रोमिंग जर्नलिस्ट

गुरुवार, 17 मार्च 2016

रविवार, 24 जनवरी 2016

रोमिंग जर्नलिस्ट: पाक का एहसान लखनऊ में खोजे चचाजानहिंदुस्तान-पाकिस...

रोमिंग जर्नलिस्ट: पाक का एहसान लखनऊ में खोजे चचाजान
हिंदुस्तान-पाकिस...
: पाक का एहसान लखनऊ में खोजे चचाजान हिंदुस्तान-पाकिस्तान बंटवारे के साथ सरहद भले ही बंट गयी लेकिन खून के रिश्ते नहीं बंटे हैं। रिश्तों क...

पाक का एहसान लखनऊ में खोजे चचाजान


हिंदुस्तान-पाकिस्तान बंटवारे के साथ सरहद भले ही बंट गयी लेकिन खून के रिश्ते नहीं बंटे हैं। रिश्तों की नसों में जब अपनेपन का खून दौड़ता है तो दिल में रिश्तेदारों-नातेदारों से मिलने की ख्वाहिश पैदा होती है। ऐसी ही ख्वाहिश पाकिस्तान के एहसान अली के अब्बू माशूक अली को एक दशक से ज्यादा समय से जागी है। अब्बू की ख्वाहिश पूरी करने के लिए एहसान सोशल मीडिया पर हिंदुस्तान के दोस्तों को रिश्तेदारों के नाम व लखनऊ के आसपास का हुलिया बताकर चचाजान को खोजने की गुजारिश कर रहा है। फेसबुक पर इस खबरनवीस से जुड़े एहसान अली ने अब्बू की अधूरी ख्वाहिश पूरी करने के लिए इस बार अपनी और अब्बू की फोटो भेजते हुए रिश्तों की कड़ी नए सिरे से जोड़ने की गुजारिश की है। एहसान को उम्मीद है कि अब्बू की फोटो देखकर राजधानी के पुराने लोग भाई-भतीजे के मिलन में मददगार बनेंगे।
एहसान अली के अब्बू माशूक अली के देश के बंटवारे के समय पाकिस्तान जाने की कहानी भी कब अजीब नहीं है। बचपन की उम्र से ही माशूक अब्बू के साथ लकड़ी के कारोबार में ही हाथ बंटाते थे। लखनऊ या आसपास के जिले में लकड़ी का कहीं बड़ा खानदानी कारोबार था, जगह उनको नहीं याद है। बंटवारे के पहले हिंदुस्तान जब अखंड था तब नया कारोबार मीरगंज(वर्तमान में बांग्लादेश) में खड़ा करने के लिए अब्बू के साथ् गए थे। बंटवारा होने के बाद हिदुस्तान लौटकर फिर 1953 में मीरगंज परिवार सहित चले गए। मीरगंज से अब कराची पहुंच गए एहसान के अब्बू माशूक को जन्मभूमि के साथ रिश्तेदारों की याद सता रही है। खुदा से दुआ करते है अंतिम सांस से पहले भाई-भतीजो से एक मुलाकात करा दे।
परिवार मिलन के मदद सूत्र
एहसान के अब्बू माशूक अली के भाई-भतीजों से मिलन कराने में मदद के लिए रिश्तेदारों नाम सूत्र के रूप में काम करेंगे। माशूक अली के चाचा मोहम्मद गनी के बेटे मेंहदी हसन,माशूक के चचेरे भाई गुफुर के बेटे मोम्म्द तैयब। यह लोग लखनऊ या आसपास के किसी जिले में होंगे। माशूक के परिवार में पहलवानी का खूब शौक था। माशूक के अब्बू व चाचा नागपंचमी के दिन कुश्ती लड़ने दूर-दूर तक जाते थे। अब्बू की फोटो भेजते हुए कहा पुराने लखनऊ या सटे इलाकों के लोग अगर देखेंगे तो पहचान सकते हैं

