रोमिंग जर्नलिस्ट

बुधवार, 17 जनवरी 2018

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गुरुवार, 17 मार्च 2016

रविवार, 24 जनवरी 2016

रोमिंग जर्नलिस्ट: पाक का एहसान लखनऊ में खोजे चचाजानहिंदुस्तान-पाकिस...

रोमिंग जर्नलिस्ट: पाक का एहसान लखनऊ में खोजे चचाजान
हिंदुस्तान-पाकिस...
: पाक का एहसान लखनऊ में खोजे चचाजान हिंदुस्तान-पाकिस्तान बंटवारे के साथ सरहद भले ही बंट गयी लेकिन खून के रिश्ते नहीं बंटे हैं। रिश्तों क...

पाक का एहसान लखनऊ में खोजे चचाजान


हिंदुस्तान-पाकिस्तान बंटवारे के साथ सरहद भले ही बंट गयी लेकिन खून के रिश्ते नहीं बंटे हैं। रिश्तों की नसों में जब अपनेपन का खून दौड़ता है तो दिल में रिश्तेदारों-नातेदारों से मिलने की ख्वाहिश पैदा होती है। ऐसी ही ख्वाहिश पाकिस्तान के एहसान अली के अब्बू माशूक अली को एक दशक से ज्यादा समय से जागी है। अब्बू की ख्वाहिश पूरी करने के लिए एहसान सोशल मीडिया पर हिंदुस्तान के दोस्तों को रिश्तेदारों के नाम व लखनऊ के आसपास का हुलिया बताकर चचाजान को खोजने की गुजारिश कर रहा है। फेसबुक पर इस खबरनवीस से जुड़े एहसान अली ने अब्बू की अधूरी ख्वाहिश पूरी करने के लिए इस बार अपनी और अब्बू की फोटो भेजते हुए रिश्तों की कड़ी नए सिरे से जोड़ने की गुजारिश की है। एहसान को उम्मीद है कि अब्बू की फोटो देखकर राजधानी के पुराने लोग भाई-भतीजे के मिलन में मददगार बनेंगे।
एहसान अली के अब्बू माशूक अली के देश के बंटवारे के समय पाकिस्तान जाने की कहानी भी कब अजीब नहीं है। बचपन की उम्र से ही माशूक अब्बू के साथ लकड़ी के कारोबार में ही हाथ बंटाते थे। लखनऊ या आसपास के जिले में लकड़ी का कहीं बड़ा खानदानी कारोबार था, जगह उनको नहीं याद है। बंटवारे के पहले हिंदुस्तान जब अखंड था तब नया कारोबार मीरगंज(वर्तमान में बांग्लादेश) में खड़ा करने के लिए अब्बू के साथ् गए थे। बंटवारा होने के बाद हिदुस्तान लौटकर फिर 1953 में मीरगंज परिवार सहित चले गए। मीरगंज से अब कराची पहुंच गए एहसान के अब्बू माशूक को जन्मभूमि के साथ रिश्तेदारों की याद सता रही है। खुदा से दुआ करते है अंतिम सांस से पहले भाई-भतीजो से एक मुलाकात करा दे।
परिवार मिलन के मदद सूत्र
एहसान के अब्बू माशूक अली के भाई-भतीजों से मिलन कराने में मदद के लिए रिश्तेदारों नाम सूत्र के रूप में काम करेंगे। माशूक अली के चाचा मोहम्मद गनी के बेटे मेंहदी हसन,माशूक के चचेरे भाई गुफुर के बेटे मोम्म्द तैयब। यह लोग लखनऊ या आसपास के किसी जिले में होंगे। माशूक के परिवार में पहलवानी का खूब शौक था। माशूक के अब्बू व चाचा नागपंचमी के दिन कुश्ती लड़ने दूर-दूर तक जाते थे। अब्बू की फोटो भेजते हुए कहा पुराने लखनऊ या सटे इलाकों के लोग अगर देखेंगे तो पहचान सकते हैं

बुधवार, 22 अप्रैल 2015

मोदी के दत्तक गांव में किसानों का मातम
-बनारस के जयापुर में बेमौसम बरसात से बर्बाद किसानों की सुध लेने राज्य सरकार को कोई अफसर नहीं पहुंचा
- इस गांव में छोटे किसानों की 70 प्रतिशत फसल हो चुकी है बर्बाद, मुआवजा तो दूर तहसीलदार भी नहीं आए
दिनेश चंद्र मिश्र
वाराणसी। बेमौसम बरसात से फसलों के बर्बाद होने पर खून के आंसू प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दत्तक गांव जयापुर के भी छोटे किसान रो रहे हैं। मोदी के गोद लिए के इस गांव में गेहूं की 70 फीसदी फसल बर्बाद हो गयी है। गेंहू के साथ मटर और चना की फसल बोए किसान भी कुदरत की मार के चलते रोने को विवश है। मोदी के दत्तक गांव में फसल बर्बाद होने से किसानों के खेत से लेकर घर तक मातम पसरा है। मौसम की मार से आर्थिक घायल हुए किसानों के साथ राज्य सरकार के अफसर सौतेला व्यवहार भी कर रहे हैं। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है आज तक बर्बाद फसलों का सर्वे करने के लिए तहसीलदार तक नहीं गए हैं।
सपा सरकार जहां प्रदेश में फसलों के नुकसान का दुबारा सर्वे करवा रही है, वहीं जयापुर में किसी राजस्व अधिकारी के न पहुंचने को लेकर गांव की प्रधान दुर्गादेवी भी बहुत चिंतित है। वह बताती है कि तीन दिन पहले लेखपाल आए और एक-दो खेत देखकर लौट गए। यहां तो किसानों की 70 प्रतिशत फसल बर्बाद हो गयी है वह अपनी रिपोर्ट में कितना नुकसान दिखाएं हैं,मालूम नहीं। वह कहती है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खत भेजकर उनके गोद लिए गांव के बर्बादी के साथ अफसरों के सौतेलापन की बात जरूर बताएंगे। मोदी के गोद लिए गांव में बर्बाद किसानों का जितना गुस्सा जिले के आला अधिकारियों को लेकर है उससे कम गुस्सा जनप्रतिनिधियों को लेकर भी नहीं है। मोदी का नाम इस गांव के किसानों की मदद के लिए जनप्रतिनिधि मदद के हाथ दलीय दीवार के कारण भी नहीं बढ़ा रहे हैं।

कर्ज तो दूर,सूद देना भी संकट
मोदी के गोद लिए गांव जयापुर के छोटे किसानों की कमर को बेमौसम बरसात ने पूरी तरह तोड़ दिया है। इसी गांव के लालचंद्र,मन्नू पटेल, सेचन व झम्मन की आधी से ज्यादा फसल बरसात के कारण सड़ गई। कर्ज में डूबे इन किसानों को फसल अच्छी होने पर पुराना कर्ज चुकाकर मुक्ति पाने की आस थी, इस आस पर ब्रज पड़ गया है। इनका कहना है अब कर्ज चुकाना तो दूर  समय पर सूद देना भी एक संकट है।