी ३३.३० प्रतिशत घरों में आज की तारीख में पानी नहीं पहुंचा है। मथुरा शहर में ऐसे घरों की संख्या ८.४० प्रतिशत है। मिर्जापुर के ग्रामाीण क्षेत्रों में भी पानी के लिए त्राहि-त्राहि मची है। यहां के गांवों में २८.६० प्रतिशत घरों में पानी नहीं है। संत रविदासनगर भदोही में २३.२० प्रतिशत ग्रामीण घरों में रोजाना पानी की दरकार है।
बुन्देलखंड में भी पानी की किल्लत कम नहीं है। भगवान राम की नगरी चित्रकूट में भी पानी की किल्लत बहुत है। चित्रकूट के ग्रामीण इलाकों में २७.१० प्रतिशत घरों में आज भी पानी नहीं पहुंचा है। पानी के लिए यहां के ग्रामीणों का घाट-घाट का चक्कर लगाना पड़ता है। फहेतपुर में भी पानी की समस्या विकराल है। फतेहपुर के २६.८० प्रतिशत ग्रामीण घरों में पानी नहीं है। झांसी के ग्रामीण इलाकों में एक चौथाई घरों में पानी नहीं पहुंचा है। यहां रोजाना ग्रामीणों को पानी के लिए किसी लड़ाई से कम जद्ïदोजहद नहीं करनी पड़ती है। हमीरपुर में भी २१.८० प्रतिशत ग्रामीण इलाकों के घरों में पानी नहीं है। कानपुर देहात के देहात में भी पानी का रोना कम नहीं है। इस जिले के देहाती इलाकों में २४.८० प्रतिशत घरों में पानी नहीं मौजूद है। मुख्यमंत्री की पत्नी व सपा सांसद डिंपल यादव की राजनीतिक कर्मभूमि कन्नौज के गांव भी पानी की किल्लत से जूझ रहे हैं। कन्नौज के ग्रामीण इलाकों में २३.८० प्रतिशत घरों में पानी नहीं पहुंचा है। कौशांबी में भी पानी की समस्या बरकरार है। कौशांबी में २६.६० प्रतिशत ग्रामीण घरों में पानी नहीं मौजूद है।  संगमनगरी इलाहाबाद में भी पानी की समस्या कम नहीं है। इलाहाबाद के एक चौथाई गंवई घर बेपानी है। इलाहाबाद के २५.८० प्रतिशत घरों में पानी मौजूद नहीं है। चंदौली में भी पानी की समस्या जगजाहिर है। चंदौली में २३.३० प्रतिशत घरों में पानी नहीं पहुंचा है। रोजमर्रा की जरूरत का पानी लेने के लिए भी ग्रामीणों को घर से दूर जाना पड़ता है। बांदा में भी कमावेश यही स्थिति है। बांदा के २३ प्रतिशत ग्रामीणा घरों में बूंद-बूंद पानी के लिए लोगों को चक्कर लगाना पड़ता है।