बुधवार, 22 अप्रैल 2015

मोदी के दत्तक गांव में किसानों का मातम
-बनारस के जयापुर में बेमौसम बरसात से बर्बाद किसानों की सुध लेने राज्य सरकार को कोई अफसर नहीं पहुंचा
- इस गांव में छोटे किसानों की 70 प्रतिशत फसल हो चुकी है बर्बाद, मुआवजा तो दूर तहसीलदार भी नहीं आए
दिनेश चंद्र मिश्र
वाराणसी। बेमौसम बरसात से फसलों के बर्बाद होने पर खून के आंसू प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दत्तक गांव जयापुर के भी छोटे किसान रो रहे हैं। मोदी के गोद लिए के इस गांव में गेहूं की 70 फीसदी फसल बर्बाद हो गयी है। गेंहू के साथ मटर और चना की फसल बोए किसान भी कुदरत की मार के चलते रोने को विवश है। मोदी के दत्तक गांव में फसल बर्बाद होने से किसानों के खेत से लेकर घर तक मातम पसरा है। मौसम की मार से आर्थिक घायल हुए किसानों के साथ राज्य सरकार के अफसर सौतेला व्यवहार भी कर रहे हैं। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है आज तक बर्बाद फसलों का सर्वे करने के लिए तहसीलदार तक नहीं गए हैं।
सपा सरकार जहां प्रदेश में फसलों के नुकसान का दुबारा सर्वे करवा रही है, वहीं जयापुर में किसी राजस्व अधिकारी के न पहुंचने को लेकर गांव की प्रधान दुर्गादेवी भी बहुत चिंतित है। वह बताती है कि तीन दिन पहले लेखपाल आए और एक-दो खेत देखकर लौट गए। यहां तो किसानों की 70 प्रतिशत फसल बर्बाद हो गयी है वह अपनी रिपोर्ट में कितना नुकसान दिखाएं हैं,मालूम नहीं। वह कहती है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खत भेजकर उनके गोद लिए गांव के बर्बादी के साथ अफसरों के सौतेलापन की बात जरूर बताएंगे। मोदी के गोद लिए गांव में बर्बाद किसानों का जितना गुस्सा जिले के आला अधिकारियों को लेकर है उससे कम गुस्सा जनप्रतिनिधियों को लेकर भी नहीं है। मोदी का नाम इस गांव के किसानों की मदद के लिए जनप्रतिनिधि मदद के हाथ दलीय दीवार के कारण भी नहीं बढ़ा रहे हैं।

कर्ज तो दूर,सूद देना भी संकट
मोदी के गोद लिए गांव जयापुर के छोटे किसानों की कमर को बेमौसम बरसात ने पूरी तरह तोड़ दिया है। इसी गांव के लालचंद्र,मन्नू पटेल, सेचन व झम्मन की आधी से ज्यादा फसल बरसात के कारण सड़ गई। कर्ज में डूबे इन किसानों को फसल अच्छी होने पर पुराना कर्ज चुकाकर मुक्ति पाने की आस थी, इस आस पर ब्रज पड़ गया है। इनका कहना है अब कर्ज चुकाना तो दूर  समय पर सूद देना भी एक संकट है।

सोमवार, 20 अक्तूबर 2014


दीपावली पर यादों का इक दीया


दीपावली हो या होली, इन त्योहार के आने से पहले ही बचपन में जो उमंग रहती थी, समय के साथ कहां चली गयी पता ही नहीं चला। एक बार फिर दीपावली आ गयी लेकिन इस बार उमंग दिल में नाममात्र की भी नहीं बची है। पिछले साल तक दीपावली पर अगर बस्ती स्थित घर नहीं पहुंच पाता तो पापा का फोन आता था। फोन पर प्रणाम करने के बाद पापा हालचाल जानने के बाद कहते थे तुम्हारे लिए एक अंडरवियर और बनियान खरीदा हूं,आना तो लेते जाना। यह पापा का प्यार था, जो नौकरी करने के बाद भी पिछले कई सालों से मिल रहा था। इस बार त्योहार पर पापा की ओर से नए कपड़े के रूप में मिलने वाले इस तोहफे की कमी जो खल रही है,उसको किसी बाजार में खरीद नहीं सकता हूं। पापा के लाड़-प्यार के साथ गलती के लिए मार की जो थाती अपनी थी, अब अनमोल यादें बन गयी है। पहले मां गयी और अब पापा भी छोड़कर चले गये। अपनी जिंदगी में दीपावली इतनी काली कभी नहीं थी, जितनी इस साल है।