शुक्रवार, 17 मई 2013

खेतों के लिए बज रही है खतरे की घंटी


- प्रदेश की मिट्टी में तेजी से घटे पोषक तत्व,अपनी मिट्ïटी पहचाने अभियान ने किया सचेत 
- जीवांश कार्बन की मात्रा घटकर हुई आधी,नाइट्रोजन,फास्फोर,सल्फर,जिंक की भी हुई कमी
दिनेश चंद्र मिश्र
लखनऊ। प्रदेश की माटी अनाज तो खूब उगल रही है लेकिन वह दिन दूर नहीं जब पैदावार कम होने लगे। यह खतरा प्रदेश के कृषि विभाग को मिट्ïटी के मृदा परीक्षण के बाद नजर आ रहा है। प्रदेश के खेतों में बड़ी तेजी से पोषक तत्व घट रहे हैं। पोषक तत्वों के घटने के पीछे कारण बड़ी संख्या में किसानों द्वारा धान-गेहूं का फसल चक्र अपनाना है। धान-गेहूं का फसल चक्र ही लगातार अपनाने के कारण स्वस्थ्य भूमि के मुख्य पोषक तत्वों के साथ सूक्ष्म पोषक तत्व भी तेजी से घट रहे हैं। प्रदेश में इस समय चल रहे मिट्ïटी पहचाने अभियान के प्रथम चरण के मृदा परीक्षण रिपोर्ड कार्ड जो जारी किया गया है, उसके अनुसार सेहतमंद खेत के लिए जरूरी पोषक तत्व जीवांश कार्बन माना जाता है। जीवांश कार्बन की मात्रा ०.८ प्रतिशत होनी चाहिए, प्रदेश में अब यह घटकर ०.४ प्रतिशत रह गयी है।
मिट्टी के पोषक तत्वों की कमी के कारण प्रदेश के खाद्यान्न उत्पादन में कुछ वर्षों के दौराव ठहराव आ गया है। इस ठहराव को खत्म करने के लिए प्रदेश में खरीफ व रबी फसल अभियान के दौरान मिट्ïटी पहचाने अभियान प्रारंभ किया गया है। मृदा स्वास्थ्य के दृष्टिïकोण प्रारंभ हुए इस अभियान का पहला चरण इस वर्ष २६ अप्रैल को प्रदेशभर में चला। लगभग छह लाख मिट्ïटी के नमूने प्रदेशभर में किसान जांच कराने के लिए पहुंचे। मिट्टी के इन नमूनों का पंद्रह मई को मृदा स्वास्थ्य कार्ड जारी किया गया। मिट्ïटी के  इन नमूनों से जो निष्कर्ष निकलकर सामने आया, उसके अनुसार जीवांश कार्बन की मात्रा जहां सभी जिलों मानक से घटकर आधी रह गयी है, वहीं अन्य पोषक तत्व भी तेजी से घटे हैं। प्रदेश के अधिकांश जनपदों में मुख्य पोषक तत्वों के साथ-साथ द्वितीय तथा सूक्ष्म पोषक तत्वों की भी कमी हो रही है। पौधों के अच्छे विकास के लिए १६ पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है जिनमें से पौधे वायु मण्डल् तथा जल से तीन पोषक तत्वा कार्बन,हाईड्रोजन तथा आक्सीन ग्रहण करते हैं एवं १३ पोषक तत्व भूमि से ग्रहण करते हैं। भूमि से जो प्रमुख पोषक तत्व पौधे ग्रहण करते हैं वह है नाइट्रोजन,फास्फोरस,पोटास के अलावा द्वितीयक पोषक तत्व कैल्सियम,मैज्निश्सियम,सल्फर तथा सूक्ष्म पोषक तत्व जिंक, आयरन, मैज्नीज,कापर,बोरान,मालिब्डेनम एवं क्लोरीन भूमि से ग्रहण करते हैं।
प्रदेश में मिट्टी पहचाने अभियान के प्रथम चरण के नमूनों से जो निष्कर्ष निकले हैं वह खेतों के लिए खतरे की घंटी से कम नहीं है। प्रदेश के खेतों में जहां जीवांश कार्बन की मात्रा घटकर आधी रह गयी है, वहीं अधिकांश जिलों में नत्रजन,फास्फोरस,सल्फर,जिंक,लोहा, तांबा, मैज्नीज आदि महत्वपूर्ण पोषक तत्वों की भूमि में कमी दिख रही हैं। प्रदेश के खेतों महत्वपूर्ण पोषक तत्वों की कमी के पीछे अधिकांश किसानों द्वारा धान-गेहूं की फसल लगातार बोने के साथ रसायनिक उर्वरकों के असंतुलित प्रयोग कारण ऐसा हो रहा है। प्रदेश में इस वर्ष सरकार ने ४० लाख २० हजार मृदा नमूनों की जांच का लक्ष्य रखा है। पहले चरण का परिणाम जहां खेतों के लिए खतरे की घंटी बजा  रहे हैं, वहीं दूसरे चरण में जो नमून जांच के लिए एकत्र होने के बाद परीक्षण किए जा रहे , वह क्या कहेंगे? इसका पता तीस मई के बाद चलेगा।

शुक्रवार, 10 मई 2013

मंत्री के शादी की सिल्वर जुबली ने सबका मनमोहा



- उत्तर प्रदेश के लोकनिर्माण राज्यमंत्री सुरेंद्र पटेल ने वाराणसी में १०२ कन्याओं का बसाया घर, मांगा सांसद बनने का आर्शीवाद
दिनेश चंद्र मिश्र
लखनऊ। जनप्रतिनिधियों के शानो-शौकत के किस्से आए दिन सुनने को मिलते हैं, लेकिन सादगी के साथ मिसाल कायम करने की बात कभी-कभी सामने आती है। शुकवार को ऐसी ही एक मिसाल कायम कि प्रदेश के लोक निर्माण राज्यमंत्री सुरेंद्र पटेल ने। अपनी शादी की २५ वीं सालगिरह पर उन्होंने वाराणसी-इलाहाबाद मार्ग पर स्थित राजातालाब में १०२ कन्याओं का विवाह कराने का पुनीत कार्य किया। एक सौ दो कन्याओं का विवाह कराने के बाद राज्यमंत्री ने कन्याओं का पैर छूकर सांसद बनने का आर्शीवाद मांगा। गौरतलब है समाजवादी पार्टी मुखिया मुलायम सिंह यादव ने सुरेंद्र पटेल को वाराणसी लोकसभा क्षेत्र से सपा का टिकट सुरेंद्र को दिया है।
वाराणसी-इलाहाबाद हाईवे पर स्थित राजातालाब में आयोजित इस समोराह में दहेज जैसी कुरोतियों को दरकिनार करके १०२ जोड़े एक-दूसरे को माला पहनाकर परिणयसूत्र में बंध गये। सामूहिक विवाह समारोह में दो मुस्लिम परिवारों ने भी हिस्सा लिया। ढोल-नगाड़ों के बीच सैकड़ों ग्राम प्रधानों ने इस समारोह में घराती-बराती की भूमिका अदा की। लोक निर्माण राज्य मंत्री सुरेंद्र पटेल और उनकी पत्नी श्रीमती प्रभा सिंह ने कन्यादान की रस्म अदा की। राजातालाब के प्रसिद्घ दांगड़वीर हनुमान मंदिर में आयोजित इस समारोह में वर-वधू को आर्शीवाद देने के लिए देशी-विदेशी मेहमान भी पहुंचे। सामूहिक विवाह समारोह में लोकनिर्माण राज्य मंत्री की ओर सये सभी जोड़ों को एक-एक साइकिल, उनकी पत्नी की ओर से पलंग,रजाई-गद्ïदा व तकिया, लोक समिति व ग्राम प्रधानों की ओर से एक-एक सिलाई मशीन, पूर्व विधायक अब्दुल समद अंसारी ने बनारसी साड़ी, समाजसेवी गोविन्दजी पापुलर बेकरी की तरफ से रंगीन टीवी, संकट मोचन से आए मुन्ना मौर्या की ओर से एक-एक पंखा, आराजीलाइन ब्लाक प्रमुख महेंद्र पटेल ने एक-एक कलाई घड़ी, केशवभाई पटेल ने एक-एक पेंट शर्ट, यूनियन बैंक राजातालाब की ओर से घरेलू बर्तन उपहार में दिया।