अमर उजाला वाराणसी में काम करने के दौरान माता जी ने गोद में दम तोड़ दिया था,  इस साल पापा भी अप्रैल में हम लोगों को छोड़कर चले गये। बीएचयू के सर अस्पताल में पापा की वह हंसी याद करके आंखों में पानी भर आता है, जो जेहन में कैद है। स्कूल के दिनों में पापा की मार उनके खड़ाऊ से लेकर लकड़ी की स्केल तक से अपनी गलतियों के लिए बहुत खायी लेकिन दिल में एक भी चोट नहीं है। पापा की मार पर माता जी का बचाने के लिए किचन से दौड़कर आना याद आता है तो आंखों से आंसू थमते नहीं हैं। यायावरी की आदत के चलते अखबार की नौकरी में कई ऐसी दीपावली रही, जब परिवार से बहुत दूर रहा। अमर उजाला जम्मू-कश्मीर में नौकरी के दौरान परिवार बनारस तो पापा बस्ती में थे। मैं दीपावली के दिन अपनों से दूर माता रानी के चरणों में आस्था का एक दीप जलाने के लिए पहुंच गया था। वहां से पापा को फोन करके आर्शीवाद लिया तो कहे माता रानी से प्रार्थना करो वह तुम्हे घर के नजदीक भेज दो। माता रानी ने पापा की सुन ली, चंद महीनों में ही नोएडा आ गया। काशी से कश्मीर, दिल्ली से दार्जिलिंग तक पत्रकारिता के पथ पर काम करने के दौरान कई दीपावली ऐसी रही जब घर-परिवार से सैकड़ों कोस दूर रहा, लेकिन वह उतना नहीं खला जितना इस बार अम्मा-पापा के बिना प्रकाशपर्व से पहले ही खालीपन महसूस हो रहा है। अम्मा-पापा के बिना प्रकाशपर्व इस साल काटने के लिए दौड़ रहा है। पिछले साल पापा ने दीपावली पर जो अंडरवियर और बनियान दिया था,वह आज भी शरीर पर है लेकिन अपने को अधूरा पा रहा हूं। दीपावली के दिन अम्मा-पापा की याद में एक-एक दीप बनारस के मणिकर्णिका घाट पर जलाने को सोच रहा हूं, जहां उनको मुखाग्नि दी थी। 