सोमवार, 6 मई 2013

यूपी में रोजाना साढ़े छह करोड़ लड़ते हैं रोटी की जंग

-यूपी के ग्रामीण इलाकों में है मजदूरों की संख्या पांच करोड़ १९ लाख ५० हजार ९८०
-सूबे के शहरों में रोजाना एक करोड़ ३८ लाख ६३ हजार ७३५ लोग करते है दिहाड़ी
दिनेश चंद्र मिश्र
लखनऊ। बीस करोड़ की आबादी वाले उत्तरप्रदेश में रोजाना साढ़े छह करोड़ से ज्यादा लोगों रोजी-रोटी हासिल करने की जंग लड़ते हैं। एक तिहाई से ज्यादा आबादी मजदूरी कर रही है। मजदूरों की इतनी बड़ी संख्या देश के किसी भी प्रदेश में नहीं है। भारत सरकार के गृह मंत्रालय की ओर से जारी ताजा आंकड़ों को देखकर उत्तर प्रदेश का विकास के किस पायदान पर खड़ा है,इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। उत्तर प्रदेश में मजदूरों की संख्या छह करोड़ ५८ लाख १४ हजार ७१५ दर्ज की गयी है। इसमें पुरुषों की संख्या चार करोड़ ९८ लाख ४६ हजार ७६२ तथा महिला मजदूरों की संख्या एक करोड़ ५९ लाख ६७ हजार ९५३ है।
उत्तर प्रदेश में मजदूरों की संख्या को लेकर तीस अप्रैल को केंद्रीय गृह मंत्री द्वारा जारी आंकड़ों से जो तस्वीर उभरकर आयी है, वह बताती है उत्तर प्रदेश में रोजी-रोटी के लिए लोगों को कितना संघर्ष करना पड़ रहा है। उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में मजदूरों की संख्या पांच करोड़ १९ लाख ५० हजार ९८० दर्ज की गयी है। जबकि सूबे के शहरों में भी रोजाना एक करोड़ ३८ लाख ६३ हजार ७३५ लोग करते है मजदूरी। गाजियाबाद और गौतमबुद्घनगर को छोडक़र प्रदेश के सभी जिलों में ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूरों की संख्या शहर की तुलना में ज्यादा है। मजदूरों की यह संख्या बता रही है कि प्रदेश में रोजी-रोटी के लिए लोग कितना संघर्ष कर रहे हैं।
मजदूरों की संख्या उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा इलाहाबाद में २१११९०७ मजदूर है। श्रम नगरी कानपुर में १५७२२३२ है। कानपुर शहर में दस लाख से ज्यादा तो देहात में पांच लाख से ज्यादा मजदूर रोजाना रोजी-रोटी की जंग लड़ रहे हैं। लखनऊ में १५ लाख ४२ हजार आठ सौ छह मजदूरों की गिनती हुई है। लखनऊ शहर में इनकी संख्या  १०२०६४६, देहात में ५२२१६० है। उसके बाद गाजियाबाद में १५ लाख २० हजार ५३८ है। गाजियाबाद शहर में १०२४४६१ तथा देहात में ४९६०७७ लोग मजदूरी कर रहे हैं।  सीतापुर में १४२२६०२,पीतल नगरी मुरादाबाद में  १४१७८११, बरेली में १४०१९७१,आगरा में १३८९८४४, हरदोई में १३१८९४६,लखीमपुर खीरी में १२६४७१८,रायबरेली में १२०७१०,अलीगढ़ में ११७४३६१, बुलन्दशहर में ११७३२६०,उन्नावं में ११२४७४४, बंदायू में ११०७३४३,मेरठ में १०९०५३९, शाहजहांपुर में ८९२२१४, मथुरा में ८४०९३९, फिरोजाबबाद में ७६१५२१, पीलीभीत में ६१८६०५,मैनपुरी में ५६०८४०,रामपुर में  ७३७२६१, ज्योतिबफूलेनगर में ५९९०८९,बागपत में ४१६६९५,सहारनपुर में १०३७३४४,मुज्जफरनगर में १२९१६४४,बिजनौर में १०८८०३६, महामायानगर में ४८४११५,फर्रूखाबाद में ५३२२६७,कन्नौज में ५२४६७६,इटावा में ५०६०७२, औरेया में ४४२०२३, कानपुर देहात में ६२८८६४, जालौन में ६२०७६४, झांसी में ८१४९१४,ललितपुर में ५०३३५१, हमीरपुर में ४४३६५५, महोबाद में ३४९६७६, बांदा में ७०१६८९, चित्रकूट में ३९४१९७, फतेहपुर में १०६३९२९,प्रतापगढ़ में १०६६६०१,कौशांबी में ६३९०८६,बाराबंकी में ११९२८५०,फैजाबाद में ८३१२०९,अंबेडकरनगर में ७८७३९८, सुल्तानपुर में १२४२६३२, बहराइच में ११५२१६०, श्रावस्ती में ४०३७५५,बलरामपुर में ७६०२५३,गोंडा में ११७०५५२,सिद्घार्थनगर में ८७८८९८,बस्ती में ७८३६८८,संतकबीर नगर में ५३९४६९, गोरखपुर में १३५१६२९,महाराजगंज में ९९४२५३, कुशीनगर में १११६९७३, देवरिया में ८७६२४६, आजमगढ़ में १३७२०३२,मऊ में ६९६७४७, बलिया में १०१९४८३, जौनपुर में १४३७३७५, गाजीपुर में १२०४६०२, चंदौली में ६५२५४३, वाराणसी में १२२०७०८, भदोही में ४७०६०८, मिर्जापुर में ८८१९९६, सोनभद्र में ७३०३९९, एटा में ५४५९८४ एवं कांशीरामनगर में ३७५२१३ मजदूरों की संख्या दर्ज की गयी है।

कम्प्यूटर क्रांति में सुनिए दलितों का पदचाप

दिनेश चंद्र मिश्र
लखनऊ। ज्ञान पर किसी जाति,धर्म का अधिकार नहीं होता है बल्कि हर इंसान ज्ञान से सबकुछ हासिल करता है। ज्ञान की इस कसौटी पर समय के साथ आगे बढऩे में अनुसूचित जाति और जनजाति भी किसी से पीछे नहीं है। प्रदेश में तेजी से हो रहे कम्प्यूटर क्रांति में दलितों की पदचाप सुनकर इसको नजदीक से महसूस किया जा सकता है। समय के साथ सूचना व प्रौद्योगिकी की दौड़ में आगे बढ़ रहे हिन्दुस्तान में सालों से उपेक्षित व शोषित दलित और आदिवासी तबके में क्या बदलाव आया है? भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने यह जानने के लिए सभी राज्यों में अनुसूचित जाति और जनजाति के कितने प्रतिशत घरों में कम्प्यूटर या लैपटाप पहुंच गया है, इसकी जानकारी बटोरी। इस गणना के दौरान जो तसवीर उभरी है उसे देखकर आप भी कम्प्यूटर क्रांति में दलितों की सुखद पदचाप सुन सकते हैं। देश में सबसे ज्यादा दलितों की आबादी लगभग चार करोड़ उत्तरप्रदेश में है।
उत्तर प्रदेश में सबसे हाईटेक जिलों में शुमार गौतमबुद्घनगर के दलित घर में कम्प्यूटर या लैपटाप रखकर कम्प्यूटर क्रांति में आगे बढऩे में सबसे आगे हैं। गौतमबुद्घनगर में १३.५० प्रतिशत दलितों के घर लैपटाप या कम्प्यूटर मौजूद है। दूसरे नंबर पर गाजियाबाद है, यहां १३.१० प्रतिशत अनुसूचित जाति के घरों में कम्प्यूटर या लैपटाप पहुंच गया है। गाजीपुर में ९.८० प्रतिशत अनुसूचित जाति के घरों में माउस क्लिक होने लगा है तो आगरा में ऐसे दलित घरों की संख्या ९.२० प्रतिशत है। अलीगढ़ में ७.६० प्रतिशत, इलाहाबाद में ७.१० प्रतिशत, अंबेडकरनगर में ७.३० प्रतिशत,औरेया में ५.२० प्रतिशत,आजमगढ़ में ६.५० प्रतिशत,बागपत में ८.९० प्रतिशत,बहराइच में ५.८० प्रतिशत,बलिया में ९.४० प्रतिशत,बलरामपुर में ४.७०,बांदा में ५.३० प्रतिशत,बाराबंकी में ४ प्रतिशत,बरेली में ५.९० प्रतिशत, बस्ती में ७.८० प्रतिशत,बिजनौर में ४.५० प्रतिशत, बंदायूं में ५.१० प्रतिशत,बुलन्दशहर में ५.४० प्रतिशत,चंदौली में ६.२० प्रतिशत,चित्रकूट में ४.६० प्रतिशत,देवरिया ७.३० प्रतिशत,एटा में ५.४० प्रतिशत,इटावा में ६.४० प्रतिशत,फैजाबाद में ७.९० प्रतिशत, फर्रूखाबाद में ६.३० प्रतिशत, फतेहपुर में ७ प्रतिशत, फिरोजबाद में ६.६० प्रतिशत,गोंडा में ५.५० प्रतिशत,गोरखपुर में ७.६० प्रतिशत, हमीपुर में ४.८० प्रतिशत,हरदोई में ४ प्रतिशत,जालौन में ६.३० प्रतिशत,जौनपुर में ७.१० प्रतिशत, झांसी में ९.१० प्रतिशत,ज्योतिबाफूलेनगर में ५ प्रतिशत,कन्नौज में ६.७० प्रतिशत,कन्नौज में ६.९० प्रतिशत, कानपुर देहात में ६.७० प्रतिशत, कानपुर नगर में ५.८० प्रतिशत, कांशीरामनगर में ५.८० प्रतिशत,कौशांबी में ५.४० प्रतिशत, लखीमपुर खीरी में ३.५० प्रतिशत, कुशीनगर में ६.२० प्रतिशत,ललितपुर में ४ फीसदी, लखनऊ में ८.४० प्रतिशत,महामायानगर में ६.२० प्रतिशत, महोबाद में ६.७० प्रतिशत, महाराजगंज में ६.१० प्रतिशत, मैनपुरी में ७.१० प्रतिशत, मथुरा में ७.२० प्रतिशत,मऊ में ७.७० प्रतिशत, मेरठ में ८.२० प्रतिशत,मिर्जापुर में ५.४० प्रतिशत,मुरादाबाद में ६.५० प्रतिशत,मुज्जफरनगर में ६.४० प्रतिशत,पीलीभीत में ५.१० प्रतिशत,प्रतापगढ़ में ६ प्रतिशत,रायबरेली में ५.२० प्रतिशत,रामपुर में ६ प्रतिशत, सहारनपुर में ४.१० प्रतिशत,संतकबीरनगर में ७.५० प्रतिशत, संतरविदासनगर में ६.४० प्रतिशत, शाहजहांपुर में ४.८० प्रतिशत,श्रावस्ती में ५.५० प्रतिशत, सिद्घार्थनगर में ६.४० प्रतिशत,सीतापुर में ४.१० प्रतिशत, सोनभद्र में ५.५० प्रतिशत,सुल्तानपुर में ६.४० प्रतिशत,उन्नाव में ४.६० प्रतिशत व वाराणसी में ७.८० प्रतिशत दलितों के घर में कम्प्यूटर या लैपटाप दाखिल हो गया है।
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