शुक्रवार, 24 मई 2013

सोनभद्र का हलक यूपी में सबसे ज्यादा सूखा


दिनेश चंद्र मिश्र
लखनऊ। गर्मी में तो वैसे सबका हलक चार कदम चलने के बाद सूख जाता है लेकिन सूबे के सोनभद्र जिले के ग्रामीण क्षेत्र में लोगों का हलक सबसे ज्यादा सूखा है। प्रदेश के दर्जनभर से ज्यादा जिलों के ग्रामीण इलाकों में आज भी एक चौथाई घरों में पानी नहीं मौजूद है। पानी की तलाश में इन लोगों को लंबा सफर करना पड़ता है। सबसे ज्यादा खराब स्थिति सोनभद्र जिले की है। सोनांचल कहे जाने वाले इस इलाके ३३.७० प्रतिशत घरों में पानी का इंतजाम नहीं है। पानी के लिए इनको घर से दूर सरकारी हैंडपंप से लेकर कुंआ,नदी व तालाब का सहारा लेना पड़ता है। गर्मी में यहां भी पानी सूख जाता है तो लोगों को हलक में दो बंूद पानी के लिए लंबी जद्ïदोजहद करनी पड़ती है।
भारत सरकार द्वारा देश के सभी जिलों में कितने घरों पानी का इंतजाम मौजूद है? कितनों में नहीं है? यह जानने के लिए किये सर्वे से इस बात का खुलासा हुआ कि सोनभद्र के ग्रामीण इलाकों का हलक सबसे ज्यादा सूखा है। सोनभद्र देहात के ३३.७० प्रतिधत घरों में जहां पानी मौजूद नहीं है वहीं शहरी इलाकों में ११.६० प्रतिशत घर भी बेपानी है। सोनभद्र के बाद भगवान श्रीकृष्ण की नगरी मथुरा का भी हलक काफी सूखा है। मथुरा के गांवों में भी ३३.३० प्रतिशत घरों में आज की तारीख में पानी नहीं पहुंचा है। मथुरा शहर में ऐसे घरों की संख्या ८.४० प्रतिशत है। मिर्जापुर के ग्रामाीण क्षेत्रों में भी पानी के लिए त्राहि-त्राहि मची है। यहां के गांवों में २८.६० प्रतिशत घरों में पानी नहीं है। संत रविदासनगर भदोही में २३.२० प्रतिशत ग्रामीण घरों में रोजाना पानी की दरकार है।
बुन्देलखंड में भी पानी की किल्लत कम नहीं है। भगवान राम की नगरी चित्रकूट में भी पानी की किल्लत बहुत है। चित्रकूट के ग्रामीण इलाकों में २७.१० प्रतिशत घरों में आज भी पानी नहीं पहुंचा है। पानी के लिए यहां के ग्रामीणों का घाट-घाट का चक्कर लगाना पड़ता है। फहेतपुर में भी पानी की समस्या विकराल है। फतेहपुर के २६.८० प्रतिशत ग्रामीण घरों में पानी नहीं है। झांसी के ग्रामीण इलाकों में एक चौथाई घरों में पानी नहीं पहुंचा है। यहां रोजाना ग्रामीणों को पानी के लिए किसी लड़ाई से कम जद्ïदोजहद नहीं करनी पड़ती है। हमीरपुर में भी २१.८० प्रतिशत ग्रामीण इलाकों के घरों में पानी नहीं है। कानपुर देहात के देहात में भी पानी का रोना कम नहीं है। इस जिले के देहाती इलाकों में २४.८० प्रतिशत घरों में पानी नहीं मौजूद है। मुख्यमंत्री की पत्नी व सपा सांसद डिंपल यादव की राजनीतिक कर्मभूमि कन्नौज के गांव भी पानी की किल्लत से जूझ रहे हैं। कन्नौज के ग्रामीण इलाकों में २३.८० प्रतिशत घरों में पानी नहीं पहुंचा है। कौशांबी में भी पानी की समस्या बरकरार है। कौशांबी में २६.६० प्रतिशत ग्रामीण घरों में पानी नहीं मौजूद है।  संगमनगरी इलाहाबाद में भी पानी की समस्या कम नहीं है। इलाहाबाद के एक चौथाई गंवई घर बेपानी है। इलाहाबाद के २५.८० प्रतिशत घरों में पानी मौजूद नहीं है। चंदौली में भी पानी की समस्या जगजाहिर है। चंदौली में २३.३० प्रतिशत घरों में पानी नहीं पहुंचा है। रोजमर्रा की जरूरत का पानी लेने के लिए भी ग्रामीणों को घर से दूर जाना पड़ता है। बांदा में भी कमावेश यही स्थिति है। बांदा के २३ प्रतिशत ग्रामीणा घरों में बूंद-बूंद पानी के लिए लोगों को चक्कर लगाना पड़ता है।

शुक्रवार, 17 मई 2013

खेतों के लिए बज रही है खतरे की घंटी


- प्रदेश की मिट्टी में तेजी से घटे पोषक तत्व,अपनी मिट्ïटी पहचाने अभियान ने किया सचेत 
- जीवांश कार्बन की मात्रा घटकर हुई आधी,नाइट्रोजन,फास्फोर,सल्फर,जिंक की भी हुई कमी
दिनेश चंद्र मिश्र
लखनऊ। प्रदेश की माटी अनाज तो खूब उगल रही है लेकिन वह दिन दूर नहीं जब पैदावार कम होने लगे। यह खतरा प्रदेश के कृषि विभाग को मिट्ïटी के मृदा परीक्षण के बाद नजर आ रहा है। प्रदेश के खेतों में बड़ी तेजी से पोषक तत्व घट रहे हैं। पोषक तत्वों के घटने के पीछे कारण बड़ी संख्या में किसानों द्वारा धान-गेहूं का फसल चक्र अपनाना है। धान-गेहूं का फसल चक्र ही लगातार अपनाने के कारण स्वस्थ्य भूमि के मुख्य पोषक तत्वों के साथ सूक्ष्म पोषक तत्व भी तेजी से घट रहे हैं। प्रदेश में इस समय चल रहे मिट्ïटी पहचाने अभियान के प्रथम चरण के मृदा परीक्षण रिपोर्ड कार्ड जो जारी किया गया है, उसके अनुसार सेहतमंद खेत के लिए जरूरी पोषक तत्व जीवांश कार्बन माना जाता है। जीवांश कार्बन की मात्रा ०.८ प्रतिशत होनी चाहिए, प्रदेश में अब यह घटकर ०.४ प्रतिशत रह गयी है।
मिट्टी के पोषक तत्वों की कमी के कारण प्रदेश के खाद्यान्न उत्पादन में कुछ वर्षों के दौराव ठहराव आ गया है। इस ठहराव को खत्म करने के लिए प्रदेश में खरीफ व रबी फसल अभियान के दौरान मिट्ïटी पहचाने अभियान प्रारंभ किया गया है। मृदा स्वास्थ्य के दृष्टिïकोण प्रारंभ हुए इस अभियान का पहला चरण इस वर्ष २६ अप्रैल को प्रदेशभर में चला। लगभग छह लाख मिट्ïटी के नमूने प्रदेशभर में किसान जांच कराने के लिए पहुंचे। मिट्टी के इन नमूनों का पंद्रह मई को मृदा स्वास्थ्य कार्ड जारी किया गया। मिट्ïटी के  इन नमूनों से जो निष्कर्ष निकलकर सामने आया, उसके अनुसार जीवांश कार्बन की मात्रा जहां सभी जिलों मानक से घटकर आधी रह गयी है, वहीं अन्य पोषक तत्व भी तेजी से घटे हैं। प्रदेश के अधिकांश जनपदों में मुख्य पोषक तत्वों के साथ-साथ द्वितीय तथा सूक्ष्म पोषक तत्वों की भी कमी हो रही है। पौधों के अच्छे विकास के लिए १६ पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है जिनमें से पौधे वायु मण्डल् तथा जल से तीन पोषक तत्वा कार्बन,हाईड्रोजन तथा आक्सीन ग्रहण करते हैं एवं १३ पोषक तत्व भूमि से ग्रहण करते हैं। भूमि से जो प्रमुख पोषक तत्व पौधे ग्रहण करते हैं वह है नाइट्रोजन,फास्फोरस,पोटास के अलावा द्वितीयक पोषक तत्व कैल्सियम,मैज्निश्सियम,सल्फर तथा सूक्ष्म पोषक तत्व जिंक, आयरन, मैज्नीज,कापर,बोरान,मालिब्डेनम एवं क्लोरीन भूमि से ग्रहण करते हैं।
प्रदेश में मिट्टी पहचाने अभियान के प्रथम चरण के नमूनों से जो निष्कर्ष निकले हैं वह खेतों के लिए खतरे की घंटी से कम नहीं है। प्रदेश के खेतों में जहां जीवांश कार्बन की मात्रा घटकर आधी रह गयी है, वहीं अधिकांश जिलों में नत्रजन,फास्फोरस,सल्फर,जिंक,लोहा, तांबा, मैज्नीज आदि महत्वपूर्ण पोषक तत्वों की भूमि में कमी दिख रही हैं। प्रदेश के खेतों महत्वपूर्ण पोषक तत्वों की कमी के पीछे अधिकांश किसानों द्वारा धान-गेहूं की फसल लगातार बोने के साथ रसायनिक उर्वरकों के असंतुलित प्रयोग कारण ऐसा हो रहा है। प्रदेश में इस वर्ष सरकार ने ४० लाख २० हजार मृदा नमूनों की जांच का लक्ष्य रखा है। पहले चरण का परिणाम जहां खेतों के लिए खतरे की घंटी बजा  रहे हैं, वहीं दूसरे चरण में जो नमून जांच के लिए एकत्र होने के बाद परीक्षण किए जा रहे , वह क्या कहेंगे? इसका पता तीस मई के बाद चलेगा।
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